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क्या राहुल गांधी ने यात्रा के जरिए यूपी चुनाव का राजनीतिक एजेंडा तय कर दिया है?

आकाश बिष्ट | Updated on: 10 September 2016, 8:12 IST

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की देवरिया में किसान यात्रा खाट विवाद में घिर गई लेकिन लगता है कि इससे उप्र में आगामी विधानसभा चुनावों के लिए राजनीतिक एजेण्डा तय हो गया है. अन्य राजनीतिक दल अगले चुनावों के लिए हताशा में एक-दूसरे से होड़ करते हुए जहां जाति को केन्द्रबिन्दु बनाने की कोशिश में हैं, वहीं राहुल ने किसान कार्ड खेलकर अपने विरोधियों को चकरा दिया है. 

अपनी इस रणनीति से वह देश के राजनीतिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण राज्य में कांग्रेस का भविष्य बदल पाने में कितना सफल हो पाते हैं, यह तो भविष्य के गर्भ में है लेकिन गांधी परिवार के उत्तराधिकारी ने इस मुद्दे को उठाकर अन्य राजनीतिक दलों की अपेक्षा सफलता पाई है.

पिछले कई चुनावी अभियानों में राजनीतिक दलों के लिए किसानों का मुद्दा कोई बड़ा मुद्दा नहीं रहा है. नए किसान नेताओं के अभाव में हिन्दी भाषी राज्यों का हृदयस्थल कहे जाने वाले इस प्रदेश में कांग्रेस के हाथ यह खाली जगह भरने का अवसर आया है जिसका लाभ उसे न केवल विधानसभा चुनावों में, बल्कि 2019 के आम चुनावों में भी मिल सकता है.

उनके आलोचक भी, जो पहले कांग्रेस के राज्य में पुनर्वापसी की किसी भी संभावना को नकार देते थे, अब इसे राजनीतिक सिक्सर कह रहे हैं. उनका मानना है कि कांग्रेस के विरोधी अब अपनी रणनीति पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर होंगे.

लखनऊ के एक प्रख्यात राजनीतिक विश्लेषक रमेश दीक्षित एक माह पहले तक कांग्रेस के पुनरुत्थान को लेकर बातचीत करना ही पसन्द नहीं करते थे लेकिन अब वह भी खासे उत्साहित हैं कि राहुल ने किसानों की चिन्ताओं को मुद्दा बनाया है. वह कहते हैं, 'कांग्रेस ने बहुत ही सोच-समझकर किसानों का मुद्दा उठाया है जिसे नजरअंदाज किया जाना मुश्किल है. अंतत: सभी दल इस पर अपनी प्रतिक्रिया देने या कुछ कहने के लिए दबाव में होंगे.'

'खाट लूट' विवाद को गैरजरूरी मुद्दा मानते हुए दीक्षित कहते हैं कि यदि राहुल अच्छा कर रहे हैं

वह यह भी कहते हैं कि यूपी की राजनीति में नया आयाम जुड़ा है. कांग्रेस अचानक ही राज्य के दलों में सर्वाधिक चर्चा वाली पार्टी बन गई है. 'खाट लूट' विवाद को गैरजरूरी मुद्दा मानते हुए दीक्षित कहते हैं कि यदि राहुल अच्छा कर रहे हैं तो उन्हें उसका प्रतिफल दिया ही जाना चाहिए. बहुत चतुराई से राहुल गांधी ने काट लूट का मुद्दा भाजपा सरकार के पाले में यह कहते हुए डाल दिया कि हजारों करोड़ लूटने वाला माल्या देश छोड़कर फरार हो जाता है, सरकार कुछ नहीं करती और खटिया ले जाने वाले किसान को लुटेरा कहा जा रहा है.

किसानों का मुद्दा उठाए जाने के कांग्रेस के निर्णय को उप्र की राजनीति में एक 'गेमचेंजर' के रूप में देखा जा रहा है. हालांकि राज्य में कांग्रेस बहुमत में आ जाए, यह अतिशयोक्तिपूर्ण ही लगता है लेकिन कांग्रेस ने निश्चित रूप से अपने विरोधियों के सामने कड़ी चुनौती तो पेश ही कर दी है.

