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एमनेस्टी इंटरनेशनल: बस्तर में हिंसा के तीसरे दौर की आहट है

सुहास मुंशी | Updated on: 19 April 2016, 20:22 IST

छत्तीसगढ़ के माओवादग्रस्त बस्तर जिले में हिंसा के एक नए दौर की आहट सुनाई दे रही है. नयी दिल्ली में एमनेस्टी इंटरनेशनल द्वारा जारी एक रिपोर्ट ‘ब्लैकआउट इन बस्तर’ जारी किये जाने के दौरान मौजूद वकीलों, कार्यकर्ताओं और पत्रकारों की मानें तो यह दौर ठीक वैसा ही है जैसा 2005-06 के सलवा जुडूम और 2009-10 के ऑपरेशन ग्रीन हंट के दौरान था.

इस बात को मानने के कई कारण हैं कि वहां सुरक्षा बल नक्सलियों के खात्मे के साथ-साथ उन लोगों को भी खत्म कर देना चाहते हैं जो सरकारी के हिंसक विचारों की राह में रोड़ा बन रहे हैं.

जो पत्रकार सरकारी नजरिए के मुताबिक काम नहीं करते या उनका साथ नहीं देते, उन्हें जेल भेजा जा रहा है, यातनाएं दी जाती है और उन पर गंभीर आरोप थोपे जा रहे हैं. कुछ लोग डर के मारे घर-बार छोड़ कर राज्य से बाहर चले गये हैं. यही नहीं, पुलिस की ओर से सहायता प्राप्त कुछ नागरिक संस्थाएं भी इस खेल में बढ़ चढ़कर सरकारी खेल में हिस्सा ले रही हैं और मानवाधिकारों का गला घोंट रही हैं.

भारत में सबसे अधिक सेना के जवान छत्तीसगढ़ में तैनात हैं: बेला भाटिया

गिरफ्तारियों, नकली आत्मसमर्पण और इनकाउंटर में नागरिकों की मौत के मामलों में हाल के दिनों में तेजी आई है. साल 2016 का अभी शुरुआती दौर है, अब तक कम से कम तीन मामले ऐसे आ चुके हैं जिनमें सुरक्षा बलों पर सामूहिक यौन हिंसा और बलात्कार के आरोप लग चुके हैं.

जानी मानी विद्वान और मानवाधिकार कार्यकर्ता बेला भाटिया को सामाजिक एकता मंच ने राज्य बाहर जाने के लिए प्रताड़ित किया. यह स्थानीय पुलिस द्वारा सहायता प्राप्त एक मोर्चा था, जो हाल ही में टूट गया है. लेकिन इस तरह के कुछ और मोर्चे अभी भी बदस्तूर जारी हैं. बेला भाटिया के मुताबिक भारत में सबसे अधिक सेना के जवान छत्तीसगढ़ में तैनात हैं. एक दशक पहले इनकी संख्या 40 हजार थी, जो अब बढ़कर 42 हजार हो चुकी है.

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वह बताती हैं, “सैन्य बलों की संख्या इस समय अपने शीर्ष स्तर पर है. छत्तीसगढ़ में इस समय नागरिकों और सैन्य बलों का अनुपात 50:1 का है. इस साल अब तक 56 इनकाउंटर हो चुके हैं.”

भाटिया बताती हैं कि सलवा जुडूम के बाद बस्तर के लोगों को अच्छी तरह पता है कि सैन्य बलों द्वारा प्रायोजित और समर्थित राज्य क्या कर सकता है. इस समय निरीह आदिवासियों को यही डर सता रहा है.

“ऐसी सैन्य व्यवस्था के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेपों के बावजूद पुलिस ने कोया कमांडोज और डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड्स जैसे बलों का गठन किया है. इन्हें हथियार देने की जरूरत नहीं होती. इन बलों में आधे से ज्यादा जवान आत्मसमर्पण किये हुए नक्सली हैं. अब उनका इस्तेमाल माओवादियों के मौजूदा कैडर पर आक्रमण करने के लिए हो रहा है.”

इसके अलावा पुलिस लोगों पर ऐसी धाराओं में अभियोग लगा रही है जो कई आधारभूत मानव अधिकारों का उल्लंघन करती हैं, मसलन अनलॉफुल एक्टिविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट (यूएपीए) या छत्तीसगढ़ स्पेशल पब्लिक सिक्योरिटी एक्ट (सीएसपीएसए).

