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...रहे बेचारे रामलला, तो वो पिछले 24 वर्षों से तिरपाल में हैं

व्यालोक | Updated on: 26 May 2016, 20:41 IST
(कैच)
QUICK PILL
भक्त यानी वह तबका जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कट्टर समर्थक माना जाता है. जब मोदी के सत्ता में दो साल पूरे हो रहे हैं तब इस समर्थक वर्ग की आशाओं और आशंकाओं का पैमाना क्या कहता है? एक मोदी भक्त की कलम से 

कांग्रेसमुक्त भारत के अपने सपने और नीतीश कुमार के संघमुक्त भारत के नारे के तेज होते टकराव के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्रभाई मोदी नीत भाजपा सरकार के दो वर्ष पूरे हो गए. 

केंद्र में जिस शोर-शराबे और फैनफेयर के साथ यह सरकार आयी थी, वह पारा फिलहाल तो उतरता नहीं दिख रहा है. इसके सत्ता में आने के पहले जितनी तरह की चेतावनियां और शोरगुल हो रहा था, सत्ता में आने के बाद एक दिन भी ऐसा नहीं गुज़रा, जब यह शोर थमा हो या कम भी हुआ हो. 

‘मैक्सिमम गवर्नेंस’ के चुनावी वादे के साथ सत्ता में आयी सरकार रोज नए और बेवजह मसलों में फंसी पड़ी है, जिनका ‘सबका साथ, सबका विकास’ से कोई लेना देना नहीं है.  

पढ़ें: दो साल भगवाराज: 24 महीने और 24 विवाद

पांच राज्यों के चुनावी नतीजे आ चुके हैं. कांग्रेस की ज़मीन और भी अधिक सिकुड़ चुकी है. पूर्वोत्तर में पहली बार भाजपा की सरकार बनी है. हालांकि, बाक़ी चार राज्यों में मिलाकर भी भाजपा की कुल सीटें दो अंकों तक नहीं पहुंच सकी है. 

इसकी दो व्याख्याएं हो रही हैं- पक्ष वाले जहां इसको खाता खोलने, मत प्रतिशत बताने और नयी शुरुआत का बहाना बना रहे हैं, वहीं विपक्षी 700 में 500 सीटों पर जमानत जब्त, कांग्रेस की नाकामी और मोदी के ढहते तिलिस्म का आधार बता रहे हैं. 

हार का सबक

केंद्र में दो साल पूरे करने के मौके पर सरकार को सोचना चाहिए कि वो अपने कितने वादे पूरे कर पाई है

हालांकि, यहां प्रधानमंत्री को याद दिला दिया जाना चाहिए कि अगले साल यानी 2017 में उत्तर प्रदेश और उसके ठीक दो साल बाद 2019 में देश के सबसे बड़े चुनाव की चुनौती उनके सामने है.

 दिल्ली और बिहार में चूंकि भाजपा बुरी तरह हार चुकी है, तो सत्ता के दो वर्ष पूरे होने के इस मौके पर उनके लिए आत्म-मंथन का एक मौका तो बनता ही है न.

आत्म-मंथन की शुरुआत इससे क्यों न हो कि भाजपा ‘अच्छे दिन’ के जिन दावों और वायदों की सवारी कर सत्तासीन हुई थी, उन पर ही विचार करे कि आखिर दो वर्षों में वह कितने वायदों पर अमल कर पायी और कितने पर नहीं. 

इस सरकार, प्रधानमंत्री और पार्टी के पास विनम्र दक्षिणपंथी अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार का अल्पमत और गठबंधन का बहाना भी नहीं है. जनता ने तो इसे झूम-झूमकर बहुमत दिया है और इसीलिए इस सरकार से उम्मीदें भी बहुत अधिक हैं.  

दो साल भगवाराजः किसानों को किए वादे पर भी सरकार ने लिया यू-टर्न

राम-मंदिर, धारा 370, समान नागरिक संहिता जैसे ज्वलनशील (!) मुद्दों की बात बाद में करेंगे, पहले तो सरकार को इसी बात की सफाई देनी चाहिए कि जीएसटी जैसे कई महत्वपूर्ण विधेयक क्यों लटके हुए हैं?  

