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सम-विषम से भी कड़े कदम उठाने की जरूरत: प्लानिंग गुरु के टी रविंद्रन

श्रिया मोहन | Updated on: 31 December 2015, 15:41 IST
QUICK PILL
  • स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर और दिल्ली अर्बन ऑर्ट्स स्कूल के पूर्व हेड रहे के टी रविंद्रन का मानना है कि दिल्ली में प्रदूषण कम करने के लिए सम-विषम नीति की मदद से बेहतर शुरुआत की गई है.
  • हालांकि उनका मानना है कि सार्वजनिक परिहवन की व्यवस्था को दुरुस्त किए बिना इस दिशा में अपेक्षित कामयाबी नहीं मिलेगी.

दिल्ली में पहली बार इतनी सख्ती से प्रदूषण को रोकने के लिए कदम उठाया जा चुका है. अरविंद केजरीवाल सरकार नए साल की शुरुआत यानी 1 जनवरी 2016 से सम-विषम वाहन संख्या की नीति को लागू करने का फैसला कर चुकी है ताकि 15 दिनों के ट्रायल के दौरान दिल्ली की सड़कों पर दौड़ने वाली गाड़ियों की संख्या को आधा किया जा सके.

केंद्र सरकार पहले से ही इसे सुर्खियां बटोरने वाला फैसला करार दे चुकी है. लेकिन क्या पर्यावरणविद और शहरों की प्लानिंग में जुटे लोग भी ऐसा ही सोचते हैं? क्या इससे वाकई में प्रदूषण को रोकने में मदद मिलेगी? अगर यह योजना काम नहीं करती है तो फिर शहर की दूषित फिजां को साफ करने का हमारे पास कौन सा विकल्प होगा?

कैच ने स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर और दिल्ली अर्बन ऑर्ट्स स्कूल के पूर्व हेड रहे के टी  रविंद्रन के साथ इन मसलों पर विस्तार से बातचीत की.

क्या आपको लगता है कि सम-विषम की नीति से दिल्ली के प्रदूषण को रोकने में मदद मिलेगी?

मुझे लगता है कि यह एक अच्छा फैसला है. मैं तो कुछ सख्त फैसलों का भी समर्थन करता हूं. इससे निश्चित तौर पर प्रदूषण में कमी आएगी. हालांकि इसके साथ कुछ समस्या भी है. मसलन इस नीति को लागू  किए जाने के मामले में मोटरसाइकिलों को छूट दी गई है जो प्रदूषण को फैलाने में बड़ी भूमिका निभाते हैं. इस खामी को हटा दे तो यह नीति जरूर काम करेगी. इससे आने वाले दिनों में बड़े फैसले लेने में मदद मिलेगी. निश्चित तौर पर यह सराहनीय कोशिश है.

आपने पहले कहा था कि दिल्ली वैसा शहर है जिसकी डिजाइनिंग  खराब तरीके से की गई है. अगर इसे ठीक नहीं किया गया तो यह ऐसी किसी भी कोशिश को सफल नहीं होने देगा.

दिल्ली एक रेडियल सिटी है और इसकी सड़कें काफी घनी है जहां मुंबई और कोलकाता की तरह सार्वजनिक परिवहन को उतने सुचारु ढंग से नहीं चलाया जा सकता है. मुंबई और कोलकाता एक छोर से दूसरे छोर की तरफ जाते हैं और इसे जोड़ने में आसानी होती है.
जबकि एक वृताकार शहर में समग्र परिवहन व्यवस्था शुरू करने में परेशानी होती है जब तक कि सभी सड़कों को पूरी तरह से आपस में नहीं जोड़ दिया जाए. जब वाहन अलग-अलग दिशा में जा रहे हैं तब आपको एक इंटर-नोडल नेटवर्क की जरूरत होती है. 

पूरे शहर में परिवहन व्यवस्था को सुचारू ढंग से चलाने के लिए आपको बस, ऑटो और अन्य परिवहन साधनों की जरूरत होती है.

तो किसी को दिल्ली जैसे वृताकार शहर को कनेक्ट करने के लिए कैसे काम करना चाहिए?

बस हमें मुख्य परिवहन व्यवस्था से जोड़ने के लिए एक सेकेंडरी परिवहन सिस्टम की जरूरत होगी और इसमें बस, फट-फटी, रिक्शा या मोटर रिक्शा के बेड़े को शामिल किया जा सकता है. इस व्यवस्था को अलग से तय किए जाने की जरूरत है, तभी आप लंबे समय में लोगों को सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था से जोड़ पाएंगे. 

