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बनारस जेल में बलवा कैदियों नहीं, जेल प्रशासन की आपसी गुटबाजी का नतीजा है

आवेश तिवारी | Updated on: 7 April 2016, 9:22 IST

उत्तर प्रदेश के कारागार मंत्री बलवंत सिंह रामूवालिया सोमवार को जब अपनी ही सरकार और विभाग की कार्यशैली के खिलाफ बोल रहे थे तब कई लोगों को आश्चर्य हुआ था. 

बनारस की जिला जेल में तीन दिन तक चले दंगों पर रामूवालिया की राय थी कि जेलों में भ्रष्टाचार बहुत है और जेलकर्मी विभाग के मंत्री की बात भी नहीं सुनते.

varanasi jail incident

बनारस जेल का एक और सच इस उत्पात में सामने आया. शनिवार को जब जिला जेल में कथित तौर पर खाने की गुणवत्ता को लेकर बंदियों का उत्पात शुरू हुआ तो जिला जेल के अधिकारियों को स्थिति पर कबू पाना मुश्किल हो गया.

ऐसे विकट समय में मामले को शांत करने के लिए पूरे पूर्वांचल के समाजवादी पार्टी नेता अधिकारियों के साथ जेल के भीतर गए. इन नेताओं की मध्यस्थता के बाद स्थिति काबू में आई. जानकारों के मुताबिक जब भी यूपी में चुनावी आहट सुनाई देती है जेलों में इस तरह की बवालबाजियां शुरू हो जाती हैं.

कैसे भड़का कैदियों का गुस्सा

घटना के संबंध में बताया जाता है कि शनिवार की सुबह कैदियों को भोजन परोसा जा रहा था. उसी दौरान अचानक कैदी जेल प्रशासन मुर्दाबाद के नारे लगाने लगे. शुरुआत में जेल पुलिस कर्मियों ने  डांट-फटकार कर हालात को काबू में करने की कोशिश की. लेकिन मामला बिगड़ गया.

जेल सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार बहस के दौरान ही उपजेलर अजय राय से एक कैदी नागा यादव ने हाथापाई कर दी. इसके बाद जेल पुलिस कर्मियों ने कैदियों से मारपीट शुरू कर दी.

इससे कैदियों में गुस्सा और फैल गया. उन्होंने पूरी जेल को अपने कब्जे में कर लिया. हिस्ट्रीशीटर नागा यादव जिला पंचायत सदस्य पार्वती देवी का पति है. इनकी प्रदेश सरकार में मंत्री सुरेंद्र सिंह पटेल के साथ दुश्मनी जगजाहिर है. उसे क्राइम ब्रांच ने कुछ दिन पहले ही गिरफ्तार कर जेल भेजा था. सूत्र बताते हैं कि जेल में बगावत की चिंगारी को नागा यादव ने हवा दी थी.

जेल पर कब्ज़े की राजनीति

बंदियों ने मारपीट शुरू होने के बाद जेल पुलिसकर्मियों और उपजेलर अजय राय पर हमला बोल दिया. इस हमले में अजय राय का सर फट गया. वो बुरी तरह से घायल हो गए. ज्यादातर पुलिसकर्मियों ने जैसे तैसे भागकर अपनी जान बचाई.

इस हिंसा में एक दर्जन से ज्यादा पुलिसकर्मी घायल हो गए. जेल सूत्रों का कहना है कि इस मारपीट के दौरान सभी बैरकों के बंदी बाहर निकल आए. इन लोगों ने बाहर से आने वाली किसी तरह की सहायता को ब्लॉक कर दिया. 

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सैकड़ों बंदी जेल की चहारदीवारी पर खड़े होकर फ़ोर्स पर पथराव करने लगे.

इस सुनियोजित हमले से कई और सवाल पैदा हुए हैं. कैदियों के पास इतनी बड़ी मात्रा में ईंट-पत्थर कहां से पहुंचे. जाहिर है जेल की छत पर पत्थर पहले से इकठ्ठा करके रखे थे और जेल प्रशासन को इसकी भनक तक नहीं लगी.

उत्पाती कैदियों ने जेलर और डिप्टी जेलर को हटाए जाने समेत कुल छह मांग जिलाधिकारी के सामने रख दीं. जबतक ये मांगे नहीं मानी गई तब तक जेलर और दूसरे सुरक्षाकर्मियों को बंधक बनाए रखा.

कुछ कैदियों ने इस दौरान महिला बंदीरक्षकों की साड़ी के सहारे दीवार फांदकर फरार होने की कोशिश भी की. कुछ कैदियों ने घटना के दौरान जेल अधिकारियों से छीने गए मोबाइल फोन का इस्तेमाल बाहर नेताओं और मीडिया से बातचीत करने के लिए किया.

दूसरे दिन भी जारी रहा बवाल

शनिवार को शुरू हुआ बवाल रविवार को भी ख़त्म नहीं हुआ. दूसरे दिन रविवार की रात फिर से चिंगारी भड़क गई. उत्तेजित बंदियों ने बैरक में आग लगा दी. साथ ही एक बंदी की जमकर पिटाई कर दी.

बताया जाता है कि रविवार की शाम बैरक नंबर आठ में किसी बात पर हुए विवाद के बाद एक कैदी को कुछ कैदियों ने मिलकर पीट दिया. इससे पैदा हुई अफरा तफरी में कैदियों ने बैरक नंबर पांच को आग के हवाले कर दिया. 

मौके पर पहुंचे जिले के प्रशासनिक अफसरों ने किसी तरह हालात पर काबू पाया. यह सब तब हुआ जब शनिवार दिन की घटना के बाद डीआईजी जेल लगातार बनारस में कैंप किए हुए थे.

जेल की अंदरूनी राजनीति बनी वजह

बनारस के राजनीतिक गलियारों में जो चर्चा है उसके मुताबिक कैदियों का उन्माद दरअसल जेल प्रशासन की अंदरूनी राजनीति का नतीजा है. खबरों के मुताबिक बनारस जेल प्रशासन में कर्मचारियों और अधिकारियों के दो गुट हैं. एक गुट जेलर आशीष तिवारी का है. तिवारी की छवि एक ईमानदार अधिकारी की है.

बंदियों के इस उत्पात के मूल में जेलर आशीष तिवारी की सख्ती थी. दरअसल आशीष तिवारी ने जबसे जेल में कदम रखा था, न तो अपराधियों को कोई स्पेशल ट्रीटमेंट मिल पा रहा था न ही जेल प्रशासन पर किसी किस्म का राजनैतिक दबाव काम कर रहा था. 

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नतीजा यह था कि आशीष तिवारी को लेकर जेल के भीतर और बाहर दोनों तरफ नाराजगी थी. फिलहाल आशीष तिवारी को हटा दिया गया है.

बनारस जेल के एक सूत्र के मुताबिक जेल में दूसरा गुट उपजेलर अजय राय का था. कहा जा रहा है कि उन्होंने आशीष तिवारी से नाराज कैदियों के गुट को शह देनी शुरू कर दी थी. इस अंदरूनी खींचतान का नतीजा शनिवार को हुई हिंसा के रूप में सामने आया. दुर्भाग्य से जब कैदी बेकाबू हुए तब सबसे पहले खुद अजय राय ही इसकी चपेट में आ गए और बुरी तरह से घायल हो गए.

फिलहाल उपजेलर अजय राय बीएचयू के ट्रामा सेंटर में भर्ती हैं. हिंसा बढ़ती देख आनन फानन में जिले के विभिन्न थानों की फोर्स, पीएसी और एनडीआरएफ की टीमों को बुला लिया गया था. 

लेकिन बंदियों का गुस्सा इतना ज्यादा था कि अगले सात घंटे तक वे जेलर आशीष राय को बंधक बनाए रहे. घंटों चले हंगामे के बाद बंदी जिलाधिकारी से बात करने को तैयार हुए. इस दौरान जिला प्रशासन की सांस ऊपरनीचे होती रही.

बनारस जेल में हो चुकी है हत्या

बनारस जेल में दो-दो हत्याएं हो चुकी हैं. 2004 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह के कार्यकाल में 3 मार्च जेल के मुख्य प्रवेश द्वार के सामने बंदी सपा पार्षद बंशी यादव को बदमाशों ने गोलियों से भून दिया था. इस मामले में अन्नू त्रिपाठी नाम के अपराधी पर आरोप लगा.

इसके बाद 13 मई 2005 को सेंट्रल जेल में बैरक के अंदर ही अन्नू त्रिपाठी की भी गोली मार कर हत्या कर दी गयी थी. इस हत्या का आरोप एक अन्य अपराधी संतोष गुप्ता उर्फ किट्टू पर लगा था. बाद में किट्टू भी पुलिस इनकाउंटर में मारा गया.

First published: 7 April 2016, 9:22 IST
 
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