जनता जब किसी भी जरूरी विधेयक के मामले पर संयुक्त सत्र या ज्वाइंट सेशन बुलाने के अस्त्र-प्रयोग की संभावना दिखाती है या उससे जुड़े सवाल करती है, तो उसमें गलत क्या है? 

लोग जब रॉबर्ट वॉड्रा से लेकर, नेशनल हेराल्ड के मामले तक, अगस्ता डील से लेकर कोल घोटाले तक कारगर और तेज़ कार्रवाई चाहते हैं, तो उसमें भला ग़लत ही क्या है प्रधानमंत्री महोदय?

आभासी दुनिया में असली लड़ाई

आख़िर, प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी को जिताने के लिए जिन लोगों ने दिन रात वर्चुअल से लेकर रीयल संग्राम किया था, उनको कुछ सवालों के जवाब देने चाहिए न. 

भ्रष्टाचार के मामले पर कांग्रेस को पानी पी-पीकर कोसनेवाले भाजपाई भला ललित मोदी और वसुंधरा राजे, सुषमा स्वराज के आपसी संबंधों पर क्या सफाई दें?  

भाजपा शासित मध्यप्रदेश के व्यापमं घोटाले और उसके गवाहों की असामयिक मौत पर क्या बोलें? और, काला धन वापसी या 15 लाख को जुमला बतानेवाले अमित भाई के बयानों पर वो क्या रुख लें, ऑफेंसिव रहें या डिफेंसिव हो जाएं? 

प्रधानमंत्री तो सरकार के मुखिया हैं, वह सब कुछ जानते हैं, लेकिन उनके लिए सबसे जरूरी मंत्रालयों का हाल भी कुछ ठीक नहीं लग रहा. 

आखिर, शिक्षा को वामपंथियों से बचाने और उस पर अपनी दक्षिणपंथी छाप लगाना ही तो भाजपा के जरूरी सपनों में से एक है. ‘प्रथमे ग्रासे मक्षिका पातः’ की तरह स्मृति ईरानी को उसका मुखिया बनाते ही बवाल हो गया, हालांकि यह तो पीएम का विशेषाधिकार है. 

दो साल भगवाराज: दक्षेस देशों में कितनी दक्ष रही नरेंद्र मोदी की विदेश नीति

एफटीआइआइ हो, या जेएनयू, हैदराबाद यूनिवर्सिटी हो या अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, हरेक जगह सरकार को बैकफुट पर आना पड़ा. भद्द पिटी, सो अलग. 

नॉन नेट फेलोशिप हो या अभी हाल ही में आया यूजीसी का नया सर्कुलर, कुल मिलाकर सरकार की छवि ऐसी बन रही है, जैसे वह शिक्षा के सुधार के बजाय उसका समूल नाश करने पर ही उतारू है.

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में हाल ही में हो रहा विद्यार्थियों का प्रदर्शन भी इसकी तस्दीक ही करता है, जहां 24 घंटे लाइब्रेरी खुलने के मुद्दे पर तनाव व्याप्त है. इस बीच मंत्रीजी रक्षात्मक मुद्रा में अपना बचाव ही करती आ रही हैं और ट्विटर पर कांग्रेस प्रवक्ताओं से भिड़ रही हैं. 

निरंकुश बयानबाजी

लव जिहाद और बीफ बैन जैसे मसलों से होने वाला फायदा कुछ भक्तों को भी नहीं समझ आ रहा है

आपकी पार्टी के ‘फ्रिंज एलिमेंट’ (साध्वी निरंजन, योगी आदित्यनाथ, साक्षी महाराज) जो भी बयानबाजी करते हैं, उसकी सरकार के मुखिया को ख़बर (या उनका आशीर्वाद? ) नहीं होती होगी, ऐसा मानने को मन नहीं करता है. 

