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सीमा पर नहीं, पाक को उसके घर में घेरें

गोविंद चतुर्वेदी | Updated on: 19 August 2016, 7:15 IST
QUICK PILL
  • \'भारतीय कूटनीति\' इन दिनों \'अग्निपरीक्षा\' के दौर से गुजर रही है. कश्मीर से लेकर पाकिस्तान और निर्गुट आन्दोलन से लेकर अमरीका-रूस तक सब उसकी परीक्षा ले रहे हैं. चीन की बात छोडि़ए, छोटा-सा देश नेपाल भी इस मामले में पीछे नहीं है.
  • ऐसे में जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पाकिस्तान को पाक-अधिकृत कश्मीर, गिलगित और बलूचिस्तान में मानवाधिकारों के हनन पर लताड़ते हैं, तब पूरे देश में खुशी की लहर का दौड़ना स्वाभाविक है.

'भारतीय कूटनीति' इन दिनों 'अग्निपरीक्षा' के दौर से गुजर रही है. कश्मीर से लेकर पाकिस्तान और निर्गुट आन्दोलन से लेकर अमरीका-रूस तक सब उसकी परीक्षा ले रहे हैं. चीन की बात छोडि़ए, छोटा-सा देश नेपाल भी इस मामले में पीछे नहीं है.

कभी ओली तो कभी प्रचण्ड सब उसकी परीक्षा लेते ही नजर आते हैं. कई बार तो लगता है कि भारत के अपने राजनेता भी उसकी परीक्षा ले रहे हैं. ऐसे में जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पाकिस्तान को पाक-अधिकृत कश्मीर, गिलगित और बलूचिस्तान में मानवाधिकारों के हनन पर लताड़ते हैं, तब पूरे देश में खुशी की लहर का दौड़ना स्वाभाविक है.

सबको लगता है यह जैसे को तैसा की तर्ज पर बिल्कुल ठीक है. जब प्रधानमंत्री बोले हैं तो बहुत सोच-समझकर बोले होंगे. तमाम तरह की कूटनीति को ध्यान में रख रणनीतिक रूप से बोले होंगे. सारे नफे-नुकसान उन्होंने देखे ही होंगे.

चीन के राष्ट्रपति को झूला झुलाना और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के घर शादी में अचानक पहुंचकर पड़ोसियों से तनाव के रिश्तों को आरामदायक बनाने की पूरी कोशिश के बाद अगर उन्होंने अब पाकिस्तान को 'शीशा'दिखाया है तो यह मान लेना चाहिए कि उन्हें सीधी अंगुली से घी निकलता नहीं दिख रहा.

उसी तरह जैसे 1971 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को लगा था. बार-बार के भारत-पाक युद्धों से परेशान इंदिरा गांधी को जब लगा कि तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में चल रहा लोकतंत्र का संघर्ष अंतत: भारत को भी अपनी चपेट में ले लेगा, तब वे सीधे मैदान में कूद गईं.

अगर अमरीका और पाकिस्तान ने खालिस्तान आन्दोलन को हवा नहीं दी होती तो 'सिंध' कभी का अलग देश बन गया होता

भारतीय जनरल एसएचएफजे मानेकशा, ले जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा और अन्य सभी को पूरे अधिकार देकर मैदान में उतार दिया गया. तब का परिणाम सबके सामने है. 

भारत को कमजोर करने की कोशिशों में लगा पाकिस्तान और याह्या खां जैसे उसके हुकमरानों के तेवर ढीले पड़ गए. एक युद्ध में, एक ही मैदान पर दुश्मन के 95 हजार फौजियों का समर्पण करवाकर भारतीय सेना ने तब जो इतिहास रचा उसे आज तक विश्व में कोई सेना नहीं दोहरा पाई है.

इतिहास बताता है कि यह इंदिरा गांधी ही थीं जिन्होंने तब 'रॉ' के तत्कालीन चीफ आरएन काव के मार्फत पश्चिम पाकिस्तान में 'जिए सिंध' आन्दोलन को हवा दी थी. तब अगर अमरीका और पाकिस्तान ने मिलकर खालिस्तान आन्दोलन को हवा नहीं दी होती तो 'सिंध' कभी का अलग देश बन गया होता.

