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उत्तराखंड: हाईकोर्ट की व्यवस्था में खामी पर जाएगी सुप्रीम कोर्ट की नजर

सौरव दत्ता | Updated on: 30 March 2016, 16:45 IST

उत्तराखंड हाईकोर्ट की एकल पीठ ने केंद्र सरकार द्वारा उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाने के निर्णय को निरस्त करते हुए कांग्रेस की हरीश रावत सरकार 31 मार्च को सदन में अपना बहुमत साबित करने की व्यवस्था दी है.

उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन (शुरू से ही इसकी कानूनी वैधता संदिग्ध और विवादित थी) को निरस्त करने का अदालत का निर्णय स्वागतयोग्य है, लेकिन अदालत की इस व्यवस्था का एक पहलू ऐसा भी है, जिसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा बताए गए कानून के खिलाफ माना जा सकता है.

फैसले का वह पहलू है अदालत द्वारा 31 मार्च की कार्यवाही के दौरान सदन में उपस्थित रहने के लिए एक पर्यवेक्षक (रजिस्ट्रार जनरल) की नियुक्ति करना और सीलबंद लिफाफे में पूरे मामले की रिपोर्ट अदालत को सौंपने के लिए निर्देशित करना. रजिस्ट्रार जनरल को निरीक्षक के तौर पर सदन में भेजा जा रहा है.

सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय खंडपीठ द्वारा पूर्व में दी गई एक व्यवस्था में कहा गया था कि किसी भी राज्य की विधानसभा या संसद में विश्वास मत की कार्यवाही की 'निगरानी' के लिए न्यायपालिका द्वारा कोई प्रशासनिक अधिकारी या अपना सेवानिवृत्त सदस्य नियुक्त करना पूरी तरह गलत होगा. हालांकि अदालत ने कार्यवाही को रिकॉर्ड करने के लिए सीसीटीवी कैमरे लगाने का निर्देश जरूर दिया था.

आखिर ऐसा क्या हुआ जिसने नैनीताल हाईकोर्ट को ऐसा अभूतपूर्व दिशा-निर्देश देने को मजबूर किया? शायद कोर्ट को इस बात का संदेह रहा हो कि विश्वास मत हासिल करने के दौरान संवैधानिक प्रक्रियाओं को 'हॉर्स ट्रेडिंग' (खरीद-फरोख्त) के जरिए प्रभावित किया जा सकता है. इसकी गहन आशंका भी थी.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी भी राज्य की विधानसभा या संसद में विश्वासमत की कार्यवाही की 'निगरानी' के लिए प्रशासनिक अधिकारी नियुक्त करना गलत है

हॉर्स ट्रेडिंग शब्द का अर्थ होता है - धन या राजनीतिक लाभ का लालच देकर जनप्रतिनिधियों को अपनी पार्टी बदलने को प्रेरित करना.

शीर्ष अदालत के इस कदम ने भारत के कानूनी समुदाय को पराजित अवस्था में ला दिया था. एक तरफ जहां कानून के कुछ दिग्गज राजनीति में भ्रष्टाचार को देखते हुए विश्वास मत हासिल करने की कार्यवाही की सीसीटीवी कैमरे से रिकॉर्डिंग को अच्छा मान रहे थे, वहीं कुछ अन्य का मत इससे अलग था.

इसके विरोधियों का इशारा संविधान के अनुच्छेद 212(2) की ओर था, जो विधानसभा के अध्यक्ष को यह तय करने की असीमित शक्ति प्रदान करता है कि सदन की कार्यवाही कैसे चलेगी. ऐसे में विधानसभा अध्यक्ष को निर्देश देने की शक्ति का न्यायपालिका द्वारा उपयोग कैसे उचित कहा जा सकता है? ऐसे लोगों ने खंडपीठ के तर्क की यह कहकर भी आलोचना की कि "हताश परिस्थितियां ही हताश उपायों को जन्म देती हैं." इसके कुछ और खतरों की तरफ भी लोगों की निगाह जा रही है. मसलन यह न्यायपालिका द्वारा शक्तियों को अनाधिकृत तरीके से अपने हाथ में ले लेने का रास्ता खोल देगा.

पूर्व संसद और लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी इस फैसले को लेकर बुरी तरह से नाराज हैं. उन्होंने इसे विधायिका की शक्तियों और अधिकारों में "हस्तक्षेप” बताकर अदालत की व्यवस्था पर प्रहार किया.

इसी तरह उत्तराखंड उच्च न्यायालय की एकल पीठ ने उस हद काे भी पार कर दिया, जिसे खुद सर्वोच्च न्यायालय ने पार न करने का निर्णय लिया था.

उत्तराखंड मामले में पूरे राजनीतिक विवाद में खरीद-फरोख्त का आरोप सबसे प्रमुख है, जिसने केंद्र की भाजपा सरकार को एक राज्य की सरकार के साथ टकराव की स्थिति में ला दिया है.

पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने इसे विधायिका की शक्तियों और अधिकारों में "हस्तक्षेप” बताकर इस व्यवस्था पर प्रहार किया

असल में, उत्तराखंड कांग्रेस के नौ बागी विधायकों को विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल द्वारा अयोग्य ठहरा दिया गया था.

इसलिए, विश्वास मत हासिल करने की कार्यवाही में धन बल के दुरूपयोग के खतरे ने हाईकोर्ट को ऐसी व्यवस्था देने के लिए मजबूर किया. लेकिन तब भी क्या ऐसी स्थिति किसी उच्च न्यायालय को इस योग्य बना देती है कि वह अपनी सर्वोच्च संस्था उच्चतम न्यायालय की व्यवस्था की ही अनदेखी कर दे?

केंद्र सरकार बुधवार को हाईकोर्ट की एकल पीठ द्वारा दी गई व्यवस्था के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करेगी. कोई नहीं जानता कि बहस के दौरान शायद यह पहलू भी सामने आ जाए.

बहरहाल, अब भी इस बात की पुख्ता संभावना है कि अदालत का यह कदम एक और अनावश्यक राजनीतिक साजिश को गति दे दे.

First published: 30 March 2016, 16:45 IST
 
सौरव दत्ता @SauravDatta29

Saurav Datta works in the fields of media law and criminal justice reform in Mumbai and Delhi.

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