हालांकि, लव जिहाद, बीफ बैन जैसे मसलों से आपको कौन सा राजनीतिक फायदा होने जा रहा है, वह तो नरेंद्रभाई दामोदरदास मोदी के भक्तों को भी समझ नहीं आ रहा है....एक दादरी ने कितना बवाल मचाया था, यह तो पीएम को याद ही होगा. 

मज़े की बात है कि जिस नरेंद्रमोदी को प्रशासन पर उनकी लौह-पकड़ और अपरिवर्तनीय इरादों के लिए जाना जाता था, वही नरेंद्र मोदी अब थोड़े थके से लग रहे हैं और यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि सत्ता के केंद्र में वही हैं, सत्ता पर उनकी मजबूत पकड़ बनी हुई है. 

दो साल भगवाराज: संघ अब मोदी के पीछे नहीं, साथ-साथ चल रहा है

बिहार चुनाव के ऐन बीचोंबीच मोहन भागवत का आरक्षण के खिलाफ बयान भला क्या था, भले ही बाद में पीएम ने आरक्षण पर यह बयान दिया कि इस अधिकार को कोई छीन नहीं सकता. नुकसान तो जितना होना था, हो चुका. 

जेएनयू में 9 फरवरी को जो भी असली मुद्दा था, वह तो राख की परतों में दब गया, लेकिन ज्ञानदेव आहूजा के कंडम बयान (रोज हज़ारों कंडोम मिलते हैं जेएनयू) से लेकर फिलहाल फ्री-सेक्स के मसले पर वामपंथी नेत्री कविता कृष्णन के साथ सोशल मीडिया में गाली-गलौज से यह डर पुख्ता होता है कि कहीं भाजपा में फ्रिंज ही तो सेंटर नहीं बन रहा है. 

विदेश नीति

अपनी विदेश नीति की उपलब्धियों को ढंग से जनता तक न पहुंचा पाना इस सरकार की विफलता

प्रधानमंत्री सोशल और मेनस्ट्रीम मीडिया के खुद ही मास्टर हैं, फिर भी मानो सूचना-प्रसारण मंत्रालय फिसलता हुआ नज़र आ रहा है. 

तभी तो, आपके तमाम पॉजिटिव काम (लगभग एक करोड़ लोगों का एलपीजी सब्सिडी छोड़ना, डेढ़ करोड़ फर्जी राशन कार्ड रद्द होने, पहल, मुद्रा, कौशल योजना आदि-इत्यादि) तो लोगों तक नहीं पहुंचते, लेकिन स्वच्छ भारत अभियान, गंगा सफाई अभियान, योग दिवस आदि की कमियां या खामियां सब तक पहुंच जाती हैं. 

पिछले दो साल में लगभग 21,000 करोड़ का काला धन उगाहा जा चुका है और 50,000 करोड़ अप्रत्यक्ष कर की चोरी को वसूला गया (जो पहले नहीं दिया जाता था), फिर भी इसकी चर्चा कहीं नहीं है, लेकिन 15 लाख का जुमला, मोदी का सूट हरेक की जुबान पर है. 

10 मई को सरकार ने लगभग 54 जीवनरक्षक दवाओं (कैंसर, दिल की बीमारी, हाइपरटेंशन आदि) के दाम में लगभग 55 फीसदी की कमी की और यह तीन हफ्ते में तीसरी बार दामों का पुनरीक्षण था, फिर भी इसकी ख़बर कहीं नहीं थी, इसके बदले इस आशय से ठीक उलट ख़बरें मीडिया में आ रही थीं. 

विदेश दौरों की खिल्ली

इसी तरह पीएम के विदेश-दौरों या उनके विदेशी समकक्षों के अति-महत्वाकांक्षी भारत दौरों की भी खूब खिल्ली उड़ायी गयी. नेपाल तक के चीन के गोद में बैठ जाने को तो मीडिया ने खूब जगह दी, लेकिन जितने सकारात्मक काम हुए, उनको एक फुटनोट में भी दर्ज नहीं किया गया. 

