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पी साईनाथ: जल और कृषि संकट इस दौर की सबसे ज्वलंत समस्याएं हैं

श्रिया मोहन | Updated on: 28 June 2016, 8:10 IST

दिल्ली विधानसभा का नजारा सोमवार को बल्कुल बदला हुआ सा था और विधानसभाध्यक्ष भी एक बिल्कुल नए अंदाज में अपने विधायकों को उपदेश देखे हुए दिखाई दिये.

विधानसभाध्यक्ष रामनिवास गोयल ने आज से एक नई पहल के तहत विधानसभा में एक व्याख्यान श्रृंखला की नींव रखी और इसकी शुरुआत की वरिष्ठ पत्रकार और प्रतिष्ठित रेमन मेगसेस पुरस्कार विजेता पी साईनाथ के व्याख्यान के साथ.

साईनाथ ने ‘भारत और कृषि संकट’ के विषय पर खुलकर अपने विचार रखे. मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इस श्रृंखला का उद्घाटन यह स्वीकारतेे हुए किया कि वे खुद साईनाथ के बहुत बड़े ‘प्रशंसक और चाहने वाले’ हैं. केजरीवाल ने किसानों से संबंधित मुद्दों को दुनिया के सामने लाने के लिये उनके द्वारा किये जा रहे प्रयासों की भी सराहना की. ग्रामीण संकट और सामाजिक मुद्दों पर उनके मन की बात सुनने के बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री ने कहा, ‘बेहतर निर्णय लेने के लिये ये बहुत आवश्यक हैं.’

वर्तमान समय के संकट की परिभाषा

साईनाथ ने सूखे को वृहद जल संकट के रूप में परिभाषित करते हुए प्रारंभ किया. जो लोग इस मानसून को लेकर आशावादी हो रहे हैं और कृषि संकट की भयावहता को लेकर सहज महसूस कर रहे हैं उनके लिये उन्होंने बिल्कुल प्रारंभ में ही स्पष्ट किया, ‘‘मानसून सिर्फ एक राहत है. यह समाधान नहीं है.’

सूखे के विभिन्न कारणों पर रोशनी डालते हुए साईनाथ ने भूजल के अधिक उपयोग जैसे हाईड्रोलाॅजिकल कारण से लेकर कृषि तक पर अपने विचार रखे जो पानी की भारी कमी के चलते संकट से गुजर रही है. साईनाथ ने कहा कि सूखे के लिये पूरी तरह से मानव ही जिम्मेदार है और हममें से सबसे गरीब इससे सबसे अधिक प्रभावित होते हैं.

सतारा में स्थित कृष्णा नदी के स्रोत, राम कुंड घाट में गोदावरी नदी के मुख्य स्रोत और त्रयंबकेश्वर की अपनी यात्रा के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा कि इतिहास में पहली बार ऐसा हो रहा है कि नदियों के उद्गम स्रोत सूख रहे हैं और इनका कारण है बड़े पैमाने पर वनों की हो रही कटाई और बढ़ता हुआ शहरीकरण जिसके चलते पानी के जमा होने और उसके बहने के लिये कोई स्थान ही नहीं बचता है.

उन्होंने हंसते हुए कहा, ‘‘राम कुंड घाट में, जहां आपको तीन दिन में केवल एक बार ही पानी मिलता है, प्रतिदिन नदी में 60 से 90 टैंकर पानी डाला जाता है ताकि लोग नहा सकें. और यह आधिकारिक रूप से हो रहा है. श्रद्धालु टैंकरों के पवित्र जल में स्नान कर रहे हैं!’’

इतिहास में पहली बार ऐसा हो रहा है कि नदियों के उद्गम स्रोत सूख रहे हैं

महाराष्ट्र के बारे में बात करते हुए साईनाथ कहते हैं, ‘‘किसी भी राज्य ने इतना कम पानी उत्पादित करने के लिये महाराष्ट्र जितनी बड़ी रकम खर्च नहीं की है.’’

बेहद असाधारण ग्रामीण संकट को ‘जीवन शैली का संकट’ करार देते हुए साईनाथ ने स्पष्ट किया कि महाराष्ट्र के सिर्फ तीन जिलों, मुंबई, थाणे और पुणे पूरे राज्य का 53 प्रतिशत पीने का पानी पाते हैं जबकि इनमें राज्य की एक तिहाई से भी कम आबादी निवास करती है.

