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राजद्रोह के मुद्दे पर इतना उतावला होने की जरूरत नहीं: एएस दुलत

शोमा चौधरी | Updated on: 16 February 2016, 8:25 IST
QUICK PILL
  • रॉ और आईबी के पूर्व चीफ रहे एएस दुलत का मानना है कि पूरे मामले में हद से ज्यादा सक्रियता के साथ कार्रवाई की गई. उन्होंने कहा कि राष्ट्रद्रोह को लेकर हमें इतना अधिक व्याकुल होने की जरूरत नहीं है.
  • दौलत बताते हैं कि भारत बेहद उदार और लोकतांत्रिक देश है. हमें इस पर गर्व है. देश को राष्ट्रद्रोह को लेकर इतना भावुक होने की जरूरत नहीं है. राष्ट्रवाद और देशभक्ति ऐसी चीज है जिसकी जड़ें बहुत गहरी होती हैं.

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) को लेकर सार्वजनिक विमर्श का दायरा बंट गया है. जहां ट्विटर पर #क्लीन अप जेनएयू ट्रेंड कर रहा है वहीं उदारवादी विचारकों ने पुलिस की गुंडागर्दी पर कड़ी आपत्ति जताई है. विचारकों ने इस पूरे मामले में यूनिवर्सिटी प्रशासन के रवैये को लेकर भी चिंता जताई है. 

इन सबकी शुरुआत नौ जनवरी को हुई थी जब छात्रों के एक समूह ने अफजल गुरु को फांसी दिए जाने के खिलाफ युनिवर्सिटी कैंपस में एक सभा का आयोजन किया. कथित तौर पर इनमें से कुछ छात्रों ने भारत विरोधी नारे लगाए लेकिन उनकी पहचान नहीं हो सकी. इसके तुरंत बाद ही पूरा मामला कैंपस से बाहर निकल गया और गृहमंत्री ने इस मामले को देशद्रोह घोषित करते हुए आरोपियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की बात कही.

गृहमंत्री राजनाथ सिंह के इस बयान के बाद जेएनयू छात्रसंघ के प्रेसिडेंट कन्हैया कुमार को पुलिस ने गिरफ्तार किया. इस गिरफ्तारी के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन, पुलिस और केंद्र सरकार की आलोचना शुरू हो गई. कैच ने इस मामले में एएस दौलत से बात की जो रॉ के पूर्व निदेशक रह चुके हैं. दौलत आईबी के भी पूर्व निदेशक रह चुके हैं.

आप जेएनयू की घटना को कैसे देखते हैं?

यह बेहद अफसोसजनक है. पूरे मामले का राजनीतिकरण किया गया. यह यूनिवर्सिटी के लिए सही नहीं है. बड़े नेताओं को इसमें नहीं कूदना चाहिए. अगर कुछ छात्रों ने कुछ किया उसमें युनिवर्सिटी को काम करने देना चाहिए था. युनिवर्सिटी के पास अनुशासनात्मक कार्रवाई के मामले में कई शक्तियां होती हैं.

कुछ ऐसे नारे लगाए गए जो वाकई में आपत्तिजनक थे. ऐसे में आप राजनाथ सिंह और स्मृति ईरानी के उस बयान को कैसे देखते हैं कि 'भारत माता का अपमान किया गया है और इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा?'

मुझे लगता है कि हमारे देश का दिल बहुत बड़ा है. इसमें बहुत कुछ समा सकता है. हम बहुलता को मूल सिद्धांत के तौर पर देखते हैं और असहम होना इसका हिस्सा है. आपको इसमें उकसाने की अहमियत को समझना होगा. तो क्या यह वास्तविक समस्या है? मामले की प्रतिक्रिया तार्किक आधार पर होनी चाहिए न कि इसमें चीजों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाना चाहिए.

निश्चित तौर पर स्वतंत्रता के अधिकार का मतलब यह नहीं है कि आप कुछ भी कहें. जैसा मैंने कहा कि अगर कुछ छात्रों ने सीमा लांघी हैं तो उन्हें निलंबित या बर्खास्त किया जा सकता है. लेकिन यूनिवर्सिटी में पुलिस को लाना सही नहीं है. देशद्रोह का मामला लगाना भी अतिवादी है.

