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उत्तर प्रदेश की गन्ना सियासत भी देश की सियासत की तरह ही झूठ-सच घालमेल है

निखिल कुमार वर्मा | Updated on: 26 August 2016, 7:52 IST
(एएफपी)

15 अगस्त को लाल किले से प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी सरकार की उपलब्धियों का बखान करते हुए कहा कि उनकी सरकार ने गन्ना किसानों के 99 फीसदी बकाये का भुगतान कर दिया है. दो दिन पहले ही उत्तर प्रदेश विधानपरिषद में राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) के चौधरी मुश्ताक ने बताया कि पेराई सत्र 2015-2016 का विभिन्न चीनी मिलों पर 2116 करोड़ 97 लाख रुपये बकाया है. 

इससे पहले 26 मई को केंद्र सरकार के दो साल पूरे होने पर मोदी ने उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में हुई रैली में दावा किया था कि उनके दो सालों के कार्यकाल में गन्ना किसानों का बकाया 14 हजार करोड़ से घटकर 700 से 800 करोड़ के बीच रह गया. उत्तर प्रदेश शुगर मिल्स एसोसिशन ( यूपीएसएमए) के अनुसार 26 मई को पीएम मोदी की सहारनपुर की रैली के दिन ही उत्तर प्रदेश की गन्ना मिलों पर किसानों का 5,795 करोड़ बकाया था.

लिहाजा प्रधानमंत्री का बयान सच्चाई से परे, उत्तर प्रदेश के चुनावों के मद्देनजर और विशेषकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश की गन्ना बेल्ट के किसानों को रिझाने की कोशिश ज्यादा था. लेकिन प्रधानमंत्री से इस तरह तथ्यों की तोड़मरोड़ और अनदेखी की उम्मीद नहीं की जाती है.

26 मई को पीएम मोदी की सहारनपुर की रैली के दिन ही उत्तर प्रदेश की गन्ना मिलों पर किसानों का 5,795 करोड़ बकाया था

ये तो हुई बात गनन्ना किसानों के असल बकाये की. उत्तर प्रदेश में गन्ना किसानों के लिए नियम के अनुसार अगर भुगतान गन्ना मिल में पहुंचने के 15 दिनों के अंदर नहीं होता है तो मिल मालिकों को बकाया राशि पर ब्याज भी देना होगा. उत्तर प्रदेश सरकार ने पिछले साल एक आदेश निकालकर किसानों को मिल मालिकों द्वारा मिलने वाले ब्याज को माफ कर दिया था. 

किसान मजदूर संगठन के संयोजक वीएम सिंह बताते हैं कि राज्य सरकार ने 2011-12, 2013-14 और 2014-15 का किसानों के गन्ना मूल्य पर मिलने वाला लगभग 500 करोड़ रुपये माफ कर दिया है. वीएम सिंह ने मुताबिक मिल मालिकों के दबाव में यूपी सरकार ने शुगर इंडस्ट्रीज डिपार्टमेंट के प्रमुख सचिव से आदेश जारी कराकर चीनी मिलों को बिना ब्याज के ही बकाये का भुगतान करने की छूट दे दी. 

पीएम मोदी के दावों और राज्य सरकार के मिल मालिकों के हक में लिए फैसले से लगता है कि इन्हें उत्तर प्रदेश के 50 लाख गन्ना किसानों वास्तविक स्थिति से कोई लेना-देना ही नहीं है. गन्ना पेराई का काम शुरु हुए आठ महीने बीत चुके हैं लेकिन 23 अगस्त तक यूपीएसएमए के मुताबिक किसानों का दो हजार करोड़ रुपये बकाया है. 

गन्ना किसानों के हक में हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक केस लड़ने वाले वीएम सिंह के मुताबिक उत्तर प्रदेश सहित पूरे भारत में गन्ना किसानों का संकट आज का नहीं है बल्कि यह पिछले बीस सालों से चला रहा है.

सरकारी मदद के बावजूद भुगतान से भागते मिल मालिक

पिछले साल अप्रैल में गन्ने का बकाया करीब 21,800 करोड़ रुपये पर पहुंच गया था. गन्ना किसानों के भुगतान के लिए केंद्र सरकार ने मिल मालिकों के हित में कई कदम उठाए. सरकार ने चीनी पर आयात शुल्क को 25 फीसदी से बढ़ाकर 40 फीसदी कर दिया जबकि मिलों को 6600 करोड़ का ब्याज मुक्त कर्ज भी मुहैया कराया.

