Home » इंडिया » Violence prone Bengal under EC scrutiny
 

पश्चिम बंगाल में वास्तव में अराजकता है या चुनाव आयोग की अतिसक्रियता है?

रजत रॉय | Updated on: 11 February 2017, 6:44 IST
QUICK PILL
  • चुनाव आयोग द्वारा मतदान तिथियों की घोषणा से काफी पहले ही पश्चिम बंगाल के तमाम जिलों में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की 100 टुकड़ियों ने फ्लैग मार्च शुरू कर दिया था. जल्द ही 600 अन्य टुकड़ियां भी इनमें शामिल होंगी. 
  • इस बार चुनाव आयोग ने तेजी दिखाते हुए चुनाव तिथि की घोषणा से काफी पहले ही उपाय अपनाना शुरू कर दिया. आयोग ने प्रदेश सरकार से उन अधिकारियों के बारे में भी जानकारी मांगी है जिन्हें 2014 लोकसभा चुनाव के बाद हटा दिया गया था. 

चुनाव आयोग द्वारा मतदान तिथियों की घोषणा से काफी पहले ही पश्चिम बंगाल के तमाम जिलों में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की 100 टुकड़ियों ने फ्लैग मार्च शुरू कर दिया है. जल्द ही 600 अन्य टुकड़ियां भी इनमें शामिल होंगी.

इससे पहले कभी भी पश्चिम बंगाल में निष्पक्ष और शांतिपूर्ण मतदान के लिए अर्धसैनिक बलों की इतना भारी तादाद चुनाव आयोग द्वारा नहीं लगाई गई थी. 2014 के लोकसभा चुनाव में भी अर्धसैनिक बलों की यह संख्या 500 तक ही सीमित रही थी. वह भी मतदान के एक दिन पहले ही तैनात की गई थीं. 

लेकिन इस बार अर्धसैनिक बल एक मार्च को ही पहुंच गए और अपनी बैरकों-शिविरों में रुकने के बजाए फ्लैग मार्च शुरू कर दिया. चार अप्रैल से लेकर 16 मई तक पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और केंद्र शासित प्रदेश पुड्डुचेरी में विभिन्न चरणों में विधानसभा चुनाव की घोषणा की जा चुकी है.

बंगाल में चुनावी हिंसा का इतिहास काफी पुराना रहा है. बूथ कैप्चरिंग के मुद्दे पर मतदान वाले दिन अक्सर खून खराबे की घटनाएं होती रही हैं. चुनाव आयोग द्वारा बढ़ाई जाने वाली सतर्कता और तमाम टेलीविजन चैनलों की मौजूदगी के बावजूद भी यहा हिंसा रुकी नहीं.

बंगाल में कुल 77,246 मतदान केंद्र हैं, जिनमें से 23,809 की संवेदनशील और 8,172 की अतिसंवेदनशील के रूप में पहचान की गई है

2011 के बाद से हुए कुछ चुनावों में एक पैटर्न उभरा हैः जिसमें देखा गया कि विपक्ष की ओर झुके संभावित ग्रामीण मतदाताओं को उनके मतदान स्थल पर पहुंचने ही नहीं दिया जाता है. सत्तारूढ़ पार्टी के लोग बाइकों पर हथियार लेकर घूमते हुए मतदान स्थल तक जाने वाले मार्गों पर कब्जा जमा लेते हैं. मतदान केंद्रों के अंदर विपक्षी दलों के पोलिंग एजेंट्स को बैठने की अनुमति तक नहीं थी. 

सत्तारूढ़ पार्टी के समर्थक ईवीएम (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन) के पास खड़े होकर मतदान प्रक्रिया पर नजर बनाए रहते और यह सुनिश्चित करते कि कोई उनके खिलाफ मतदान न कर पाए. 

मतदान केंद्रों पर तैनात चुनाव अधिकारियों और राज्य पुलिसबलों को भी पूरी प्रक्रिया पर आंख बंद करने के लिए कह दिया जाता था और अगर कोई विरोध करता तो उसकी पिटाई की जाती थी. डर का आलम यह था कि काफी संख्या में मतदाता मतदान केंद्रों तक जाने से बचते थे.

2014 में आयोजित अंतिम आम चुनाव में जब बसीरहाट विधानसभा स्थित गांव के सैकड़ों मतदाता सत्तारूढ़ पार्टी के गुंडों का विरोध करते हुए वोट डालने जाने लगे तो कथित रूप से स्थानीय तृणमूल कांग्रेस विधायक और उसके पति के कहने पर उनके हथियारबंद गुंडों द्वारा गोलियां चला दी गईं. 

राज्य की पुलिस ने इस पर कुछ नहीं किया और वहां पर केंद्रीय अर्धसैनिक बल भी नहीं लगाए गए. वास्तव में मतदान के दिन पूरे राज्य में ज्यादातर केंद्रीय बलों की अनुपस्थिति रही और वे बैरकों-शिविरों तक ही सीमित रहे.

