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विदर्भ राज्य: जमीनी समर्थन का अभाव बीजेपी के लिए आत्‍मघाती सिद्ध होगा

अश्विन अघोर | Updated on: 15 May 2016, 18:01 IST
QUICK PILL
  • अलग राज्‍य की मांग करने वाले इस खामखयाली में हैं कि बीजेपी की सरकार 2019 के चुनाव से पहले विदर्भ को अलग राज्‍य बनाने जा रही है
  • जबकि बीजेपी अच्छे से जानती है कि यह एक आत्‍मघाती कदम होगा, क्‍योंकि इस कदम से बाकी महाराष्‍ट्र उसके हाथ से चला जाएगा

यह आम धारणा है कि छोटे राज्‍यों में प्रशासन चलाना आसान होता है. तमाम समिति और आयोगों ने बेहतर प्रशासन के लिए बड़े राज्‍यों को बांटने का समर्थन किया है.

आज तक जितने भी छोटे राज्‍य देश में बने हैं, वे इसी सोच की गवाही देते हैं. छत्‍तीसगढ़ इस मामले में एक अच्‍छा उदाहरण है जिसके गठन के बाद वहां काफी विकास देखने को मिला है.

विदर्भ के गठन के लिए दरअसल यही दलील काम कर रही है. यह इलाका अपेक्षाकृत संपन्‍न महाराष्‍ट्र में लंबे समय से उपेक्षित और पिछड़ा रहा है.

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दिक्‍कत बस इतनी है कि झारखण्‍ड और तेलंगाना की मांग से उलट विदर्भ के गठन की मांग का न तो जनता में कोई समर्थन है और न ही इसके पीछे कोई सशक्‍त नेतृत्‍व मौजूद है.

शायद यही वजह है कि विदर्भ को राज्‍य बनाने की मांग का आंदोलन आज तक खड़ा ही नहीं हो सका है.

विदर्भ की मांग

विदर्भ राज्‍य बनाने की मांग का कोई भावनात्‍मक आधार नहीं है. बीते पांच दशक के दौरान यह मांग रह-रह कर उठती रही है और कुछ दिन बाद अपने आप शांत हो जाती है.

इसके अलावा, शिवसेना की ओर से इसका कठोर विरोध भी है. इसकी तुलना में छत्‍तीसगढ़, झारखण्‍ड या उत्‍तराखण्‍ड को देखें तो मूल राज्‍यों मध्‍य प्रदेश, बिहार और उत्‍तर प्रदेश में अलग राज्‍य बनने की मांग का विरोध बेहद मामूली था.

बीजेपी की सहयोगी शिवसेना अलग विदर्भ की मांग का कठोर विरोध करेगी

इसके बजाय शिव सेना के लिए महाराष्‍ट्र की अखंडता को बनाए रखना एक भावनात्‍मक मसला है.

शिव सेना विदर्भ राज्‍य के बिलकुल खिलाफ़ है जबकि भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) समेत अन्‍य राजनीतिक दल छोटे राज्‍यों के समर्थन में हैं.

राष्‍ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के नेता शरद पवार जैसे लोग भी विदर्भ को अलग राज्‍य बनाए जाने के पक्ष में हैं.

चूंकि शिव सेना विदर्भ के गठन का विरोध करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है, लिहाजा बाकी राजनीतिक दल इस मामले में फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं.

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राजनीतिक विश्‍लेषक दीपक पवार मानते हैं कि इस मसले पर बीजेपी अपने कदम पीछे खींच चुकी है और श्रीहरि अणे की अगुवाई में चल रहा आंदोलन फणनवीस सरकार के लिए शर्मिंदगी साबित हुआ है.

