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क्या नेताजी अंग्रेजों के जासूस थे ?

कैच ब्यूरो | Updated on: 24 January 2016, 19:43 IST
QUICK PILL
  • \'एशिया एंड अफ्रीका\' नामक जर्नल में छपे एक लेख के मुताबिक नेताजी बिना अंग्रेजों की सहायता के इतने लंबे समय तक काबुल में नहीं रह सकते थे.
  • जनरल में प्रकाशित इस लेख के बाद विदेश सचिव जेएन दीक्षित ने भी जून 1993 में प्रधानमंत्री कार्यालय को एक पत्र लिखकर इस लेख पर अपनी चिंता जाहिर की थी. 

एक रूसी जर्नल ‘एशिया एंड अफ्रीका’ ने अपनी खोजी कहानियों का हवाला देते हुए दावा किया था कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस वास्तव में अंग्रेजों के एजेंट (जासूस) थे.

इस जनरल ने दावा किया था कि उसके कब्जे में इस तथ्य की पुष्टि करने वाली केजीबी की कई गुप्त रिपोर्ट हैं और इसका यहां तक कहना है कि नेताजी का एक बेहद करीबी सहयोगी एक समय कई देशों की गुप्तचर संस्थाओं के साथ काम कर रहा था.

ताजी का एक बेहद करीबी सहयोगी एक समय कई देशों की गुप्तचर संस्थाओं के साथ काम कर रहा था

जब यह जानकारी भारतीय विदेश अधिकारियों की हुई तो उन्होंने इस लेख को प्रकाशित होने से रोकने की बहुत कोशिशें कीं. इसके तहत ‘‘एशिया एंड अफ्रीका’’ के मुख्य उपसंपादक से संपर्क साधने की कोशिश भी की गई थी.

विदेश मंत्रालय की तत्कालीन उपसचिव सुजाता मनोहर द्वारा सितंबर 1993 में लिखी गई एक रिपोर्ट कहती है:

‘हाल ही में माॅस्को के हमारे दूतावास ने सूचना दी कि माॅस्को से प्रकाशित होने वाला एक जनरल (एशिया एंड अफ्रीका) केजीबी के हवाले से लेखों की एक श्रृंखला प्रकाशित करने जा रहा है.

जिसमें दावा किया जाएगा कि नेताजी एमआई 6 एजेंट थे और उनका एक करीबी सहयोगी केजीबी एजेंट (फ्लैग डी) था.

माॅस्को में हमारा मिशन इन लेखों के प्रकाशन को रुकवाने के लिये जनरल के संपादकीय बोर्ड के साथ मध्यस्था करने के पूरे प्रयास करेगा. लेकिन उनके ऐसा कर पाने में सफल होने की उम्मीद बहुत कम है.

एमईए फाइल (फ्लैग ई) लिखती है कि इस बारे में जानकारी पाने के लिये रशियन विदेश कार्यालय से पहले ही संपर्क साधा गया था और जनवरी 1992 में उन्होंने प्रतिक्रिया दी.

केंद्रीय और रिपब्लिक अभिलेखागार में उपलब्ध जानकारी के अनुसार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष नेताजी सुभाष चंद्र बोस के वर्ष 1945 और उसके बाद सोवियत गणराज्य में होने के बारे में कोई स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है.

एमईए के विदेश सचिव जेएन दीक्षित ने भी जून 1993 में प्रधानमंत्री कार्यालय को अपनी चिंता व्यक्त करते हुए एक पत्र लिखा क्योंकि 'एशिया एंड अफ्रीका' में इस लेख के प्रकाशित होने के बाद भारतीय पत्रकारों को इसकी भनक लग गई थी.

'एशिया एंड अफ्रीका' में इस लेख के प्रकाशित होने के बाद भारतीय पत्रकारों को इसकी भनक लग गई थी

वे लिखते हैं, ‘मैंने अपने परामर्शदाता (इन्फाॅर्मेशन) से डिप्टी एडिटर-इन-चीफ से मिलने के लिये कहा है. मैं खुद भी कुछ अन्य लोगों से मिलने का प्रयास करूंगा.’

29 जून 1993 को माॅस्को में तैनात भारतीय काउंसलर (सूचना विभाग) अजय मलहोत्रा ने पत्रिका में इस लेख का प्रकाशन रोकने की दिशा में प्रयास करते हुए ‘एशिया एंड अफ्रीका’ के डिप्टी एडिटर-इन-चीफ वीके टूराज़डेव से मुलाकात की. इस अधिकारी ने अपनी रिपोर्ट में यही लिखा है.

‘उनके पास मौजूद दस्तावेज प्रदर्शित करते हैं कि नेताजी ने ‘अंग्रेजों का साथ दिया’ और बिना अंग्रेजों के सहयोग के नेताजी इतनी आसानी से भारत से बाहर जाकर इतने लंबे समय तक काबुल में नहीं रह सकते थे. केजीबी के दस्तावेजों ने इस बात की पुष्टि की. केजीबी के दस्तावेज बताते हें कि काबुल में नेताजी के सहयोगी भगत राम ब्रिटिश, जर्मन, रशियन, इटैलियन सहित कई अन्य विदेशी खुफिया सेवाओं के एक एजेंट के रूप में काम कर रहे थे.’

नेताजी ने ‘अंग्रेजों का साथ दिया’

पत्रिका के संपादक का लगातार कहना था कि यह लेख नेताजी के सम्मान को और अधिक बढ़ाने में मददगार साबित होंगा क्योंकि इनसे साबित होगा कि नेताजी ने फासीवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी.

ऐसा लगता है कि भारत सरकार ने इस तथ्य को स्वीकार कर लिया है कि टोक्यो के मंदिर में रखी अस्थियां और राख नेताजी की ही है और एक समय सरकार उस अस्थिकलश को वापस लाने के प्रयास भी प्रारंभ कर चुकी थी.

भारत के तत्कालीन वायसराय लाॅर्ड वाॅवेल द्वारा तैयार की गई एक खुफिया रिपोर्ट के अनुसार ‘बोस एक विमान दुर्घटना की आड़ में रशिया पहुंच गए हैं और वहां जाकर गिलज़ई मलंग का नाम अपना लिया है.’

लाॅर्ड वाॅवेल की खुफिया रिपोर्ट के मुताबिक विमान दुर्घटना की आड़ में बोस रशिया चले गये

महात्मा गांधी के बेहद भरोसेमंद शिष्य खुर्शीद बहन द्वारा एक अमरीकी पत्रकार लुइस फिशर को लिखे पत्र, जो हाल के दिनों में यूएसए प्रिंसटन यमनिवर्सिटी के अभिलेखागार से मिला है, से यह बात साफ होती है कि 22 जुलाई 1946 तक गांधीजी को इस बात का विश्वास था कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस सोवियत रशिया में थे.

First published: 24 January 2016, 19:43 IST
 
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