लखनऊ के एक कांग्रेस नेता का कहना है कि कोई यह उम्मीद नहीं कर रहा कि कांग्रेस को बहुमत मिलेगा लेकिन अब उसे इस स्थिति में देखा जा रहा है जहां वह निश्चित रूप से 'किंग मेकर' की भूमिका निभा सकती है.

हालांकि, कुछ अन्य लोग कांग्रेस की अपनी की इस गति से लाभ उठाने की योग्यता को आशंका भरी नजरों से देखते हैं. जमीनी स्तर पर सांगठनिक ढांचे के अभाव पर कानपुर के एक राजनीतिक विश्लेषक और क्राइस्ट चर्च कॉलेज में पॉलिटिकल साइंस पढ़ाने वाले एके वर्मा कहते हैं कि खेती महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दा तो है. वह यह भी कहते हैं कि इससे लाभ केवल तभी मिल सकता है जब पार्टी किसानों के साथ खड़ी रहे.

वर्मा आगे कहते हैं कि राजनीतिक एजेण्डा बनाने का अर्थ है कि इसे पहले व्यापक बनाया जाए और फिर उसे कैश कराया जाए. कांग्रेस के जमीनी स्तर पर सांगठनिक ढांचे के अभाव में यह असम्भव सा लगता है. यदि आप बहुत ही अच्छे और उत्कृष्ट अंदाज के साथ आते हैं और उसे बेच नहीं पाते हैं तो अन्य लोग अपने लाभ की खातिर उस विचार पर कब्जा कर लेंगे.

यह एक चुनावी एजेण्डा है और राज्य की राजनीति में जाति तथ्यात्मक रूप से पहलू है जिसे नकारा नहीं जा सकता

वर्मा आगे कहते हैं कि राहुल आगे बढ़े हैं. उन्होंने लीड किया है लेकिन क्या वह इसे बरकरार रखने में समर्थ हो सकेंगे और वर्तमान हालात में अपना पराक्रम दिखा पाएंगे, सवालों के घेरे में है.

वह इस बात से असहमति जताते हैं कि कांग्रेस ने अपना राजनीतिक एजेण्डा तय कर दिया है और राहुल ने व्यापक मुद्दों में से एक पर पहला कदम बढ़ा दिया है. वह कहते हैं कि यह एक चुनावी एजेण्डा है और राज्य की राजनीति में जाति तथ्यात्मक रूप से पहलू है जिसे नकारा नहीं जा सकता. अपने इस विचार की व्याख्या करते हुए वे आगे कहते हैं कि राज्य भयावह रूप से जातियों में बंटा हुआ है. इन जातिबंद समूहों में अपनी राह बनाना, घुसना मुश्किल सा है. जाति समूहों को अपने पाले में करने के लिए कांग्रेस पर दबाव रहेगा.

उत्तर प्रदेश की राजनीति में किसानों के मुद्दे को आज भी एक बड़ा मुद्दा बताते हुए वर्मा कहते हैं कि राहुल जो कर रहे हैं, नया नहीं है. इसके पहले भी कई अन्य ख्यातिलब्ध नेता अपने लाभ के लिए ऐसी ही कोशिश कर चुके हैं.

चौधरी चरण सिंह और मुलायम सिंह यादव का उदाहरण देते हुए वह कहते हैं कि उन्होंने भी उप्र के विभिन्न हिस्सों से किसानों को अपने पाले में करने की कोशिश की थी, लेकिन उन्हें बड़े पैमाने पर असफलता ही मिली.

लेकिन कुछ लोग इस अवधारणा से इत्तफाक नहीं रखते हैं और राहुल को श्रेय देते हैं कि उन्होंने मुख्य धारा के राजनीतिक दलों द्वारा दरकिनार किए गए किसानों को अपनी ओर किया है. प्रख्यात कृषि विशेषज्ञ देविन्दर शर्मा उन कारणों के बारे में बताते हैं कि किस तरह से पिछले दो-तीन दशक से कांग्रेस नेता अप्रासंगिक होते गए हैं. वे कहते हैं कि स्थानीय स्तर पर तो वे हीरो हैं और राष्ट्रीय स्तर पर जीरो. उनकी राजनीति पार्टी का टिकट लेने के लिए ही होती है और एक बार उन्हें टिकट मिल जाता है तो फिर किसानों को भुला दिया जाता है.

