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टैक्स चोरों की मुखबिरी करो, अमीर बनो

श्रिया मोहन | Updated on: 3 November 2015, 18:05 IST
QUICK PILL

  • टैक्स\r\nचोरों के बारे में जानकारी\r\nदेने वालों को इनकम टैक्स\r\nविभाग देगा इनाम. अटकलें\r\nनहीं बल्कि जानकारी के साथ\r\nपुख्ता जानकारी, दस्तावेज\r\nहोने जरूरी.
  • समाजशास्त्री\r\nकहते हैं कि यह एक मुखबिरी की\r\nसंस्कृति को बढ़ावा मिलेगा\r\nऔर राजनीतिक संस्कृति को\r\nनुकसान होगासाथ\r\nही इससे दो लोगों के बीच होने\r\nवाले कारोबारी सौदों में भरोसा\r\nकम होगा.  

आपने कभी सोचा है कि अचानक आप को एक खजाना मिल जाए और उसके बाद आप जीवन भर आराम से रहें.


जी हां, भारत का आयकर विभाग ने ऐसे सपनों को हकीकत में बदलने का रास्ता बना दिया है. इसके लिए आपको केवल अपने आसपास के उन पड़ोसियों की जासूसी करके उसकी जानकारी इनकम टैक्स वालों को देनी होगी जो महंगी- महंगी गाड़ियों में घूमते हैं और अक्सर विदेशों में छुट्टियां मनाने जाते हैं.


आप सोचेंगे इससे आपको क्या फायदा मिलेगा? फायदा मिलेगा, टैक्स चोर से वसूली गई रकम का 10 फीसदी (अधिकतम 15 लाख रुपये) आपको इनाम के रूप में मिलेगा. ये पूरी तरह से कनूनी कमायी होगी लेकिन आपको इस कमायी पर टैक्स देना होगा.


ये सब होगा आयकर विभाग के नए दिशा-निर्देशों के तहत जिसके मुताबिक इनकम टैक्स के अधिकारियों की टैक्स चोरों को पकड़ने में मदद करने वालों इनाम देने की व्यवस्था की गयी है.


तो क्या आप मुखबिरी करेंगे?


नगद मूल्यांकन बाक़ी है


हम एक देश में रहते हैं जहां केवल नगद लेन-देन की तख्तियां आम तौर पर दिख जाती हैं. अगर आपने लेन-देन की रसीद मांगे ली तो सामने वाले की भौहें तन जाएंगी. फिर वो गला साफ करते हुए आपसे रसीद लेने पर अधिक दाम लगने की बात कहेगा, जैसे आपने कोई गलत चीज मांग ली हो.


भारत में अक्सर टैक्स देने को गाढ़ी कमायी को गटर में डाल देने की तरह देखा जाता है. आम तौर पर लोग सोचते हैं कि जब सरकार हमारे लिए कुछ नहीं करती तो टैक्स देने से क्या फायदा.


भारतीयों की ऐसी सोच की पुष्टि आंकड़ों से भी होती है. साल 2012 में तत्कालीन वित्त मंत्री पी चिदम्बरम ने अनुमान जाहिर किया था कि भारत में महज तीन प्रतिशत लोग ही इनकम टैक्स देते हैं. यानी पूरी दुनिया में भारतीय टैक्स देने के मामले में दुनिया में सबसे पीछे के देशों में है.


सामाजिक मनोविज्ञानी आशीष नंदी कहते हैं कि टैक्स न देने की आदत से बहुत परिश्रम निर्मित हुई हमारी राजनीतिक संस्कृति खत्म हो सकती है.


यही धारणा कुछ चौंकाने वाले आंकड़े दिखाती है। पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम के 2012 में दिए एक बयान के मुताबिक 3 फीसदी से कम भारतीय आयकर देते हैं। जो हमारे देश को दुनिया का सबसे कम कर चुकाने वाला राष्ट्र बनाती हैं.


ऐसा बिल्कुल नहीं है कि सरकार देश में टैक्स देने वालों का दायरा बढ़ाना नहीं चाहती. दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने टैक्स बचाने के लिए विदेशों में जमा काले धन को वापस लाने को अपना प्रमुख चुनावी मुद्दा भी बनाया. इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि सरकर ऐसे काला धन रखने वालों की पहचान और उनसे कर भुगतान करवाने के हर संभव प्रयास करेगी.

आयकर विभाग के जांच निदेशालय के पूर्व अधिकारी प्रवीण सिद्धार्थ कहते हैं, “ सरकार का हमेशा से ये मानना रहा है कि टैक्स से जुड़े मामलों में छापे वगैरह मारने के बजाय बड़े लेन-देन के लिए पैन नंबर की अनिवार्यता, एक-दूसरे की निगरानी जैसे सुलभ तरीके अपनाए जाएं.”


