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विजय दिवस: 1971 के युद्ध में पाकिस्तान को इन कारणों से मिली थी मात, भारत ने फहराया था तिरंगा

कैच ब्यूरो | Updated on: 12 December 2019, 14:12 IST
(File Photo)

Vijay Diwas 2019 : भारत ने पाकिस्तान को 1971 के युद्ध (1971 War) में मात देकर पूर्वी पाकिस्तान (East Pakistan) को आजाद कराया था. इसके बाद दुनिया के नक्शे पर एक नए देश 'बांग्लादेश' का उदय हुआ. पाकिस्तानी सेना ने 16 दिसंबर 1971 को भारतीय सेना के सामने घुटने टेक दिए थे. इस दिन के बाद पाकिस्तान, भारत को अपने किसी बड़े दुश्मन की नजर से देखने लगा. विजय दिवस के मौके पर आज हम आपको इस युद्ध से जुड़े कुछ ऐसे पहलुओं के बारे में बताने जा रहे हैं जिनके बारे में आप नहीं जानते होंगे.

1971 के युद्ध में पाकिस्तान (Pakistan) को भारत के हाथों बड़ी हार का सामना करना पड़ा था. इस युद्ध में पाकिस्तान के हारने और भारत के जीतने की भूमिका में दोनों देशों की सरकारों ने अहम भूमिकाएं निभाई थीं. उस वक्त जहां पाकिस्तान की कमान सैन्य तानाशाह याहया खान के हाथ में थी वहीं भारत के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) बैठी थीं. जिसके चलते भारत में राजनीतिक डिप्लोमेसी, ब्‍यूरोक्रेसी और मिलिट्री के बीच अच्छा सामंजस्य था, वहीं पाकिस्तान में सैनिक शासन होने के चलते सबकुछ बिखरा-बिखरा था.

1971 की जंग से पहले भारत ने रूस के साथ समझौता किया था और भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर बांग्लादेश की रिफ्यूजी समस्या को जोरदार ढंग से उठाया था. वहीं पाकिस्तान को उम्मीद थी कि इस युद्ध में अमेरिका और चीन उसकी मदद करेंगे. क्योंकि अमेरिका ने पाकिस्तान की मदद के लिए अपे सेवंथ फ्लीट बेड़े को हिंद महासागर में डियेगो गार्सिया तक भेज दिया था, लेकिन जैसे ही भारत ने रूस के साथ समझौता किया,रूस ने भारत की मदद के लिए अपनी न्यू्क्लियर सब मरीन भेजी थी. जो भारत के लिए मददगार साबित हुई थी.

इस जंग में भारत ने पूर्वी पाकिस्तान में तेजी से वॉर कर तीन दिन में ही एयर फोर्स और नेवल विंग को तबाह कर दिया. इस वजह से पूर्वी पाकिस्तान की राजधानी ढाका में पैराट्रूपर्स आसानी से उतर गए, जिसका पता जनरल एएके नियाजी को 48 घंटे बाद लगा.

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इस दौरान पाकिस्तान में निर्णय लेने की ताकत सिर्फ केंद्र के पास थी. इस वजह से कोई फैसला नीचे तक आने में समय लगता था. जिसके चलते पाकिस्तान तेजी से कोई स्ट्रेटजी नहीं बना पाया. वहीं भारत में चीफ ऑफ द आर्मी स्टाफ मानेकशाॅ ने फैसले लेने का पावर दोनों कोर कमांडरों को दिया था. जिससे भारतीय सेना तेजी से निर्णय लेकर पाकिस्तानी सेना पर हमले कर रही थी. पश्चिमी पाकिस्तान ने पूर्वी पाकिस्तान में 'क्रेक डाउन' शुरू कर दिया. इस वजह से पूर्वी पाकिस्तान की सेना रेप, मर्डर और लोगों को प्रताड़ित करने लगी. इससे आर्मी का अनुशासन भंग हो गया. ऐसे में जब उनका सामना भारतीय सेना से हुआ तो उन्हें हारकर सरेंडर करना पड़ना.

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पाकिस्तान को इस युद्ध में हार का ही सामना नहीं करना पड़ा बल्कि उसे भारत की युद्ध रणनीति तक का ही पता नहीं चला. पाकिस्तान को ये उम्मीद थी कि भारत की सेना पूर्वी पाकिस्तान में नदियों को पार कर ढाका तक नहीं पहुंच पाएगी. ऐसे में वह बॉर्डर पर ही उलझे रहेंगे. लेकिन ये पाकिस्तान की भूल साबित हुई. वहीं भारतीय सेना ने पैराट्रूपर्स की मदद से ढाका को ही घेर लिया और मुक्ति वाहिनी की मदद से पूर्वी पाकिस्तान के बार्डर से अंदर तक घुस गई. उसके बाद जो हुआ वो आज पूरी दुनिया के सामने है.

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First published: 12 December 2019, 14:12 IST
 
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