बिनायक सेन को यूएपीए के तहत आरोप लगा कर गिरफ्तार किया गया था. इसी तरह  एक स्थानीय पत्रकार संतोष यादव पर यूएपीए और सीएसपीएसए दोनों के तहत आरोप लगाया गया. अपराध यह था कि उन्होंने पुलिस द्वारा आदिवासियों के उत्पीड़न की खबरें लिखी थीं.

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यादव की वकील ईशा खंडेलवाल कहती हैं, “पुलिस ने उनको साल 2013 से परेशान करना शुरू किया. एक बार तो उन्होंने उनको कस्टडी के दौरान नंगा कर दिया और अपमानित किया. उन पर काफी दबाव डाला गया कि वह खबरी बन जायें.”

बस्तर के समाचार पत्र भूमकाल समाचार के संपादक कमल शुक्ला बताते हैं कि बस्तर पुलिस के आईजी ने उन पर सीएसपीएसए लगाने की धमकी दी थी.

वह बताते हैं, “जब मैं और मेरे कुछ साथी पत्रकार हमें निशाना बनाये जाने का विरोध कर रहे थे, तब आईजी एसआरपी कल्लुरी ने मुझ पर सीएसपीएसए लगाने की धमकी दी थी. और उन्होंने मेरे सामने विकल्प रखा- या तो पत्रकारिता छोड़ दो या बस्तर छोड़ दो.”

शुक्ला अभी भी बस्तर में रिपोर्टिंग करते हैं और वहां माओवादियों और सैन्य बलों द्वारा की गयी हिंसा के खिलाफ खबरें लिखते हैं.

एक ऐसा ही मामला इस साल 18 जनवरी को हुआ जब छत्तीसगढ़ के बीजापुर में कथित तौर पर सैन्य बलों द्वारा 16 आदिवासी महिलाओं का गैंगरेप किया गया.

16 में से आठ पीड़ित महिलाएं, जिनके लिए चलना भी मुश्किल हो गया था, एफआईआर लिखवाने के लिए जिला पुलिस मुख्यालय पहुंचीं.

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इन पीड़िताओं का भी मामला देख रही खंडेलवाल कहती हैं, “पीड़िताओं के इस लिखित बयान के बावजूद कि वे आरोपियों को पहचानती हैं और उनके चिकित्सकीय परीक्षण के लिए तैयार होने के बाद भी पुलिस को महज एक एफआईआर दर्ज करने में पांच दिन लग गये. अब तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है.”

एमनेस्टी इंटरनेशनल के सीनियर पुलिस एडवाइजर शैलेश राय कहते हैं, 'सामूहिक यौन हिंसा की हालिया घटनाएं, आलोचकों को चुप कराने के लिए इस्तेमाल किये जाने वाले अत्याचारपूर्ण कानून, गलत आरोप लगा कर कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को जेल में भेजना- कुल मिला कर ये सारी चीजें बेहद परेशान करने वाली हैं.”

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आखिर क्यों वहां हिंसा में अचानक से बढ़ोत्तरी हो गई है, यह पूछे जाने पर वह बताते हैं, “मुझे नहीं पता. कुछ ऐसी खबरें हैं कि राज्य सरकार अब आक्रामक तरीके से आगे बढ़ने की योजना बना रही है. कुछ लोग ‘मिशन 2016’ की बातें करते हैं. लेकिन यह बात साफ दिख रही है कि सरकार और उसकी एजेंसियों पर इस बात का काफी दबाव है कि वे कुछ करती दिखें.”

शायद यही वह वजह है कि आए दिन छत्तीसगढ़ से मानवाधिकार उल्लंघन की खबरें सामने आ रही हैं, लेकिन इनका विरोध करने वाले बहुत कम लोग सामने आ रहे हैं.

First published: 19 April 2016, 20:22 IST
 
सुहास मुंशी @suhasmunshi

He hasn't been to journalism school, as evident by his refusal to end articles with 'ENDS' or 'EOM'. Principal correspondent at Catch, Suhas studied engineering and wrote code for a living before moving to writing mystery-shrouded-pall-of-gloom crime stories. On being accepted as an intern at Livemint in 2010, he etched PRESS onto his scooter. Some more bylines followed in Hindustan Times, Times of India and Mail Today.

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