छोटे-छोटे द्वीपों (सेशेल्स आदि) की यात्रा कर हिंद महासागर में चीन को घेरने से लेकर हाल ही में ईरान के साथ चाबहार बंदरगाह का समझौता भी भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत है, जिसके जरिए यह पूरे पश्चिम एशिया में अपनी धमक और वकत बढ़ा सकता है. 

बांग्लादेश के साथ बहुत पुराना अटका हुआ भूमि-समझौता संभव हुआ, तो म्यांमार ने अपने यहां के आतंकी कैंप ध्वस्त किए. हालांकि, पाकिस्तान के साथ एक कदम आगे, तीन कदम पीछे की नीति ने प्रधानमंत्री मोदी के आलोचकों को बड़ा मौका दिया है. 

निष्कर्ष के तौर पर कहा जाए, तो अपनी विदेश नीति की उपलब्धियों को ढंग से कम्युनिकेट न कर पाना भी इस सरकार की एक विफलता ही मानी जाए.

कट्टरपंथी समर्थकों का दर्द

अर्थनीति से विदेशनीति तक, घरेलू से लेकर रेलनीति तक...सब पर यह सरकार बैकफुट पर ही दिख रही है

कट्टरपंथी वोटर्स या दक्षिणपंथी समर्थकों के ‘जी की जरनी’ का तो कहना ही क्या है. 

कश्मीर से 370 हटाने की जगह पीडीपी के साथ सरकार एक कूटनीतिक मास्टरस्ट्रोक भले हो, लेकिन वहां की दिन-ब-दिन बिगड़ती हालत और आतंकी घुसपैठ ने भाजपा और सरकार की हालत सांप-छुछूंदर वाली कर दी है.  

शायरा बेगम के बहाने सरकार समान नागरिक संहिता पर बढ़िया काम कर सकती थी, लेकिन उसे तो मेडिकल कॉलेजों के लिए एनईईटी पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटने के लिए अध्यादेश लाने से फुरसत मिले तब न.

रहे बेचारे रामलला, तो वो पिछले 24 वर्षों से तिरपाल में हैं, दो साल और रह लेंगे, लेकिन आप तो अब भूले से भी उनका नाम नहीं लेते हैं. 

रॉबर्ट वाड्रा के सलाखों के पीछे जाने को तो छोड़िए, अब तक उनपर मुकदमा भी नहीं शुरू हुआ है. फिर, सोनिया गांधी या राहुल गांधी तो बहुत दूर की कौड़ी हैं. 

राजस्थान: बीजेपी विधायक की जेएनयू और नेहरू-गांधी परिवार पर विवादित टिप्पणी

अर्थनीति से विदेशनीति तक, घरेलू से लेकर रेलनीति तक...सब पर यह सरकार बैकफुट पर ही दिख रही है, जो निश्चित तौर पर इसके लिए ठीक नहीं है. हंगामा बरपा है और भाजपा के 270 सांसद सोए हुए हैं... 

वैसे, प्रधानमंत्री के लिए वक्त अभी भी नहीं बीता है. कहने का मतलब यह कि वह अपने मूल मुद्दों (हिंदुत्व) से चिपके रहें और मतदाताओं को लुभावने सपने दिखाएं और बेचें (आखिर, लोकसभा चुनाव भी तो आपने केवल रेटॉरिक के बूते जीता था ही) तब ही उनका फैलाव होगा. 

असम में भी बांग्लादेशी घुसपैठियों के मुद्दे ने ही कमाल दिखाया न. विकास के जितने भी काम हो रहे हैं, उनका आक्रामक और ताबड़तोड प्रचार भी करना होगा, तभी अगले चुनाव में उम्मीद दिखेगी.

(ये लेखक के निजी विचार हैं. संस्थान की इनसे सहमति आवश्यक नहीं.)

First published: 26 May 2016, 20:41 IST
 
व्यालोक @catchhindi

आईआईएमसी से पत्रकारिता की पढ़ाई करके 13 सालों तक मुख्यधारा की पत्रकारिता की. अब स्वतंत्र पत्रकारिता और बागवानी करते हैं.

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