दीपक पवार कहते हैं, ''अलग राज्‍य की मांग करने वाले इस खामखयाली में हैं कि बीजेपी की सरकार 2019 के चुनाव से पहले विदर्भ को अलग राज्‍य बनाने जा रही है. इसकी गुंजाइश बहुत कम है. राज्‍य सरकार इस इलाके में लंबित सिंचाई और विकास परियोजनाओं को पूरा करने में जुटी है. केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की मदद से राज्‍य सरकार ने विदर्भ की सिंचाई परियोजनाओं के लिए वित्‍तीय मदद हासिल करने के लिए कई नीतिगत बदलाव भी किए हैं.''

सरकार ने विदर्भ की अधूरी पड़ी सिंचाई परियोजनाओ को अपने हाथ में लिया है. महाराष्‍ट्र में ऐसी 28 परियोजनाएं हैं जिनमें से 13 अकेले विदर्भ की हैं.

पवार कहते हैं, ''राज्‍य सरकार नागपुर में मल्‍टीमोडल इंटरनेशनल हब (मिहान) के लिए प्रयास कर रही है. विदर्भ में कपास उत्‍पादकों को कपास का सही मूल्‍य दिलवाने के लिए एक टेक्‍सटाइल ज़ोन बनाने का भी प्रस्‍ताव है. ऐसी तमाम पहलों के आलोक में देखें तो 2019 में विदर्भ राज्‍य का गठन बीजेपी की नाकामी का एक संकेत होगा.''

बीजेपी के लिए यह एक आत्‍मघाती कदम होगा क्‍योंकि बाकी महाराष्‍ट्र उसके हाथ से चला जाएगा. उन्‍होंने कहा, ''जो भी दल अलग विदर्भ राज्‍य का गठन करेगा, उसके हाथ से बाकी महाराष्‍ट्र जाता रहेगा.''

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वे कहते हैं, ''एक सरकार ज्‍यादा से ज्‍यादा व्‍यवहारिक तरीका यही अपना सकती है कि विकास परियोजनाओं को वहां अंजाम दे. मुख्‍यमंत्री यदि विदर्भ के विकास की बात करते हैं और उसके लिए ज्‍यादा अनुदान जुटाने का प्रयास करते हैं तो शिव सेना कभी उसका विरोध नहीं करेगी क्‍योंकि वह भी यही चाहती है.''

वरिष्‍ठ पत्रकार और नागपुर के राजनीतिक‍ विश्‍लेषक श्‍याम पंधरीपंदे को इस बात का भरोसा है कि बीजेपी 2019 से पहले विदर्भ राज्‍य का गठन कर देगी.

उन्‍हें लगता है कि बीजेपी विदर्भ को अलग राज्‍य बनाने से पहले वहां ज्‍यादा से ज्‍यादा निवेश आकर्षित कर के अपने कार्यकाल में अधिकतम लंबित परियोजनाओं को पूरा करने की ख्‍वाहिश रखती है.

पंधरीपंदे ने बताया, ''ऐसे तमाम आयोग हैं जिन्‍होंने विदर्भ जैसे छोटे राज्‍यों के गठन की सिफारिश की है. इस राज्‍य का गठन इसलिए भी उपयुक्‍त और व्‍यावहारिक होगा क्‍योंकि मुंबई के मुकाबले रायपुर, हैदराबाद और भोपाल से नागपुर की दूरी कम है.''

उनका कहना है कि जब इतने सारी हिंदीभाषी राज्‍य अस्तित्‍व में हो सकते हैं तो दो मराठीभाषी राज्‍य भी आसानी से काम कर सकते हैं.

प्रतिक्रिया

पंधरीपंदे से जब पूछा गया कि 1 मई को काला दिवस मनाने और विदर्भ का झंडा लहराने के आवाहन को इतनी कमज़ोर प्रतिक्रिया क्‍यों मिली, तो वे कहते हैं, ''यह कार्यक्रम समूचे विदर्भ में आयोजित किया गया था. लोगों की कम भागीदारी की वजह यह हो सकती है कि उन्‍हें दो दिन पहले ही इसकी सूचना दी गई थी. कम भागीदारी का मतलब यह नहीं है कि आंदोलन को समर्थन कम है. केवल जनता ही नहीं, शिव सेना समेत तमाम राजनीतिक दलों के नेता भी विदर्भ के समर्थन में हैं. बस कुछ दिन की बात है और वे खुलकर सामने आ जाएंगे.'' 

