Home » इंडिया » We'll chop off your hands': how scribes in Bastar are being silenced
 

छत्तीसगढ़: पुलिस बोली, जिन हाथों से खबर लिखता है उन्हें काट डालो

राजकुमार सोनी | Updated on: 28 July 2016, 7:58 IST

छत्तीसगढ़ में पत्रकारों के साथ जो कुछ घट रहा है वह किसी से छिपा नहीं है. प्रदेश के सैकड़ों पत्रकार किसी न किसी पुलिसिया जुल्म के शिकार हैं. बस्तर के पत्रकार सोमारू नाग को पुलिस ने माओवादी समर्थक होने के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था, लेकिन जेल में एक साल रहने के बाद अदालत ने उन्हें बाइज्जत बरी कर दिया.

आदिवासी या माओवादी? एक और ग्रामीण की मौत पर गहराया शक

पत्रकार प्रभात सिंह और दीपक जायसवाल भी पुलिसिया प्रताड़ना के शिकार हुए और कुछ महीने जेल में रहने के बाद अब जमानत पर बाहर है. इन पत्रकारों ने जेल से बाहर आने के बाद जो कुछ बताया वह दिल को दहला देने वाला है.

चमड़े के बेल्ट से पीटती रही पुलिस

आदिवासी इलाकों की समस्याओं को अपनी कलम के जरिए आवाज उठाने वाले सोमारू नाग मूल रुप से दरभा इलाके के मंगलपुर पेरमापारा के रहने वाले हैं. इसमें कोई शक नहीं कि इस इलाके में माओवादी पुलिस के लिए परेशानी का सबब बने हुए हैं.

स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि एक पत्रकार की हैसियत से सोमारू का अमूमन सभी सामाजिक कार्यक्रमों में आना-जाना था. आदिवासी मामलों को जानने-समझने के लिए देश और दुनिया के पत्रकार जब कभी भी बस्तर आते थे तो सोमारू उन्हें आसपास के गांवों में जरूर ले जाते थे.

तो क्या माओवादी और पुलिस सोरी को तिरंगा फहराने से रोक पाएंगे?

पुलिस का मानना था कि अपनी खोजी खबरों और आने वाले बाहरी पत्रकारों के जरिए सोमारू बस्तर को बदनाम करने में लगे हैं. पिछले साल जून में इलाके के एक क्रेशर प्लांट में माओवादियों ने धावा बोलकर लूटपाट की तो मौके की तलाश में बैठी पुलिस ने उन्हें भी इस मामले में आरोपी बनाकर उठा लिया. उन पर यह आरोप लगा कि माओवादियों की ओर से की जाने वाली लूटपाट में वे शामिल थे.

सोमारू का कहना है कि 16 जुलाई 2015 को जब वे छिंदवाड़ा स्थित एक दुकान में बैठे थे तभी सादी वर्दी में पुलिस उन्हें उठाकर तीरथगढ़ ले गई. उसे यह नहीं बताया गया कि किस जुर्म में गिरफ्तार किया गया है. तीन दिनों तक पुलिस उन्हें यातनाएं देती रही. उन्हें चमड़े के बेल्ट से पीटा गया. सोमारू ने बताया कि जब उसके पिता कोया उससे मिलने जेल में आए तब उसकी स्थिति उठने-बैठने की भी नहीं थी.

अब सोमारू रिहा हो गए हैं तो उनकी मन:स्थिति बदल सी गई है. वे कहते हैं, 'मुझे यह समझ में नहीं आ रहा कि मेरा कसूर क्या है. क्या एक पत्रकार होना अपराध है?'

काट डालो हाथ...

बस्तर के धुर माओवाद प्रभावित इलाके दंतेवाड़ा में रहने वाले एक अन्य पत्रकार प्रभात सिंह भी पुलिस के उत्‌पीड़न का शिकार हुए हैं. वे बताते हैं, 'एक रोज वे पुलिस की ओर से आयोजित एक प्रेस कान्फ्रेंस में गए हुए थे. उनके एक सवाल पर बस्तर के आईजी कल्लूरी ने चिढ़कर कहा- 'प्रभात... बहुत सवाल पूछते हो. तुम्हारी कुंडली हैं मेरे पास.'