उन्होंने कहा कि जीवनशैली का संकट ‘जल और कृषि के बीच खड़ी असामनता’ के माध्यम से स्पष्ट देखा जा सकता है. उन्होंने कहा कि संसाधनों का जमीन और पानी के रूप में गरीबों से लेकर अमीरों तक का स्थानांतरण इतना बुरा नहीं हो सकता जितना बीते 20 से 35 वर्षों के बीच रहा है.

ओलंपिक के आकार के स्विमिंग पूल वाली बहुमंजिला इमारतों का निर्माण करने वाले बिल्डरों का उदाहरण देते हुए उन्होंने पानी की भारी कमी से जूझ रहे बोरीवली में 200 फ्लैटों में स्विमिंग पूल वाली एक्वेरिया ग्रांड बिल्डिंग का नाम लेते हुए कहा कि यह पानी के उपयोग में असमानता बढ़ाने और सूखे के आने के मुख्य जिम्मेदार कारक हैं.

इसके अलावा उन्होंने जल संकट को ‘नीतियों की नाकामी’ बताते हुए कहा कि बीयर बनाने वाली कंपनियों को पानी सिर्फ 4 से 5 पैसे प्रति लीटर की दर से उपलब्ध करवाया जा रहा है जबकि इसके उलट आम व्यक्ति को प्रति लीटर पानी लेने के लिये इससे 100 गुणा अधिक रकम खर्च करनी पड़ती है. उन्होंने कहा, ‘‘आम जनता का हित सबसे अंत में आता है.’’

साईनाथ ने जल के व्यवसायीकरण में आ रही तेजी को लेकर भी कुछ बेहद तीखे और चुभते हुए सवाल उठाए. क्या पीने का पानी मानव का अधिकार है या सिर्फ वस्तु है? आखिर प्राथमिकताएं क्या हैं?

उन्होंने कहा, ‘‘सबसे पहले हमें पीने, खाना पकाने और नित्यकर्मों के लिये आवश्यक पानी के बारे में बात करनी चाहिये. स्विमिंग पूल और आईपीएल के बारे में इसके बाद सोचा जाएगा.’’

यह बताते हुए कि मानव विकास सूचकांक में हम बोलिविया से भी नीचे 130वें स्थान पर आते हैं उन्होंने कहा, ‘‘2015 के आंकड़ों के अनुसार शीर्ष के एक प्रतिशत भारतीय पूरे देश की 53 प्रतिशत संपत्ति के मालिक हैं. बीते 15 वर्षो में असामनता कहीं भी इतनी तेजी से नहीं बढ़ी है.’’

उन्होंने कहा, ‘‘यह समानता पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य सहित जीवन के प्रत्येक पहलू में स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है.’’

वृहद जल संकट सिर्फ मानसून से ही दूर होने वाला नहीं है. हमें यह तय करना होगा कि किसकी क्या जिम्मेदारी है. स्वास्थ्य, जल और भोजन जैसे बुनियादी अधिकार प्रत्येक भारतीय नागरिक का अधिकार हैं जो उसे मिलना सुनिश्चित होना चाहिये. जल और कृषि संकट मौजूदा समय की सबसे बड़ी और निर्णायक समस्याएं हैं. अपनी बात को विराम देते हुए वे कहते हैं, ‘‘लेकिन इनके बुनियादी समधान हमारे संविधान में परिभाषित हैं.’’

फूड फाॅर थाॅट

इस व्याख्यान से पहले जारी की गई आधिकारिक विज्ञप्ति में कहा गया, ‘‘व्यख्यान की इस श्रृंखला का उद्देश्य समाज के सामने उठने वाले मुद्दों और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के बीच बेहतर समझ का निर्माण करना है.’’दिल्ली विधानसभा की योजना आने वाले दिनों में विधायकों के फायदे के लिये विभिन्न क्षेत्रों के पेशेवरों/विशेषज्ञों द्वारा संबधित विषयों पर व्याख्यान आयोजित करवाने का है. ऐसा करके इनका इरादा विधानसभा में होने वाली बहसों को समृद्ध करने और विधायकों के प्रदर्शन को सुधारने का है. साईनाथ की इन टिप्पणियों से दिल्ली के विधायकों को पहले से ही बेहद मजबूत सामाजिक नीति को और अधिक बेहतर बनाने के लिये आवश्यक घटक मिल गए होंगे.

First published: 28 June 2016, 8:10 IST
 
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