यह कूटनीति ही होती है जो आपको हराती-जिताती है. बीच के सालों में भारत में राजनीतिक अस्थिरता का जो दौर रहा, उसमें राजनेता अपनी कुर्सी बचाने में ही लगे रहे. भारतीय विदेश नीति को इसका बड़ा खमियाजा उठाना पड़ा. भारत सरदार स्वर्ण सिंह और वाईवी चह्वाण जैसे विदेश मंत्रियों के लिए तरसता रहा.

कभी हमारी सबसे बड़ी ताकत रही हमारी विदेश नीति, हमारी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई. आईबी और रॉ जैसे संगठनों को भी हमारे राजनेताओं ने अपनी तुच्छ राजनीति का औजार बना लिया. अफसोस की बात यह भी रही कि, उनके अधिकांश मुखिया बिना रीढ़ के हो गए.

पड़ोसी देशों पर ध्यान देना तो दूर वे भारत पर भी ध्यान नहीं दे पाए. उधर पाकिस्तान इस मोर्चे पर भारी पड़ने लगा. उसकी आईएसआई ने भारत में आतंक फैलाने का दांव खेला और हमारी कमजोरी से वह कामयाब हो गई. दिल्ली, मुम्बई, चेन्नई, कोलकाता, जयपुर और हैदराबाद जैसे भारत के अनेक शहरों में पाक प्रायोजित आतंकवाद ने सैकड़ों निर्दोषों की जान ले ली.

कोलंबो में हमारे प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर हमले तक का हमारी गुप्तचर एजेंसियां कोई पूर्वानुमान नहीं लगा सकी. बेशक हम पड़ोसियों से अच्छे सम्बंध चाहते हैं लेकिन किस कीमत पर? क्या भारतीयों के लहू की कीमत पर? अब यदि हमने पीओके, बलूचिस्तान और गिलगित की बात की है तो उसमें बुरा क्या है? क्या मानवाधिकारों की बात वहां नहीं होनी चाहिए?

अब यदि हमने पीओके, बलूचिस्तान और गिलगित की बात की है तो उसमें बुरा क्या है?

यदि अब हमने इस दिशा में कदम बढ़ाया है तो मजबूती से उस दिशा में चलना भी चाहिए. मौजूदा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल इस लक्ष्य के लिए सक्षम व्यक्ति हैं. कश्मीर से लेकर पाकिस्तान और पुलिस से लेकर आईबी तक सब पर उनकी पकड़ अपने पूर्ववर्तियों से कहीं अधिक और अलग हैं.

ऐसे में रामायण के समुद्र प्रसंग की तरह यदि मोदी अब इस बात के प्रति आश्वस्त हो गए हैं कि, भय बिन प्रीति नहीं होने वाली तो पाकिस्तान को अब वह सब कुछ समझाने की जरूरत है जो वर्ष 1971 में उसे तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने समझाया था.

पाकिस्तान की फितरत मरहूम जुल्फिकार अली भुट्टो की उस एक लाइन से आसानी से समझी जा सकती है जिसमें उन्होंने भारत से हजार साल तक जंग लड़ने की तैयारी दिखाई थी. ऐसे में प्रधानमंत्री ने जो कहा, वह भारतीय राजनय की परीक्षा इसलिए भी है कि, आज हमारे पास तब के सोवियत संघ जैसी कोई मजबूत मित्र शक्ति नहीं है.

अमरीका है पर कितने भरोसे लायक, शायद खुद अमरीका नहीं जानता. चीन तब हमारा शत्रु होकर भी पाकिस्तान के साथ नहीं था. आज तो वह स्वयं पाकिस्तान में बड़े-बड़े कॉरिडोर बना रहा है. अमरीका से ज्यादा आज पाकिस्तान चीन की गोद में बैठा है.

निर्गुट आन्दोलन और उसमें हमारी स्थिति भी किसी को पता नहीं है. तब भारत को इस बात का पूरा ध्यान रखना होगा कि उस वक्त पीठ में छुरा घोंपने वाला एक था, आज कमोबेश हर पड़ोसी उसी भूमिका में है. ऐसे में चौकसी हर तरफ जरूरी है. घर के अंदर से लेकर बाहर तक. लेकिन यदि हम पाकिस्तान को उसके घर में ही उलझाने में कामयाब हो गए तो मानो बिना लड़े ही जंग जीत गए. तब पाकिस्तान को बहुत जोर लगाना होगा हमारे सामने खड़ा होने में.

First published: 19 August 2016, 7:15 IST
 
गोविंद चतुर्वेदी @catchhindi

लेखक राजस्थान पत्रिका के डिप्टी एडिटर हैं.

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