शेयर टैक्सी या शेयर ऑटो जो कोलकाता जैसे शहर में एक निधारित रूट पर चलते हैं. अच्छा विकल्प साबित हो सकता है

तेहरान में ऑरेंज कलर की टैक्सी से यह काम किया जाता है. अगर चालक उस दिशा में जा रहा है तो आप उसमें बैठ सकते हैं. वहां पर अधिकांश तौर पर उत्तर से दक्षिण दिशा की तरफ टैक्सी चलती है. 

इसके अलावा भाड़ा भी सस्ता है. इस वजह से लोग भी इससे यात्रा करने को तरजीह देते हैं. यह बसों का अच्छा विकल्प है. बस यह इस मायने में अलग है कि आप अजनबियों के साथ यात्रा कर रहे होते हैं.

दिल्ली में प्रदूषण को रोकने के लिए और क्या किया जा सकता है?

हमारे पास पैदल चलने का नेटवर्क नहीं है और यह सबसे बड़ी समस्या है. राजपथ और जनपथ को छोड़कर पूरे दिल्ली में पैदल चलने की जगह ही नहीं है. 

अगर संभव होता तो मैं हर दिन एक या दो किलोमीटर पैदल चलकर मेट्रो पकड़ने जाता. लेकिन मैं गलियों की मौजूदा हालत को देखते हुए ऐसा करने की सोच भी नहीं सकता. मैं गिर सकता हूं या गंदा हो सकता हूं. यह रहने का तरीका नहीं है. तो ऐसे में आप लोगों से कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि वह प्रदूषण को करने की दिशा में काम करेंगे.

न्यूयॉर्क में आप शहर के भीतर चल सकते हैं. जितनी दूर तक चाहे आप पैदल चल सकते हैं और कई लोग ऐसा करते भी है. 

दिल्ली में एक किलोमीटर चलना भी दूभर है. अवैध पार्किंग और सड़कों पर फैली गंदगी की वजह से आपको हद परेशानी होती है

अगर पैदल चलने का नेटवर्क नहीं है तो किसी भी सूरत में सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था को दुरुस्त नहीं किया जा सकता. जब लोग पैदल चलेंगे तो दिल्ली का मिजाज बदलेगा. कई छोटी कोशिशों से शहर की सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था को सुधारा जा सकता है.

सम-विषम का बेहतर विकल्प क्या हो सकता है?

सबसे पहली कोशिश तो गाड़ियों की संख्या को कम करना है. यह एकमात्र समाधान है. यह सभी अंतरिम उपाय है. आप वाहनों की संख्या बढ़ाकर प्रदूषण फैलाएं और फिर उसे घटाकर प्रदूषण कम  करने की कोशिश करें, यह नहीं चल सकता. बेहतर है कि आप गाड़ी खरीदने की लागत बढ़ाकर उसे खरीदने की प्रक्रिया को ही हतोत्साहित कर दें.

आप और आपका परिवार कैसे मैनेज करेंगे?

मैं बस इतना जानता हूं कि 1 जनवरी से मैं परेशानियों का सामना करने जा रहा हूं. मेरी पत्नी और मेरी उम्र 70 के आस पास है और ऐसे में हमारे लिए बस या मेट्रो से चलना मुश्किल है. हमारे पास कार भी एक ही है. नोएडा जाने के लिए मुझे परेशान होना पड़ेगा जहां मैं काम करता हूं. 

मेरे घर से वहां तक कोई सीधी परिवहन व्यवस्था भी नहीं है.ऐसा भी नहीं है कि वरिष्ठ नागरिकों को ही परेशानी का सामना करना पड़ेगा. मुझे पता है कि लड़कियों को बसों में छेड़खानी का सामना करना पड़ता है. वह बस में फिर से नहीं चढ़ना चाहती हैं. ऐसे में भीड़ बढ़ने के बाद वह किस तरह से सुरक्षित परिवहन को लेकर सरकार पर भरोसा करेंगी?

केजरीवाल ने कहा है कि सम-विषम की नीति तभी सफल होगी जब दिल्ली के लोग सहयोग करेंगे. आपको लगता है कि  लोग सहयोग करेंगे?

हर कोई प्रदूषण को कम करना चाहता है. हालांकि दिल्ली के लोग ऐसे नहीं है. अधिकांश तो सही दिशा में गाड़ी भी नहीं चलाते हैं. उन्हें पता है कि  दिल्ली में सब चलता है. दिल्ली में पैदल चलने का नेटवर्क नहीं है. अगर हम ऐसा कर पाते हैं तो लोग एक दूसरे के संपर्क में ज्यादा आएंगे और उनके बीच दोस्ताना संबंध बनेंगे. इससे लोगों के बीच सहयोग की भावना आएगी.
 
First published: 31 December 2015, 15:41 IST
 
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