Home » इंडिया » Vocal Insinuations And Unequivocal Silences Over Mahmood Farooqui's Conviction
 

'अपने' और 'पराए' के फर्क के चलते महमूद फारुक़ी को लेकर खामोशी

सिमीं अख़्तर नक़वी | Updated on: 11 February 2017, 7:54 IST
QUICK PILL
  • दास्तानगोई की पहचान और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने की छवि रखने वाले महमूद फारुकी को दिल्ली की एक अदालत ने बलात्कार के  मामले में दोषी करार दिया है.
  • महमूद फारुकी के ऊपर एक अमेरिकी महिला ने रेप करने का आरोप लगाया था. फास्ट ट्रैक कोर्ट ने उन्हें दोषी पाया है. मंगलवार को किसी भी समय उनकी सजा का एलान हो सकता है.

दास्तानगोई की पहचान और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने की छवि रखने वाली मशहूर शख्सियत महमूद फारुकी को दिल्ली की एक फास्ट ट्रैक अदालत ने बलात्कार के  मामले में दोषी करार दिया है. फारुकी चर्चित फिल्म पीपली लाइव के सह निर्देशक भी रहे हैं. फारुकी पर जबरदस्ती एक अमेरिकी महिला के साथ ओरल सेक्स का आरोप लगा था और अब वह इस मामले में दोषी करार दिए जा चुके हैं.

फारुकी का न तो मीडिया ट्रायल हुआ और न ही खुर्शीद अनवर के मामले की तरह उन्हें किसी तरह के गुस्से का सामना करना पड़ा. मैं यह मान सकती हूं कि मीडिया ने शायद खुर्शीद अनवर के प्रकरण से चेतते हुए फारुकी के मामले में सावधानी बरती.

खुर्शीद अनवर ने मीडिया ट्रायल के दबाव में आकर आत्महत्या कर ली थी. अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रामचंद्र सिरस को भी आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ा, हालांकि उनसे जुड़े विवाद का संदर्भ थोड़ा अलग था. हालांकि यह कितना सच है, इसके बारे में अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी. 

फारुकी एक प्रभावशाली व्यक्ति हैं और इस बात की पूरी संभावना है कि वह इस मामले के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील करेंगे और यह भी हो सकता है कि उन्हें वहां से राहत मिल जाए. 

फारुकी के दोस्त रहे दानिश हुसैन का बयान और पीड़ित लड़की को ईमेल पर भेजे गए माफीनामे को अदालत में बतौर सबूत पेश किया गया. ऐसे में अदालत के फैसले का स्वागत किया जाना चाहिए था. आम तौर पर यौन हिंसा के मामले में किसी व्यक्ति को निशाना बनाकर एक तरह का अभियान चलाया जाता है.

पीपली लाइव के सह निर्देशक महमूद फारुकी को दिल्ली की अदालत ने बलात्कार का दोषी पाया है

लेकिन फारुकी के मामले में आए फैसले को लेकर बेहद नपी तुली प्रतिक्रियाएं आईं. इससे यह बात एक बार फिर से साबित होती है कि हम जेंडर पॉलिटिक्स और कार्यस्थल पर होने वाले यौन उत्पीड़न को हत्या या यौन हिंसा के मुकाबले कमतर अपराध मानते हैं. 

इन मामलों में पीड़ित को ही संदेह की नजर से देखा जाता है. जबकि यौन हिंसा, हत्या या फिर आत्महत्या जैसे मामले को ही हम गंभीर अपराध की नजर से देखते हैं. मसलन जीके अरोड़ा केस में आरोपी पर आत्महत्या के लिए उकसाने का भी अभियोग लगा.

इन मामलों में हमारी प्रतिक्रिया अपराध की क्रूरता और उसके परिणाम से तय नहीं होती. जिन लोगों ने भी जीके अरोड़ा और टेरी के मुखिया रहे आरके पचौरी के मामलों को देखा होगा, उन्हें यह बात बेहतर तरीके से पता होगी. इन मामलों में हमारी प्रतिक्रिया आरोपी के वर्ग और सामाजिक हैसियत से तय होती है. साथ ही यह शिकायतकर्ता और आरोपी के बीच के वर्गीय समीकरण से भी तय होता है.

निर्भया मामले में बलात्कारियों को जन आक्रोश का सामना करना पड़ा क्योंकि 'हम' उच्च मध्यम वर्ग के लोग एक निम्न वर्गीय बस चालक द्वारा किए गए बलात्कार को बर्दाश्त नहीं कर सकते थे. 

हम बस चालक राम सिंह को हमेशा दूसरे दर्जे के व्यक्ति के तौर पर देखने के आदी है और उसके खिलाफ गुस्से को जायज मानते हैं. हमें उसे लेकर तब भी कोई तकलीफ या गुस्सा नहीं आता है जब वह तिहाड़ के जेल की एक कोठरी में फांसी पर लटका पाया जाता है.

महमूद फारुकी को यह सहूलियत इसलिए मिल गई क्योंकि हमने आसानी से उन्हें अपने बीच का हिस्सा मान लिया क्योंकि आरोप लगाने वाली महिला अमेरिकी है और हमारे मन में उसकी छवि एक 'चालू और बिंदास' महिला की है. इस वजह से हमने बड़ी आसानी से उसे बाहरी मान लिया.

मेरी चिंता यह है कि मध्य वर्ग की स्वघोषित सामाजिक चेतना खाप पंचायतों की शैली में काम करती दिख रही है

वास्तव में महमूद फारुकी का मामला आरोपी के प्रतिकूल ट्रायल का नहीं है बल्कि यह शिकायतकर्ता की चुप्पी का ट्रायल है.

मेरी चिंता यह है कि मध्य वर्ग की स्वघोषित सामाजिक चेतना खाप पंचायतों की शैली में काम करती दिखाई देती है और वह उन लोगों पर फैसले देने की जल्दबाजी में रहती है जिन्हें वह अपने से 'अलग' मानकर चलती है.

अपने बीच का, 'शिक्षित' और 'संस्कारी' होने की वजह से हम उसे किसी भी तरह से शत्रु के तौर पर नहीं देखते बल्कि हम उसे 'अपने' बीच का हिस्सा मानकर देखते हैं. जबकि पीड़िता को हम बाहरी मान लेते हैं.

हो सकता है कि फारुकी या पचौरी जैसे लोग समाज के लिए बेहद उपयोगी हों लेकिन एक निष्पक्ष सुनवाई और सामाजिक एकजुटता की भावना न्यायपूर्ण और लैंगिक भेदभाव से रहित समाज बनाने में ज्यादा मददगार साबित होगा.

महमूद फारुकी मुस्लिम हैं और हो सकता है कि उन्हें मीडिया के एक धड़े की तरफ से निशाना बनाया जाय लेकिन केवल मुस्लिम होने की वजह से उन्हें आसानी से छूटने या प्रगतिशील समाज के सामाजिक प्रतिबंधों से बच निकलने की अनुमति नहीं दी जा सकती. खासकर वैसे मामले में जहां एक पूरी न्यायिक प्रक्रिया का पालन करते हुए उन्हें दोषी करार दिया गया है.

First published: 2 August 2016, 3:06 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी