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वेदों और उपनिषदों ने भी महिला-पुरुषों में भेद नहीं किया है: सुप्रीम कोर्ट

कैच ब्यूरो | Updated on: 12 February 2016, 16:49 IST

सुप्रीम कोर्ट ने आज सबरीमाला मंदिर के मामले में सुनवाई के दौरान टिप्पणी करते हुए कहा कि जब भारतीय सभ्यता के पूरक माने जाने वाले वेदों और उपनिषदों ने महिलाओं और पुरुषों में किसी प्रकार का कोई भेद नहीं माना है तो आप इस मामले में कैसे ऐसा कर सकते हैं.

कोर्ट ने इस मामले पर कहा कि 'हम इस विषय में कोई छोटा दृष्टिकोण नहीं चाहते हैं. हम चाहते हैं कि समानता के अधिकार और धार्मिक प्रथाओं के बीच एक साम्य निकाला जाय जो संविधान सम्मत हो'.

मंदिर धार्मिक आस्था का केंद्र हैं और इसमें प्रथाओं के पालन के कुछ निश्चित स्वीकार्य मानदंड होने चाहिए.

मंदिर बोर्ड की तरफ से पेश हुए वकील केके वेणुगोपाल ने कोर्ट में अपनी दलील रखते हुए कहा कि 'सबरीमाला मंदिर में इस परंपरा का पालन हजार सालों से भी पहले से किया जा रहा है तो अब आखिर इसे कैसे रोका जा सकता है. सबरीमाला मंदिर की पूरी पहाड़ी को पवित्र माना जाता है और मंदिर प्रशासन की ओर से पीरियड के आयुवर्ग की महिलाओं को यहां प्रवेश की अनुमति नहीं है'.

मंदिर की मान्यता है कि पीरियड वाली महिलाएं अशुद्ध होती हैं और इन परिस्थितियों में मंदिर बोर्ड मंदिर प्रांगण में इन्हें प्रवेश की अनुमती नहीं देगा.

इससे पूर्व इस मामले में केरल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि राज्य के ऐतिहासिक सबरीमाला मंदिर में पीरियड के दौरान महिलाओं का प्रवेश वर्जित करना एक ‘धार्मिक मामला’ है. इसलिए भक्तों की धार्मिक परंपरा और उनकी आस्था के अधिकारों की रक्षा करना सरकार का कर्तव्य है.

सुप्रीम कोर्ट में केरल सरकार के मुख्य सचिव जीजी थॉमस ने दाखिल अपने हलफनामे में कहा था कि ट्रावणकोर-कोच्चि हिन्दू धार्मिक संस्थान कानून के तहत मंदिर प्रशासन का पूरा मामला ट्रावनकोर देवास्वम बोर्ड के पास है.

सबरीमाला मंदिर में पूजा की परंपरा के मामले में पुजारियों का निर्णय ही अंतिम माना जायेगा.

First published: 12 February 2016, 16:49 IST
 
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