इस कर्ज में से 1200 करोड़ रुपये उत्तर प्रदेश को भी मिलना था. पिछले साल सितंबर में उत्तर प्रदेश सरकार ने चीनी मिलों के लिए 2100 करोड़ रुपये राहत की घोषणा की थी. इसके अलावा उत्तर प्रदेश सरकार ने इस साल के बजट में गन्ना मूल्य भुगतान के लिए करीब 1300 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है. 

बावजूद इसके किसानों का हजारों करोड़ रुपये बकाया है. भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत बताते हैं कि मिल मालिकों का सिर्फ चीनी मिलों का व्यवसाय नहीं होता है. मिल मालिक अन्य कामों में भी लगे होते हैं. सरकारों की ओर से मिली सहायता राशि को वो अपने दूसरे धंधों में लगा देते हैं.

जब उनसे पूछा गया कि मिल मालिक अक्सर घाटे की बात करते हैं तो उन्होंने कहा कि इन्हीं मिल मालिकों के दूसरे धंधे फायदे में होते हैं. अगर मिल चलाने से उन्हें घाटा होता है तो उन्हें यह धंधा बंद कर देना चाहिए. उत्तर प्रदेश में अभी निजी, सहकारी और निगम की 117 मिले हैं.

केंद्र सरकार ने मिल मालिकों के हित में कई कदम उठाए, उन्हें 6600 करोड़ का ब्याज मुक्त कर्ज भी मुहैया कराया

ऐसा नहीं है कि सिर्फ निजी मिलें ही भुगतान में देरी करती हैं. उत्तर प्रदेश में निगम और सहकारी चीनों मिलों की स्थिति भी भुगतान के मामले में ऐसी ही है. पिछले साल अक्टूबर से मिलों ने किसानों से राज्य सरकार द्वारा सुझाए गए न्यूनतम समर्थन मूल्य (280 रुपए प्रति क्विंटल) के हिसाब से 17,996.73 करोड़ रुपये का गन्ना खरीदा है. इसमें सहकारी चीनी मिलों ने 1811 करोड़ रुपये और निगम की चीनी मिलों ने 91 करोड़ रुपये का गन्ना खरीदा.

इस पूरी खरीद का पूरा भुगतान पिछले महीने 25 जुलाई को हुआ है. जानकार इसे अगले साल उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा का असर मान रहे हैं. वरना सहकारी और निगम की मिले भी भुगतान में लेट-लतीफी के लिए बदनाम हैं. अब उत्तर प्रदेश सरकार ने निजी मिल मालिकों के खिलाफ कार्रवाई करने की बात कही है.

कृषि विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा बताते हैं कि सरकार किसानों को प्राथमिकता सूची में नहीं रखती है. वे कहते हैं, 'ऐसा कोई कारण नहीं कि मिल मालिक बकाये का भुगतान देर से करें. कोर्ट ने कई बार कहा है कि 15 दिन के अंदर भुगतान होना चाहिए. सरकार मिल मालिकों पर सख्त नहीं है.'

देवेंद्र शर्मा सवाल उठाते हैं कि सरकारों ने मिल मालिकों को तकरीबन दस हजार करोड़ रुपये ब्याज मुक्त कर्ज दिया है. आखिर यह पैसा जा कहां रहा है? शर्मा कहते हैं, 'केंद्र सरकार 30 अगस्त तक सातवें वेतन आयोग के एरियर का हजारों करोड़ रुपये भुगतान करने की तैयारी में है. लेकिन इतनी ही तेजी किसानों के मामले में क्यों नहीं दिखाई जाती. किसानों के भुगतान में क्यों दिक्कत होती है. अगर सरकार चाहे तो कंपनियों को भुगतान के लिए मजबूर कर सकती है.'

एफआरपी और एसएपी का अंतर

उचित और लाभकारी मूल्य (एफआरपी) वह मूल्य है जिसका निर्धारण केंद्र सरकार करती है. केंद्र सरकार ने कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) की सिफारिशों के आधार पर इस साल गन्ने का मूल्य 230 रुपये प्रति क्विंटल पर बनाए रखने का फैसला किया था.

यानि पूरे देश में मिल मालिक 230 रुपए प्रति क्विंटल से कम दाम पर गन्ना किसानों को भुगतान नहीं कर सकते. हालांकि, राज्य सरकारों को अपने राज्य में सलाह आधारित मूल्य (एसएपी) तय करने की आजादी होती है. राज्य सरकारें एफआरपी से ऊपर कितनी भी कीमत की पेशकश कर सकती हैं.