प्रवीण कहते हैं, "हमने मुखबिरों के साथ सीमित स्तर पर काम किया और वो भी पूरी गोपनीयता के साथ. टैक्स वसूलने के लिए ऐसा आक्रामक फ़ैसला लेना मोदी सरकार की सोच दिखाता है. उम्मीद है कि जल्द ही डिपार्टमेंट में ऐसे मुखबिरों की बाढ़ आ जाएगी.”


प्रॉपर्टी की कालाबाजारी


भारत में जमीन-जायदाद की खरीदारी में करीब 40 फीसदी रकम काले धन के रूप में दी जाती है. कैग कार्यालय में पूर्व महानिदेशक अमिताभ मुखोपाध्याय कहते हैं, “ब्लैक मनी के रूप में दिया जाता है. खरीदार-विक्रेता के अलावा प्रॉपर्टी डीलरों को इस बारे में पुख्ता जानकारी होती है. उन्हें लेन-देन की रकम के साथ ही सेल डीड रजिस्ट्रेशन पर लिखी कीमत के बारे में भी बखूबी पता होता है. और वो मुखबिरी कर भी सकते हैं. इस तरह से भी टैक्स के रूप में दबा कुछ पैसा वसूला जा सकता है.”


खेती से होने वाली आय करमुक्त होती है, लेकिन खेती से जुड़े दूसरे बड़े मुनाफे वाले कारोबारों से होने वाली आय को टैक्स के दायरे में लाया जा सकता है. मुखोपाध्याय कहते हैं, "बीजों की बिक्री, सब्सिडी वाली खाद को अवैध तरीके से किसानों के बजाय किसी और कारोबारी को बेच देना, उपज की ढुलाई, फलों की पैकेजिंग समेत कई चीजें करमुक्त नहीं हैं. ऐसे में अनाज मंडी के मुनीम मुखबिरी कर सकते हैं.”


लेकिन कुछ क्षेत्रों में मुखबिर बनाना बहुत बड़ी चुनौती हो सकती है. जैसे सर्विस सेक्टर का ही उदाहरण लें, जहां डॉक्टर मरीज से नगद रकम लेता है लेकिन कोई रसीद नहीं देता. क्या मरीज इसकी जानकारी देंगे. हालांकि प्रतिद्वंदी डॉक्टर जो दूसरों के मरीज खींच लेते हैं, इन जानकारियों को मुहैया करा सकते हैं.”


मुखबिरों के लिए


अगर आप मुखबिरी के लिए तैयार हैं, तो इसे कैसे करेंगे? क्या आप किसी निजी जासूसी कंपनी की मदद लेंगे या खुद ही जानकारी जुटाएंगे?


पीटीआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक यह दिशानिर्देश पुख्ता सूचनाओं के लिए हैं जो "ठोस सबूतों और दस्तावेजों" पर आधारित हों. इस रिपोर्ट के अनुसार आयकर विभाग अटकलों, तुक्कों, अनुभव, अनुमानों इत्यादि के आधार पर दी गयी सूचनाओं पर विचार नहीं करेगा.


नाम न छापने की शर्त पर दिल्ली स्थित एक चार्टर्ड अकाउंटेंट ने बताया, “ किसी के बारे में भी जानकारी जुटाने के लिए इंटरनेट आज एक आसान माध्यम है. जैसे किसी व्यक्ति की विदेश यात्रा, नए बंगलेे या बड़ी गाड़ियां खरीदने पर उस यूजर की फेसबुर पोस्ट और तस्वीरों से पुख्ता सबूत जुटाए जा सकते हैं.”


उन्होंने कहा, " मेरे लिए एक कहानी बनाने के लिए ये सबूत काफी होंगे. अगर आयकर विभाग को लगेगा कि मामले में दम है तो खुद पहल करेगा और छापा मारेगा.”


ये पूछने पर कि जिन क्लाइंट पर उन्हें टैक्स चोरी का शक होगा क्या वो उन्हें आगाह करेंगी? सीए ने कहा कि ये एक ललचाने वाला मौका होगा और वो इसपर गंभीरता से विचार करने के बाद ही कोई फैसला लेंगी.


हालांकि सिद्धार्थ कहते हैं कि यह इतना आसान भी नहीं है. ज्यादातर मुखबिर ऐसे लोग होते हैं जो उन पदों पर होते हैं जहां पर उन्हें लोगों के दस्तावेज और बैंक अकाउंट की जानकारी आसानी से मिल जाती है. ज्यादातर मामलों में किसी से निजी प्रतिद्वंदिता, कारोबारी गठजोड़ में गड़बड़ी या पारिवारिक विवाद के चलते मुखबिरी होती है.


