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उत्तराखंड राष्ट्रपति शासन: हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, कोई भी न्यायिक समीक्षा से बाहर नहीं

कैच ब्यूरो | Updated on: 20 April 2016, 16:12 IST

उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन के खिलाफ दाखिल याचिका पर सुनवाई के दौरान नैनीताल हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी की है. केंद्र सरकार को फटकार लगाते हुए कोर्ट ने कहा कि इस समय कोई राजा जैसी स्थिति नहीं है.

कोर्ट की डिवीजन बेंच में सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने कहा, " देश में राजा जैसे हालात नहीं हैं कि किसी भी फैसले की अदालत समीक्षा नहीं कर सकता. संविधान की भी यही मूल भावना है.

'न्यायिक समीक्षा का संवैधानिक अधिकार'


नैनीताल हाईकोर्ट में केंद्र सरकार की तरफ से जवाब में कहा गया कि राष्ट्रपति की इजाजत के बाद अदालत का अधिकार क्षेत्र खत्म हो जाता है.

राष्ट्रपति शासन को लेकर केंद्र की इस दलील पर अदालत ने कहा कि राष्ट्रपति भी गलत हो सकते हैं. सब कुछ न्यायिक समीक्षा के दायरे में है. देश के संविधान ते तहत अदालतों को ये अधिकार हासिल है.

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साथ ही अदालत ने कहा, "हमें राष्ट्रपति की बुद्धिमत्ता पर कोई संदेह नहीं है. लेकिन अदालत राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने के फैसले की समीक्षा का अधिकार रखती है."

27 मार्च से राष्ट्रपति शासन


उत्तराखंड में 18 मार्च से सियासी संकट है. वित्त विधेयक पर मत विभाजन की विपक्ष की मांग स्पीकर गोविंद सिंह कुंजवाल ने खारिज कर दी थी. स्पीकर ने मनी बिल को ध्वनि मत से पारित कर दिया.

जिसके बाद विधानसभा में अजीब हालात पैदा हो गए. पूर्व सीएम विजय बहुगुणा की अगुवाई कांग्रेस के ही 9 विधायकों ने पार्टी से बगावत कर दी. सदन के अंदर मंत्री प्रसाद नैथानी और हरक सिंह रावत में झड़प हो गई थी.  

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विपक्ष और कांग्रेस के बागी विधायकों ने रावत सरकार को अल्पमत में बताते हुए बर्खास्त करने की मांग की थी. 

जिसके बाद राज्यपाल केके पॉल ने हरीश रावत सरकार को 28 मार्च तक बहुमत साबित करने का मौका दिया था. लेकिन उससे ठीक एक दिन पहले ही केंद्र की सिफारिश पर राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया.

राष्ट्रपति शासन लगाए जाने के खिलाफ हरीश रावत ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी. सिंगल बेंच ने 31 मार्च को फ्लोर टेस्ट का आदेश दिया था. लेकिन डिवीजन बेंच ने आदेश को पलटते हुए राष्ट्रपति शासन को बहाल रखा था.

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First published: 20 April 2016, 16:12 IST
 
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