इससे एफआरपी और एसएपी को लेकर किसानों और मिल मालिकों का टकराव होता है. उत्तर प्रदेश में पिछले बार वर्ष 2012-13 में गन्ना खरीद की कीमत 17 फीसदी बढ़ाकर 280 रुपये प्रति क्विंटल की गई थी. इस साल भी पेराई सत्र में इसी दर से भुगतान हो रहा है. उत्तर प्रदेश योजना आयोग के सदस्य सुधीर पंवार कहते हैं, 'राज्य सरकार एफआरपी के अलावा किसानों को 28 रुपये और मिल मालिकों को 12 रुपये अलग से भुगतान कर रही है.'

गन्ने से होने वाली आय पर अलग-अलग तर्क

किसान संगठनों का कहना है कि उनकी लागत साढ़े तीन सौ रुपए प्रति क्विंटल आती है और उनको मात्र 280 रुपए मिलते हैं और उसका भी भुगतान समय पर नहीं होता. चीनी मिल मालिकों का तर्क है कि उनको चीनी के वर्तमान मूल्य से नुकसान हो रहा है. उनकी लागत ज्यादा होती है और उन्हें कम मूल्य पर बाजार में चीनी बेचना पड़ता है. 

सच यह है कि मिल मालिकों को सिर्फ चीनी से आय नहीं होती है. गन्ने के बाई प्रोडेक्ट से भी उन्हें मुनाफा होता है. किसानों के अनुसार एक क्विंटल गन्ना पेराई में दस किलो चीनी, पांच किलो शीरा, तीस किलो बैगास और पांच किलो मैली निकलती है. मिल मालिकों को इन सभी बाई प्रोडेक्ट से मुनाफा होता है. गन्ने के खोई से बिजली बनती है और यह भी बेचा है. किसानों का दावा है कि एक क्विंटल गन्ने से करीब 500 रुपये के उत्पाद बनते हैं.

दूसरी ओर मिल मालिकों का कहना है कि यह आंकड़ा बढ़ा-चढ़ा कर बताया जा रहा है. मिल मालिकों का तर्क है कि एक क्विंटल गन्ने से दस किलो के लगभग चीनी निकलने पर ही वह किसानों को 280 रुपए का भाव दे सकते हैं लेकिन चीनी की मात्रा इससे कहीं कम होती है.

सरकार भी शीरे से मुनाफा कमाती हैं. राज्य सरकार की कमाई का एक हिस्सा शीरे से बनने वाली शराब से आता है. मिलों को अपने शीरे का 15 प्रतिशत अनिवार्य रूप से देसी शराब के उत्पादकों को देना होता है. इसके अलावा उन्हें खुले बाजार में बेचे जाने वाले हर नौ क्विंटल शीरे में से एक क्विंटल देशी दारू बनाने वालों को भी देना होता है.

एथेनॉल से बदलेगी दशा

पेट्रोल में 5 फीसदी एथेनॉल मिश्रण को आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति ने नवंबर 2012 में मंजूरी दी थी. इसके अनुसार गन्ने के शीरे और खोई से एथेनॉल बनाया जाना था. हालांकि तीन साल बाद भी इस पर काम नहीं शुरू हो सका है.

अब तेल विपणन कंपनियां चालू वर्ष की खातिर 134 करोड़ लीटर एथेनॉल खरीदने की तैयारी में है. एथेनॉल की ब्रिकी से मिल मालिकों को मुनाफा होगा. ब्राजील और अमेरिका से एथेनॉल को 30 रुपये लीटर आयात किया जाता है कि जबकि भारत में चीनी मिल 40 रुपये लीटर के आस-पास एथेनॉल की ब्रिकी करेंगे. हालांकि यह देखने वाली बात होगी कि मिल मालिक अपने मुनाफे में गन्ना किसानों को कुछ देने के लिए तैयार होते हैं या नहीं.

First published: 26 August 2016, 7:52 IST
 
निखिल कुमार वर्मा @nikhilbhusan

निखिल बिहार के कटिहार जिले के रहने वाले हैं. राजनीति और खेल पत्रकारिता की गहरी समझ रखते हैं. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी में ग्रेजुएट और आईआईएमसी दिल्ली से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा हैं. हिंदी पट्टी के जनआंदोलनों से भी जुड़े रहे हैं. मनमौजी और घुमक्कड़ स्वभाव के निखिल बेहतरीन खाना बनाने के भी शौकीन हैं.

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