दीपक पवार कहते हैं, ''जिन नेताओं के पास कोई काम नहीं है, जो चुनाव हार चुके हैं और अपनी-अपनी पार्टियों में दरकिनार कर दिए गए हैं, वे ही विदर्भ का मुद्दा उठा रहे हैं. जब उनकी पार्टी का नेतृत्‍व उन पर लगाम कसता है तब सारा मामला ठंडा पड़ जाता है.''

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वे ऐसे तमाम नेताओं के नाम गिनवाते हैं, जैसे कांग्रेस के पुराने नेता रंजीत देशमुख, बनवारीलाल पुरोहित, दत्‍ता मेघे, वसंत साठे और एनकेपी साल्‍वे. पुरोहित तो बीजेपी को छोड़कर अपनी अलग पार्टी विदर्भ राज्‍य पार्टी बना चुके थे, लेकिन लोगों ने जब उनकी पार्टी को स्‍वीकार नहीं किया तो वे वापस बीजेपी में चले आए.

इस मसले पर जब समूचे राज्‍य में चर्चा जारी थी, तब पिछले हफ्ते श्रीहरि अणे ने अपने जन्‍मदिन पर महाराष्‍ट्र की आकृति वाला एक केक काटा जिसमें विदर्भ को अलग से दिखाया गया था. वे इस हरकत के लिए खेद जताते हैं. वे कहते हैं, ''बेशक ऐसी गलती हुई है और हम उसके लिए खेद जताते हैं. ऐसा नहीं होना चाहिए था.''

अपनी योजनाओं का खुलासा करते हुए अणे कहते हैं, ''हमारे पास बाकायदे एक योजना है. विदर्भ की नीतियां और वहां का प्रशासन उन किसानों और आदिवासियों पर केंद्रित होगा जिनकी आबादी करीब 80 फीसदी है. विदर्भ राज्‍य की अपनी प्राथमिकताएं होंगी. महाराष्‍ट्र कर्ज में दबा है और उसके पास इससे उबरने के संसाधन मौजूद नहीं हैं, इसलिए वह विदर्भ के लिए कुछ भी कर पाने में अक्षम है.''

महाराष्‍ट्र कर्ज में दबा है और वह विदर्भ के लिए कुछ भी कर पाने में अक्षम है

 
वे कहते हैं, ''महाराष्‍ट्र राज्‍य के पास पैसों का इतना टोटा है कि विदर्भ के विकास को तो छोड़ दें, वहां कर्मचारियों के वेतन भुगतान तक का पैसा नहीं है.''

आर्थिक नज़रिये से देखें तो विदर्भ राज्‍य का गठन एक व्‍यावहारिक कदम जान पड़ता है. यहां इतने खनिज और वन संसाधन मौजूद हैं कि विदर्भ आत्‍मनिर्भर हो सकता है. छत्‍तीसगढ़ के जैसे यहां भी पहले ही दिन से अतिरिक्‍त बिजली मुहैया हो सकती है जिसे खुले बाज़ार में बेचकर राज्‍य भारी कमाई कर सकता है.

इसके अलावा, विदर्भ क्षेत्र में कई बड़े शहर हैं जो विकास के चालक बल की भूमिका निभा सकते हैं. यह बात अलग है कि राजनीतिक स्‍तर पर विदर्भ राज्‍य की मांग को काफी कम समर्थन हासिल है. ज़ाहिर है, अलग राज्‍य बनाने के लिए राजनीतिक इच्‍छाशक्ति की कमी के रहते आर्थिक व्‍यवहार्यता अपने आप में किसी काम की नहीं होगी.

First published: 15 May 2016, 18:01 IST
 
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