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उत्तराखंड: अरुण जेटली का दर्द, कितना जायज, कितना नाजायज

सौरभ दत्ता | Updated on: 10 February 2017, 1:50 IST
QUICK PILL
  • वित्त मंत्री अरुण जेटली ने न्यायपालिका पर सरकार के कामकाज में कदम-कदम पर दखल देने का आरोप लगाया है.
  • जेटली का यह बयान वैसे समय में आया है जब सुप्रीम कोर्ट और उत्तराखंड हाईकोर्ट ने 27 मार्च को उत्तराखंड में लगाए गए राष्ट्रपति शासन को खारिज कर दिया.
  • उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन को अवैध करार देने से सरकार को बड़ा झटका लगा है.

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने न्यायपालिका पर सरकार के कामकाज में कदम-कदम पर दखल देने का आरोप लगाया है. जेटली का यह बयान वैसे समय में आया है जब सुप्रीम कोर्ट और उत्तराखंड हाई कोर्ट ने 27 मार्च को उत्तराखंड में लगाए गए राष्ट्रपति शासन को खारिज कर दिया. न्यायालयों ने संघवाद और लोकतंत्र के पक्ष में फैसला दिया.

जेटली ने यह भी कहा कि जल्द ही वह दिन आ जाएगा जब न्यायपालिका कर की दरों को भी तय करने लगेगी जबकि भारत समेत दुनिया के सभी देशों में कर लगाने का विशेषाधिकार सिर्फ और सिर्फ विधायिका के पास सुरक्षित है.

वित्त मंत्री ने इस तरह का बयान दो कारणों से दिया. पहला तो यह कि अदालत ने उत्तराखंड में लगाए गए राष्ट्रपति शासन को अवैध करार दिया है और यह सरकार के लिए बड़ा झटका है. ऐसा माना जाता है कि उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने की सिफारिश के फैसले के पीछे वित्त मंत्री अरुण जेटली का हाथ था.

दूसरा विधायिका और उसके सदस्य कभी भी न्यायिक हस्तक्षेप को लेकर सहज नहीं रहे हैं. उनका हमेशा से यह कहना रहा है कि अदालत विधायिका के काम में दखल नहीं दे सकती. सरकार में शामिल मंत्रियों का हमेशा से यह कहना रहा है कि न्यायपालिक उन्हें उनके कर्तव्यों और काम के बारे में आदेश नहीं दे सकती.

माना जाता है कि उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाने में वित्त मंत्री अरुण जेटली की बड़ी भूमिका थी

हालांकि यह पहली बार नहीं हुआ है जब न्यायपालिक और विधायिका के बीच इस तरह के टकराव देखने को मिले हैं. खासकर शक्ति परीक्षण का मामला अक्सर अदालतों में ही तय होता रहा है.

तो फिर जेटली के आरोप कितने सही और जायज हैं? उत्तराखंड में शक्ति परीक्षण के 12 नियमों को तय करने के साथ उसकी रिपोर्ट तलब करके क्या सुप्रीम कोर्ट ने अपने संवैधानिक दायरे का उल्लंघन किया है? क्या इसे संसदीय परंपरा का उल्लंघन माना जाना चाहिए? इन सवालों का स्वाभाविक जवाब नहीं है. हालांकि कानूनी विशेषज्ञ इन सवालों पर एकराय नहीं हैं.

न्यायिक जबर्दस्ती या न्यायिक हस्तक्षेप?

6 मई के आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने शक्ति परीक्षण के तरीकों के बारे में स्पष्ट कर दिया था. इस पूरे मामले में कुछ सवाल उठते हैं. कोई यह पूछ सकता है कि 'क्या न्यायपालिका को विधायिका की निगरानी किए जाने की जरूरत है.'

दूसरा क्या मुख्य सचिव को विधायिका की निगरानी करने का अधिकार है जो कि विधानसभा का सदस्य नहीं होता है. गौरतलब है कि कोर्ट ने मुख्य सचिव की निगरानी में शक्ति परीक्षण कराने का आदेश दिया था.

सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट संजय हेगड़े बताते हैं कि पहले सवाल का जवाब आसानी से दिया जा सकता है. दोनों ही पक्ष चाहते थे कि कोर्ट शक्ति परीक्षण का आदेश दे. तो अब कोर्ट के आदेश के बाद किसी को इस प्रक्रिया से शिकायत नहीं होनी चाहिए. 