बलात्कार, फर्जी मुठभेड़ और हत्या: छत्तीसगढ़ में नए सिरे से पुरानी कहानी

आईजी ने यह धमकी प्रभात को खुलेआम दी. इसके बाद उन पर एक नहीं पूरे चार केस दर्ज कर लिए गए. उन पर आरोप लगाया गया कि वे सोशल मीडिया में किसी को कल्लू मामा लिखते हैं तो कभी आधार कार्ड बनाने के नाम पर वसूली करते हैं.

छत्तीसगढ़ में सैकड़ों पत्रकार किसी न किसी पुलिसिया जुल्म के शिकार हैं.

पुलिस ने उन्हें 21 मार्च 2016 को गिरफ्तार किया और जगदलपुर थाने में ले आई. वहां से उन्हें दस किलोमीटर दूर एक सूनसान इलाके में बने परपा थाने ले जाया गया. प्रभात के साथ भी वही कहानी दोहरायी गई. थाने में मौजूद पुलिस के स्टाफ उन्हें यह समझाते रहे कि माओवादियों के खात्मे के लिए यदि वे कल्लूरी साहब को हेल्प करते हैं तो बच सकते हैं.

प्रभात ने पुलिस का मुखबिर बनने से इंकार किया तो लात-घूंसो और जूतों से उन्हें पीटा गया. गिरफ्तारी के दूसरे दिन उनसे कुछ कोरे कागज पर दस्तखत लेने की कोशिश की गई. जब उन्होंने इंकार कर दिया तो पुलिस वालों ने आरी को हाथ पर रखकर कहा, 'साले, बहुत खबर लिखते हो. हाथ काट देंगे तो कहीं के नहीं रहोगे.'

शादी में नाचने गए थे...माओवादी बताकर गिरफ्तार कर लिया

जान बचाने की गरज से प्रभात को कोरे कागज पर दस्तखत करने पड़े. जेल में भी उन्हें भूखा रखा गया. प्रभात के मुताबिक बस्तर की जेल में उन अपराधियों की पौ-बारह है जो पैसेवाले हैं. जेल में तीन तरह की रोटी बनती है. सूखी और पतली रोटी गरीब कैदियों को दी जाती है. थोड़ी मोटी रोटी मध्यम श्रेणी के कैदी खाते हैं जबकि घी चुपड़ी रोटी उन कैदियों को परोसी जाती है जो पैसा फेंक सकते हैं.

माओवादी बनाकर ठोंक देंगे

एक दैनिक के लिए काम कर रहे दीपक जायसवाल इसी साल 26 मार्च 2016 को गिरफ्तार किए गए थे. काफी दिनों तक उनकी गिरफ्तारी की सूचना पुलिस ने उनके घर वालों को नहीं दी. थाने में रखे गए दीपक ने विरोध किया तो उनसे कहा गया, 'ज्यादा बात करोगे तो माओवादी बताकर ठोंक देंगे.'

लगभग दो महीने 14 दिन जेल की सजा काटकर जमानत पर छूटे दीपक पर आरोप है कि उन्होंने एक परीक्षा केंद्र में जबरदस्ती प्रवेश किया और यह जानने की कोशिश की कि वहां नकल तो नहीं चल रही है.

छत्तीसगढ़: आधार और राशनकार्ड रखने वाले मजदूर भी माओवादी बना दिए गए

दीपक बताते हैं, 'दरअसल मामला उतना बड़ा नहीं था. जिस विद्यालय में दसवीं-बारहवीं की परीक्षा ली जा रही थीं उस विद्यालय के उपाध्यक्ष एक भाजपा नेता हैं. नेताजी को यह लगा कि उनकी पोल खुल जाएगी तो उन्हें जेल भिजवा दिया.'

मूलभूत सुविधाओं के लिए जेल के भीतर भी संघर्षरत रहे दीपक ने बताया कि जब उन्होंने पतली दाल के लिए विरोध जताया तो जेल के एक अधिकारी ने कहा, 'यदि जेल में गुंडों और मवालियों से मार खाना चाहते हो तो दोबारा दाल के बारे में मत सोचना.' दीपक आगे कहते हैं, 'दंतेवाड़ा की जेल यूं ही ब्रेक नहीं हुई थीं. यहां से सैकड़ो माओवादी इसलिए फरार हुए थे क्योंकि यहां एक ही समय में कई तरह की व्यवस्था संचालित होती है. यह जेल कुछ कैदियों के लिए स्वर्ग हैं तो कुछ के लिए नरक से भी बदतर.'

First published: 28 July 2016, 7:58 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी