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उत्तराखंड कांग्रेस को बस अदालत का सहारा

आकाश बिष्ट | Updated on: 21 April 2016, 8:13 IST
QUICK PILL
  • उत्तराखंड के नौ कांग्रेस विधायकों की बगावत के बाद राज्य सरकार संकट में घिर गई. केंद्र सरकार ने आनन-फानन में राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया.
  • पूर्व सीएम हरीश मामले को लेकर हाई कोर्ट गए. अदालत मामले की नियमित सुनवायी कर रही है. पिछले कुछ दिनों ने अदालत ने पूरे मामले में केंद्र सरकार की भूमिका पर तल्ख टिप्पणियां की हैं.

उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की मुश्किलें अभी भले ही खत्म न हुई हों लेकिन मंगलवार को उत्तराखंड हाईकोर्ट द्वारा की गई टिप्पणी से उन्हें थोड़ी राहत जरूर मिली होगी.

अदालत राज्य में धारा 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लगाए जाने को दी गयी रावत की चुनौती पर विचार कर रही थी. अदालत ने कहा कि केंद्र सरकार ने इस फैसले से "अव्यवस्था पैदा" कर दी है.

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मामले में केंद्र की भूमिका पर सवाल उठाते हुए जस्टिस केएम जोसेफ और जस्टिस वीके बिष्ट ने पूछा कि क्या केंद्र सरकार दूसरे गैरभाजपा शासित राज्यों में भी मैग्निफाइंग लेंस से राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने का मौका खोज रही थी.

अदालत ने कहा कि दलबदल राष्ट्रपति शासन लगाए जाने का एकमात्र आधार नहीं होना चाहिए और यदि आप भ्रष्टाचार के आधार पर राष्ट्रपति धारा 356 का प्रयोग करने लगे तो कोई भी सरकार पांच मिनट से ज्यादा देर नहीं टिकेगी.

उत्तराखंड हाई कोर्ट ने कहा कि जल्दबाजी में राष्ट्रपति शासन लगाना लोकतंत्र की जड़ें काटना है

अदालत की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए रावत ने कहा कि बीजेपी के लिए ये बड़ा झटका है और अब किसी गैर-बीजेपी राज्य में सरकार गिराने से पहले वो दो बार सोचेगी.

रावत ने कहा, "इस मामले में मैं एक वादी हूं और मामला न्यायालय में है तो मैं इसपर टिप्पणी नहीं कर सकता. लेकिन एक बात तय है कि बीजेपी रक्षात्मक मुद्रा में है."

केंद्र सरकार की तरफ से एडवोकेट मुकुल रोहतगी पेश हुए थे. उन्होंने अदालत से कहा, "जब मनी बिल विफल हो जाए तो दूसरा मौका नहीं दिया जा सकता. इसलिए राष्ट्रपति इंतजार करने के लिए बाध्य नहीं थे."

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सोमवार को अदालत ने केंद्र से पूछा था कि उसे राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की 'इतनी जल्दी' क्या थी? अदालत ने केंद्र सरकार के वकील से कहा, "मामले का सार ये है कि आप लोकतंत्र की जड़ें काट रहे हैं."

जस्टिस जोसेफ ने लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार को उसके कार्यकाल के आखिरी साल में हटाए जाने पर भी सवाल खड़ा किया. उन्होंने पूछा, "क्या आप किसी लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार को पांचवे साल में गिरा सकते हैं? ये फैसला राज्यपाल का होता है. वो केंद्र के एजेंट नहीं होते. वो एक तटस्थ पक्ष हैं."

दलबदलू


कांग्रेस के नौ विधायकों के पार्टी से बगावत करने के बाद ही राज्य में मौजूदा राजनीतिक संकट की नींव पड़ी. अदालत ने मंगलवार को कहा कि इन नौ विधायकों को दलबदल करने की कीमत चुकानी होगी और उनपर दलबदल कानून लागू होगा. जिसके बाद राज्य विधान सभा का समीकरण बदल जाएगा.

अदालत ने पूछा कि केंद्र सरकार को ये कैसे पता चला कि 35 विधायक सरकार के खिलाफ वोट देंगे, बिना विधानसभा में बहुमत साबित हुए?

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खबरों के अनुसार अब बीजेपी भी इन नौ विधायकों से किनारा करती नजर आ रही है. दूसरी तरफ ये विधायक अपनी अलग पार्टी बना सकते हैं.

राज्य बीजेपी के सूत्रों के अनुसार बागी विधायकों की किस्मत का फैसला लगभग हो चुका है ऐसे में बहुत संभव है कि अदालत राज्य विधानसभा अध्यक्ष के फैसले को हरी झंडी दे दे. विधानसभा अध्यक्ष ने बागी विधायकों की सदस्यता रद्द कर दी थी.

कांग्रेस की उम्मीद


राज्य कांग्रेस को  उम्मीद है कि अदालत का फैसला उनके पक्ष में होगा लेकिन मामले के जल्द सुलझने को लेकर वो आशंकित है.

राज्य कांग्रेस के प्रभारी किशोर चौधरी कहते हैं, "अगर हाई कोर्ट हमारे पक्ष में फैसला देगा तो बीजेपी सुप्रीम कोर्ट जाएगी. जिससे मामला और खिंच जाएगा."

बहुत संभावना है कि हाई कोर्ट नौ बागी विधायकों की सदस्यता खत्म करने को मंजूरी दे दे

बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह पर निशाना साधते हुए चौधरी कहते हैं, "जिस आदमी को आपराधिक आरोपों में अपने राज्य से निकाल दिया गया था उसके बीजेपी अध्यक्ष बनने के बाद आप कल्पना कर सकते हैं कि क्या हो सकता है."

चौधरी कहते हैं कि शाह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मदद से अपनी पूरी ताकत लगा देंगे ताकि हरीश रावत को विधान सभा में बहुमत साबित करने का मौका न मिले.

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मौजूदा वित्त वर्ष के लिए राज्य का बज़ट पारित नहीं हो सका है. ऐसे में चौधरी को आशंका है कि केंद्र सरकार राज्य के लिए वित्तीय सहायता की घोषणा कर सकती है ताकि आगामी चुनाव में बीजेपी के पक्ष में हवा बन सके.

मामले में ऊंट किस करवट बैठेगा ये तो वक्त बताएगा लेकिन राज्य के कांग्रेस नेताओं का एकमात्र सहारा फिलहाल अदालत ही नजर आ रही है.

First published: 21 April 2016, 8:13 IST
 
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