भाजपा अपने बयानों के जरिए नेहरू-गांधी परिवार पर आजादी के बाद से ही किसानों की अनदेखी करने का आरोप लगाती रही है

राहुल की सराहना करते हुए वह कहते हैं कि राहुल ने सही नस पर अपनी अंगुली रखी है. उन्होंने कहा कि किसान चाहते हैं कि कोई ऐसा तो हो जो उनकी तरफ देखे और उनकी आवाज उठा सकता हो, उनकी चिन्ताओं से रूबरू हो सकता हो.

शर्मा कहते हैं कि अब हर पार्टी किसान कार्ड को कैश कराने के लिए भाग-दौड़ करेगी, लेकिन राहुल निश्चित रूप से आगे बढ़ गए हैं. मैं उम्मीद करता हूं कि कांग्रेस तुरन्त लाभ के लिए इस मुद्दे को नहीं देखेगी वरन अपनी सुविचारित रणनीति के तहत पूरे देश में अपने भाग्य को बदलने के लिए अपनाएगी.

हालांकि राहुल के राजनीतिक विरोधी उनके शब्दों के प्रति इतने उदार नहीं हैं और गांधी परिवार को किसानों की बदहाली के लिए दोषी ठहराते हैं. इसे राजनीतिक अवसरवाद की संज्ञा देते हुए वे कहते हैं कि यह पहली बार नहीं है कि गांधी परिवार के उत्तराधिकारी ने चुनाव के पहले इस विषय को उठाया है. विशेषकर भाजपा अपने बयानों के जरिए नेहरू-गांधी परिवार पर आजादी के बाद से ही किसानों की अनदेखी करने का आरोप लगाती रही है.

भाजपा के वरिष्ठ नेता और लखनऊ के मेयर डॉ. दिनेश शर्मा कहते हैं कि राहुल घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं. आजादी के 70 सालों में कांग्रेस ने करीब 60 साल तक राज किया है. और उन्हीं को ही इस आरोप की जिम्मेदारी लेनी चाहिए. अब वह इस मुद्दे को क्यों उठा रहे हैं? वह इससे चुनावी लाभ लेना चाहते हैं और उन्हें कोई गंभीरता से ले भी नहीं रहा है. ऐसे में उन्होंने यह तरकीब निकाल ली.

पूर्व भाजपाई अशोक यादव भी इस मुद्दे को उठाने के राहुल के समय को लेकर सवाल खड़ा करते हैं. वह कहते हैं कि कांग्रेस कहीं भी दौड़ में नहीं है, ऐसे में राहुल को गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए. राहुल किसान चेहरा भी नही हैं और राहुल की प्रोफाइल भी किसान मुद्दा उठाने वाले से मेल नहीं खाती. किसान जानते हैं कि यह अवसरवादिता है.

राहुल की 20 दिन की चहल-पहल भरी यात्रा के पूरी हो जाने पर ही उनके 'गेम चेंजर' होने के बारे में कुछ कहा जा सकेगा

यादव कहते हैं कि मुद्दा तो ठीक है, पर राहुल का समय और इरादा ठीक नहीं है. इतिहास गवाह है कि राहुल के प्रयासों का चुनावी लाभ के रूप में कांग्रेस को अपेक्षित प्रतिफल नहीं मिला है जितनी अपेक्षा वह लगाए हुए थे. लेकिन यह समय अलग है और इसका श्रेय पार्टी के रणनीतिकार प्रशांत किशोर को जाता है जिनकी आश्चर्यजनक प्रचार नीति से कांग्रेस को लेकर कुछ माहौल बना है.

राहुल की 20 दिन की चहल-पहल भरी यात्रा के पूरी हो जाने पर ही उनके 'गेम चेंजर' होने के बारे में कुछ कहा जा सकेगा. उन्होंने प्रियंका गांधी के प्रचार अभियान के लिए भी विस्तृत योजना बनाई है. और यदि प्रियंका सीधी नस छूने में सफल हो जाती हैं तो कांग्रेस की लोकप्रियता में इजाफा हो सकता है जिससे राजनीतिक मैदान में अन्य राजनीतिक खिलाड़ियों के लिए भय का माहौल बनेगा.

First published: 10 September 2016, 8:12 IST
 
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