लोगों की शुरुआती प्रतिक्रियाएं लेने पर पता चला कि यह मौका लोगों में मनोवैज्ञानिक डर पैदा करने लगा है, जिसके लिए इसे बनाया गया था।


सिद्धार्थ कहते है, “विभाग एक मामले की जांच के लिए 10 अफसरों को लगाता है. ऐसे में उसकी कोशिश होती है कि कम से कम 500 करोड़ से ऊपर के मामलों की जांच पर ध्यान दिया जाए. अच्छे सुराग के लिए अच्छे निजी तालुकात जरूरी हैं. वरना विभाग की मेहनत का कोई मतलब नहीं निकलेगा.” वो कहते हैं कि यही वजह है कि आयकर विभाग अक्सर तनख्वह वालों के टैक्सों को लेकर ज्यादा गहरायी से जांच नहीं करता.


कैच न्यूज ने जिन लोगों से इस फैसले के बारे में बात की उनकी प्रतिक्रिया से यही नतीजा निकलता है कि इससे लोगों में एक मनोवैज्ञानिक भय पैदा हो सकता है. शायद इसका मकसद भी यही है.


चार्टर्ड अकाउंटेंट ने कहा, “लोग बहुत डर जाएंगे. इससे लोगों को लगेगा कि उनपर नजर रखी जा रही है. कोई भी आदमी उन्हें अंदर करा सकता है.”


मुखबिरों का देश


अब, सवाल यह उठता है कि क्या आम हिंदुस्तानी अपने पड़ोसियों, ग्राहकों, सहयोगियों, रिश्तेदारों या दोस्तों की मुखबिरी करेंगे?


समाजशास्त्री आशीष नंदी कहते हैं कि हमें यह भलीभांति पता होना चाहिए कि भारत में बहुत गरीबी है. ज्यादातर लोगों के लिए कुछ हजार रुपये बहुत मायने रखते हैं.


उन्होंने इसके परिणामों के प्रति आगाह करते हुए कहा, “आपके क्लाइंट आप के साथ कारोबार करते हैं तो वो दस्तावेजों की फोटोकॉपी रखने लगेंगे जैसे नए मंत्री पुराने मंत्रियों की गड़बड़ियों का रिकॉर्ड रखते हैं.”


नंदी मानते हैं कि इससे बहुत परिश्रम से तैयार हमारी राजनीतिक संस्कृित खत्म हो जाएगी.



पत्रकार जिम रेड्डेन ने अपनी किताब 'स्निच कल्चर' में अमरीकी संस्कृति में मुखबिरी के व्यापक प्रभाव की पड़ताल की है. वो लिखते हैं कि ये अमेरीका में पारिवारिक मूल्य जैसा बन चुका है. बिलबोर्ड, टीवी और स्कूल की कक्षाओं में बाकायदा इसका प्रचार किया जाता है.


समाजशास्त्रियों के मुताबिक आयकर विभाग की ऐसी नीतियों से भारत भी इसी राह पर आगे बढ़ेगा.


समाजशास्त्री दीपांकर गुप्ता कहते हैं, “विजिलैंटिज्म को बढ़ावा देने वाली ऐसी नीतियां हमारे देश के उदारवादी लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ हैं. कौन आतंकवादी है या कौन धोखा दे रहा है, इसकी जांच का जिम्मा समाज का नहीं बल्कि राज्य (देश) का है.”


नंदी कहते हैं, "बड़े इनाम के लालच में छोटी मछलियां ही पकड़ में आएंगी. जबकि जो वाकई बड़े टैक्स चोर हैं, उनके मजबूत राजनीतिक संबंध ऐसी किसी भी जांच या कार्रवाई को रुकवाने में सक्षम होते हैं. और आखिरकार ऐसे मुखबिरों की रक्षा कौन करेगा?”


वैसे भी भारत जैसे देश में जहां भावनाओं में बहने वाले बहुतायत में हैं और बिना बात पर झगड़े होना आम है. वहां किसी को मुखबिरी के लिए कोई लालच देने की शायद ही जरूरत हो. बदले की भावना या रिश्तों में कड़वाहट ही इसके लिए काफी है.


सिद्धार्थ कहते हैं, “ हमारे समाज में ईर्ष्या और प्रतिद्वंदिता पहले से ही मौजूद है. बिना इनाम के लालच में ही तमाम लोग इसके लिए आगे आ जाएंगे. लेकिन इस तरह मिलने वाली सूचनाओं के ढेर से सही जानकारी जुटाना ज्यादा बड़ी समस्या है.” 

First published: 3 November 2015, 18:05 IST
 
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