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विजय दिवस: जब भारतीय सेना के जाबाजों ने पाकिस्तान के कर दिए थे दो टुकड़े, बना बांग्लादेश

कैच ब्यूरो | Updated on: 12 December 2019, 12:06 IST

Vijay Diwas 2019: साल 1971 भारतीय इतिहास मेंं खास महत्व रखता है. इसी साल भारतीय सेना(Indian Army) के जाबांजों ने अपने असीम पराक्रम से पाकिस्तान(Pakistan) के दो टुकड़े कर दिए थे. इसके बाद आज का बांग्लादेश(Bangladesh) बना. 16 दिसम्बर 1971 को ही युद्ध में भारत ने पाकिस्तान पर जीत हासिल की थी. इस कारण यह दिन विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है.

युद्ध के अंत में 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों ने भारतीय सेना के आगे आत्मसमर्पण कर दिया था. इसके बाद पूर्वी पाकिस्तान आजाद हुआ था. बाद में यह बांग्लादेश के नाम से जाना जाने लगा. साल 1971 का युद्ध भारत के लिए ऐतिहासिक था. यह हर देशवासी के दिल में उमंग पैदा करने वाला रहा.

हालांकि इस युद्ध में करीब 3,900 भारतीय सैनिक भी शहीद हुए थे, वहीं 9,851 सैनिक घायल हुए थे. तब पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल एएके नियाजी ने भारतीय सेना के पूर्वी सैन्य कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के सामने आत्मसमर्पण किया था. इसके बाद 17 दिसम्बर को 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों को युद्धबंदी बनाया गया था.

दरअसल, पाकिस्तान के तत्कालीन सैनिक तानाशाह याहिया खान ने 25 मार्च 1971 को पूर्वी पाकिस्तान में जन भावनाओं को कुचलने का आदेश दिया. इसके बाद पाकिस्तानी सेना ने क्रांतिकारी नेता शेख़ मुजीब को गिरफ़्तार कर लिया. जिससे डरकर कई शरणार्थी लगातार भारत आने लगे.  पाकिस्तानी सेना वहां की जनता पर लगातार दुर्व्यवहार कर रही थी. 

इससे भारत पर दबाव पड़ा कि तुरंत वहां पर सेना भेजकर हस्तक्षेप करे. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने थलसेना अध्‍यक्ष जनरल मानेकशॉ से बात की. इंदिरा चाहती थीं कि भारतीय सेना अप्रैल में ही पूर्वी पाकिस्तान पर हमला कर दे. हालांकि भारत के पास तब सिर्फ एक पर्वतीय डिवीजन था. इसके पास पुल बनाने की क्षमता नहीं थी और मानसून भी दस्तक देने वाला था.

मानेकशॉ ने सियासी दबाव में झुके बिना प्रधानमंत्री से यह स्पष्ट कह दिया कि वे पूरी तैयारी के साथ ही युद्ध के मैदान में उतरना चाहेंगे. 6 महीने तक भारतीय सेना रुकी रही. 3 दिसंबर, 1971 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी कलकत्ता में एक जनसभा को संबोधित कर रही थीं. तभी पाकिस्तानी वायुसेना के विमानों ने पठानकोट, श्रीनगर, अमृतसर, जोधपुर, आगरा आदि सैन्य हवाई अड्डों पर बम गिराना शुरू कर दिया.

इससे भारत और पाकिस्तान मेें युद्ध शुरू हो गया. भारतीय सेना ने जेसोर और खुलना पर कब्ज़ा कर लिया. मानेकशॉ खुलना और चटगांव पर ही कब्ज़ा करने पर जोर देते रहे और ढाका पर कब्जा करने का लक्ष्य भारतीय सेना के सामने रखा ही नहीं गया. लेकिन 14 दिसंबर को एक गुप्त संदेश मिला कि ढाका के गवर्नमेंट हाउस में एक महत्वपूर्ण बैठक होने वाली है, इसमें पाकिस्तानी के बड़े अधिकारी भाग लेने वाले हैं.

तब भारतीय सेना ने तय किया कि इस समय भवन पर बम गिराए जाएं. बैठक के दौरान मिग 21 ने भवन पर बम गिराकर हॉल की छत उड़ा दी. पाकिस्तानी सेना के ढाका में 26,400 सैनिक थे, वहीं भारतीय सेना के पास सिर्फ़ 3,000 जवान थे. फिर भी भारतीय सेना ने युद्ध पर अपनी पकड़ पूरी तरह से बना ली.

शाम को साढ़े चार बजे जनरल अरोड़ा और नियाज़ी ने आत्म-समर्पण के दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए. नियाज़ी ने जनरल अरोड़ा के सामने अपने बिल्ले उतारे और रिवॉल्वर निकालकर उनके हवाले कर दिया. नियाज़ी की आंखों में आंसू थे. स्‍थानीय लोग नियाज़ी की हत्‍या पर उतारू दिख रहे थे. लेकिन भारतीय सेना के अधिकारियों ने नियाज़ी के चारों तरफ़ सुरक्षित घेरा बना दिया. इसके बाद नियाजी को बाहर निकाला गया.

जनरल मानेकशॉ ने पीएम इंदिरा को बांग्लादेश में मिली शानदार जीत की ख़बर दी. इंदिरा गांधी ने लोकसभा में घोषणा की कि युद्ध में भारत को जीत मिली. इसके बाद पूरा सदन जश्‍न में डूब गया.

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First published: 12 December 2019, 11:24 IST
 
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