विविधताओं के बावजूद हम एक राष्ट्र के तौर पर खड़े हैं. यह हमारी ताकत है

जहां तक भारत माता की बात है तो यह देश लोगों की समझ से बहुत ज्यादा है. अगर दुर्गा उनकी मां है जो शेर की सवारी करती है तो उसे इतनी आसानी से नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकता. यह सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि आप इसे कैसे देखते हैं. विविधताओं के बावजूद हम एक राष्ट्र के तौर पर खड़े हैं. यह हमारी ताकत है. 

भारत बेहद उदार और लोकतांत्रिक देश है. हमें इस पर गर्व है. मेरा मानना है कि हमें राष्ट्रद्रोह को लेकर इतना भावनात्मक होने की जरूरत नहीं है. राष्ट्रवाद और देशभक्ति ऐसी चीज है जिसकी जड़ें बेहद गहरी होती हैं.

आप कश्मीर मामले में लंबे समय से जुड़े रहे हैं. कुछ कैंपस में अफजल गुरु की मौत को विरोध प्रदर्शन के तौर पर मनाया जाता है. क्या आपको लगता है कि यह भारत के लिए चेतावनी जैसा है?

नहीं. इसे लेकर कोई बड़ी भावना नहीं है. 2014 में अफजल को फांसी दिए जाने के बाद विधानसभा और लोकसभा में जबर्दस्त मतदान हुआ. घाटी बेहतर हालत में है. अफजल गुरु कश्मीरी निराशावाद का महज संकेत भर है. उसकी और मकबूल भट की मौत की तारीख के बीच में बहुत अंतर नहीं होना एक बुरा संयोग है.

लेकिन समग्र तौर पर देश में सब कुछ ठीक है. मीडिया को आईएसआईएस को लेकर बहुत उत्सुकता रहती है लेकिन कश्मीर में कोई आईएसआईएस नहीं है. जो भी हरा और काला झंडा लहरा रहे हैं वह निराश लोग हैं. पाकिस्तान के साथ कश्मीर का विलय कोई नहीं चाहता. वह पाकिस्तान के समर्थक नहीं हैं.

नंदिता हक्सर का कहना है कि भारत को कश्मीरियत के विचार को सुदृढ़ करने पर काम करना चाहिए. अगर हम ऐसा करने में सफल रहते हैं तो पाकिस्तान अपने आप अप्रासंगिक हो जाएगा.

अगर यह आप पर छोड़ दिया जाता तो आप इसे कैसे संभालते?

कुछ नारे वाकई में आपत्तिजनक है. अगर यह नारे छात्र लगा रहे हैं तो मैं पहले ही कह चुका हूं कि इसे युनिवर्सिटी पर छोड़ दिया जाना चाहिए था. अगर नारे लगाने वाले बाहर के लोग थे तो पुलिस को कार्रवाई करनी चाहिए. जहां तक भारत के खिलाफ नकारात्मक धारणा की बात है तो आपको यह बात समझना होगा कि भारत जैसे बड़े देश में हमेशा एक ऐसा गुट रहेगा जो ऐसा करेगा. 

मैं चेन्नई में एक साहित्य समारोह में था और वहां मैंने कुछ लाइन हिंदी में बोली. एन राम ने मुझे वहां तुरंत रोक दिया और कहा कि देश में हर कोई हिंदी में बात नहीं करता. 

दिल्ली में इसे राष्ट्रविरोध के तौर पर देखा जाता. केंद्र के मुकाबले राज्यों के विचार अलग होते हैं. बंगाल, असम और ओडिशा में भारत को लेकर अलग-अलग विचार हैं और वह इसके अलग-अलग पहलुओं की आलोचना भी करते हैं. लेकिन जो हमें एक करता है वह हमारी बहुलता है.

First published: 16 February 2016, 8:25 IST
 
शोमा चौधरी @shomachaudhury

Editor-in-chief of Catch. In 2011, Newsweek International picked her as one of 150 power women "who shake the world". Prior to this, she was the managing editor and one of the founders of Tehelka, an investigative and public interest magazine. She has also worked in Outlook, India Today, the Pioneer and was one of the founders and directors of THiNK, a cutting-edge and internationally acclaimed thoughts and ideas conference. Shoma is a prolific writer and political commentator and has won several awards, including the Chameli Devi Award for Best Woman Journalist in 2011 for venturing into "news landscapes where angels fear to tread", the Ernest Hemingway Award for Journalism, the Ramnath Goenka award and the Mumbai Press Club award for Political Journalism.

She is firmly committed to the founding vision of India and ideas of social equity and justice. Loves rain, forests, rivers. Other than that, her alcoves of sanity are having a good film to watch and free time with her boys.

She can be reached at shoma@catchnews.com

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