हेगड़े ने कहा कि खुद कोर्ट ने भी इस बात को माना था कि विधानसभा में शक्ति परीक्षण को लेकर दोनों ही पक्षों में सहमति है.

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड के मुख्य सचिव की निगरानी में शक्ति परीक्षण कराए जाने का आदेश दिया था

यह भी सच है कि जस्टिस दीपक मिश्रा और शिव कीर्ति सिंह की बेंच ने कुछ भी ऐसा नहीं कहा जो अभूतपूर्व था. उन्होंने केवल इस तरह के मामलों में सुप्रीम कोर्ट के पहले से बनाए गए नियमों को ही स्पष्ट किया.

1998 में जगदंबिका पाल मामले में कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत विशेष रुख अख्तियार किया था ताकि पूर्ण न्याय की स्थिति बहाल की जा सके. इसके बाद कोर्ट ने 2005 में झारखंड विधानसभा में होने वाले शक्ति परीक्षण की वीडियो रिकॉर्डिंग का आदेश दिया.

जहां तक दूसरे मामले का सवाल है तो सुप्रीम कोर्ट ने नेताओं के खिलाफ थोड़े कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया. कोर्ट ने कहा कि वह नेताओं को लोकतंत्र का मजाक बनाने की अनुमति नहीं देगा. यहां गौर करने वाली बात यह है कि बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने एक दूसरे पर विधायकों की खरीद फरोख्त का आरोप लगाया.

इसलिए कोर्ट ने यह आदेश दिया कि शक्ति परीक्षण किसी व्यक्ति की निगरानी में कराया जाए. कोर्ट ने इसके लिए राज्य के मुख्य सचिव को जिम्मेदारी दी.

सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल और डॉ. राजीव धवन ने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत का बचाव किया. उन्होंने न्यायिक दखल के तर्क का सख्ती से विरोध किया. इन दोनों ने जूडोक्रेसी शब्द का इस्तेमाल किया जिसका अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने विरोध किया और अदालत ने रोहतगी की बात मान ली.

हेगड़े को इस पूरे मामले में कहीं भी संवैधानिक मान्यताओं का उल्लंघन होता हुआ नहीं दिखता है. दल बदल कानून के लागू होने के बाद विधानसभा के स्पीकर की स्थिति ट्रिब्यूनल की तरह हो गई है जो सदस्यों की मान्यता खारिज किए जाने के बारे में फैसला लेता है.

दल बदल कानून के लागू होने के बाद विधानसभा के स्पीकर की स्थिति ट्रिब्यूनल की तरह हो गई है

हेगड़े बताते हैं कि ब्रिटेन के उलट भारत में संसद की शक्ति सर्वोच्च नहीं है. भारत में संविधान की ताकत को सर्वोच्च माना गया है.

उत्तराखंड में जो कुछ भी हुआ और उसके बाद कोर्ट का जो आदेश आया, उसमें जेटली का बयान स्थिति को उलझाने के लिए काफी है. आज की मौजूदा राजनीति में छल कपट आम सा हो गया है. इसलिए यह जरूरी है कि इस पर नियंत्रण रखा जाए और ऐसा करने का अधिकार संविधान ने न्यायालय को दे रखा है. 

दूसरी तरफ अदालतों में अक्सर एक झुकाव दिखता है जो निश्चित तौर पर चिंताजनक है. हालांकि संविधान निर्माताओं ने साफ तौर पर लोकतंत्र के सभी स्तंभों की शक्तियों का विभाजन कर रखा है. 

लेकिन जब संविधान लिखा जा रहा था तब भारत की राजनीति भ्रष्टाचार और अस्थिरता की राजनीति के दौर में नहीं पहुंची थी. इसलिए यह सवाल आने वाले दिना में हमेशा परेशानी का सबब बना रहेगा. निकट भविष्य में विधायिक और न्यायपालिका के बीच टकराव की स्थिति खत्म होने की कोई उम्मीद नजर नहीं आती है.

First published: 13 May 2016, 4:42 IST
 
सौरभ दत्ता @catchnews

संवाददाता, कैच न्यूज़

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