भाजपा, प्रदेश अध्यक्ष द्वारा हाल ही में दी गई हेट स्पीच बीरभूम और प्रदेश में समर्थकों के गिरते मनोबल को पुनर्जीवित करने का हताशा भरा प्रयास था

बंगाल में कुल 77,246 मतदान केंद्र हैं, जिनमें से 23,809 की संवेदनशील और 8,172 की अतिसंवेदनशील के रूप में पहचान की गई है. अगर इनकी जिलावार गिनती की जाए तो उत्तरी 24 परगना, दक्षिणी 24 परगना, पूर्व मिदनापुर, बीरभूम, हुगली, मुर्शीदाबाद, कूच बिहार और उत्तर दिनाजपुर में सबसे ज्यादा संवेदनशील मतदान केंद्र हैं.

बीरभूम की बदनामी 2013 में हुए पंचायत चुनाव में उजागर हुई. तब टीएमसी जिलाध्यक्ष अनुब्रत मंडल ने एक भाषण में अपने समर्थकों से पुलिस पर बम फेंकने और स्वतंत्र उम्मीदवारों के घर जला देने की अपील की थी. मंडल के भाषण एक एक सप्ताह से भी कम वक्त में एक स्वतंत्र उम्मीदवार सागर घोष की उसके गांव में ही घर में गोली मारकर हत्या कर दी गई. 

विपक्षी दलों ने घोष की हत्या के लिए टीएमसी समर्थकों को उकसाने का आरोप मंडल पर लगाया. लेकिन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मंडल का समर्थन किया और उन्हें एक कुशल आयोजक बताते हुए अंत तक उसका साथ देने की बात कही.

बीते 20 सालों में बीरभूम में हुए एक के बाद एक खूनी संघर्ष में तमाम लोगों की जानें गईं. यह चलन अभी भी बेरोकटोक जारी है. सत्ताधारी पार्टी के अंदर और बाहर दोनों ओर संघर्ष मौजूद है. शायद यही वजह रही कि 2014 में लोगों ने बड़े पैमाने पर वाम दलों और कांग्रेस की बजाए भाजपा को वोट दिए ताकि केंद्र में बनने वाली संभावित नरेंद्र मोदी की सरकार यहां एक निवारक के रूप में काम कर सके.

शुरुआत में बीरभूम में ताकतवर भाजपा की टीएमसी समर्थकों के साथ कई बार हिंसक झड़पें हुईं. लेकिन कुछ वक्त बाद राज्य पुलिस के साथ मिलकर टीएमसी ने उन्हें आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर कर दिया.

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष द्वारा हाल ही में दी गई हेट स्पीच बीरभूम और प्रदेश में समर्थकों के बीच पार्टी के गिरते मनोबल को पुनर्जीवित करने का हताशा भरा प्रयास था. देशभक्ति पर हाल ही में उपजे विवाद के बाद घोष ने बीरभूम में पार्टी कार्यकर्ताओं की बैठक में चेतावनी दी थी, "अगर कोई भी पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाता है तो उसे ऊपर से छह इंच छोटा कर दिया जाएगा."

सत्तारूढ़ पार्टी के लोग हाथों में हथियार लेकर गश्त करते हैं, ग्रामीण मतदाताओं को उनके मतदान स्थल पर पहुंचने ही नहीं देते

सीताराम येचुरी के नेतृत्व में सीपीआईएम का दो सदस्यीय दल दो मार्च को केंद्रीय चुनाव आयोग से मिला और उन्हें शांतिपूर्ण और निष्पक्ष ढंग से चुनाव कराने के लिए उचित कार्रवाई करने का ज्ञापन सौंपा. ज्ञापन में उन्होंने मतदाताओं को हिंसामुक्त चुनाव प्रक्रिया मुहैया कराने, मतदाताओं के घरों से लेकर मतदान केंद्रों तक सुरक्षा के पुख्ता बंदोबस्त करने, क्षेत्रों के आधार पर निष्पक्ष सुरक्षाबलों की नियुक्ति करने की बात कही. उन्होंने न्यायिक व्यवस्था पर भी चुनाव के दौरान खतरा मंडराने की बात कही.

इस बार चुनाव आयोग ने काफी तेजी दिखाते हुए चुनाव तिथि की घोषणा से काफी पहले ही उचित उपाय अपनाना शुरू कर दिया. आयोग ने प्रदेश सरकार से उन अधिकारियों के बारे में भी जानकारी मांगी है जिन्हें 2014 लोकसभा चुनाव के बाद हटा दिया गया था. इसके अलावा गतवर्ष निकाय चुनाव में जिन अधिकारियों के खिलाफ शिकायत की गई थी उनकी भी सूचना मांगी है.

First published: 7 March 2016, 9:22 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी