Home » इंडिया » we should come out of sentimentalism to talk on rohit issue
 

रोहित वेमुला की खुदकुशी पर बात करने के लिए भावुकता से बाहर निकलने की जरूरत है

अपूर्वानंद | Updated on: 20 January 2016, 23:14 IST
QUICK PILL
  • हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुला की खुदकुशी एक क्रूर, ठंडी, असंवेदनशीलता की वजह से ही हुई है. इस मामले में कुलपति, स्मृति ईरानी और बंडारू दत्तात्रेय का बचाव कमजोर है.
  • आजकल जितने उत्साह से संघ अंबेडकर को छाती से लगाने पर आमादा है उसका \r\nराजनीतिक आशय यह है कि दलित तब तक स्वीकार्य है जब तक वह व्यापक हिंदू हित \r\nकी परियोजना में सहायक है.

रोहित वेमुला की खुदकुशी पर बात करने के लिए भावुकतावाद से बाहर निकल आने की जरूरत है. क्योंकि यह खुदकुशी एक क्रूर, ठंडी, असंवेदनशीलता की वजह से ही हुई है जो किसी भी तरह की मानवीय भावुकता को रौंद डालती है.

हम रोहित के अंतिम पत्र की काव्यात्मक भाषा की बात न करें, न यह कहें कि वह अपनी दलित पहचान के दायरे से निकल कर एक कहीं बड़ी पहचान खुद बनाना चाहता था. उस पत्र का विश्लेषण करने की जगह, बेहतर हो कि हम इस खुदकुशी पर शासक वर्ग की प्रतिक्रिया का विश्लेषण करें. यह जानने के लिए कि हमारा सामना किस यथार्थ से है.

खबर है कि हैदराबाद विश्वविद्यालय के कुलपति को सदमा पहुंचा और रोहित के इस कदम को वे समझ न पाए. उनसे जब पूछा गया कि क्यों उन्होंने निजी तौर पर रोहित से बात करने की आवश्यकता महसूस नहीं कि जबकि उसने एक बेचैनी से भरा ख़त पहले ही लिखा था तो वे सिर्फ यही कह सके कि वे तो कानूनी दायरे में काम कर सकते हैं.

कुलपति का यह कहना कि उनपर केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय का दबाव न था, बहुत कमजोर जान पड़ता है

इसका मतलब यह हुआ कि उनसे किसी इंसानी रुख की उम्मीद करना बेमानी है. उनके पास इसका कोई जवाब नहीं कि आखिर वह कौन सी मजबूरी थी कि उन्होंने  अपने पूर्ववर्ती कुलपति के फैसले को पलट दिया जिसके तहत रोहित वेमुला और उनके मित्रों के निलंबन को रद्द कर दिया गया था.आखिर वह भी कुलपति का फैसला था.

मानवीयता के प्रश्न पर कुलपति की चुप्पी कही अधिक परेशानकुन है. अगर विश्वविद्यालयों में मानवीयता का स्थान न होगा तो और कहां उसे खोजा जाए? दिमागी और मनोवैज्ञानिक उथल-पुथल से भरी उम्र में नौजवान जब आपके पास आएं तो आपका जिम्मा सिर्फ पाठ्यक्रम पूरा करने और उन्हें पास या फेल करने भर का नहीं. इसीलिए अध्यापक का काम और शिक्षण संस्थाओं के प्रमुखों का काम कहीं अधिक नाजुक है.

एक-एक छात्र की छोटी-बड़ी परेशानी या उलझन उनके लिए महत्वपूर्ण है. वरना उन्हें किसी दफ्तर में बैठ कर फाइलें देखनी चाहिए या साबुन बेचना चाहिए.

कुलपति का यह कहना कि उनपर केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय का दबाव न था, बहुत कमजोर जान पड़ता है. उतना ही कमजोर जितना मंत्रालय का यह कहना कि उसने तो रूटीन तरीके से बंडारू दत्तात्रेय के पत्र को अग्रसारित भर कर दिया था.

एक रोज़ पहले मानव संसाधन मंत्री ने जब भावहीन चेहरे के साथ कहा कि विश्वविद्यालय एक स्वायत्त संस्था है जिसके कामकाज में मंत्रालय दखल नहीं देता तो उन्हें अंदाज न रहा होगा कि अगली सुबह ही इस मामले में उनके मंत्रालय की बेवजह दिलचस्पी उजागर हो जाएगी जब उसके चार-चार पत्र सामने आ जाएंगे जो उसने इस मामले में कार्रवाई की मांग करते हुए और फिर उसकी जानकारी मांगते हुए विश्वविद्यालय को थोड़े-थोड़े अंतर पर लिखे. अगर यह विश्वविद्यालय को इस मामले को एक खास तरीके से निपटाने का इशारा न था तो और क्या था?

रोहित मामले में मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा लिखे गए चार पत्र सवाल पैदा करते हैं

भारतीय जनता पार्टी ने कहा कि ये पत्र कोई मंत्री ने थोड़े ही लिखे या लिखवाए, यह तो कायदे के मुताबिक बाबुओं ने खुद किया. जो भी सरकारी काम के ढर्रे को जानता है, उसे यह बात हास्यास्पद ही जान पड़ेगी. गंभीर-से गंभीर मसले पर बाबुओं को हमने आजतक इतना तत्पर नहीं देखा. ये पत्र अगर मंत्री के कहने से नहीं गए तो और भी चिंता की बात है, क्योंकि इसका अर्थ यही है, जो अफवाह भी है कि मंत्रालयों के काम में गैर-सरकारी हस्तक्षेप किया जाता है और एक विशेष परिवार के प्रतिनिधि ऑफिसरों को बताते हैं कि उन्हें क्या करना है और क्या नहीं! इस बात की सफाई करनी ही होगी कि इस मामले में क्यों इतनी रुचि मंत्रालय ने ली! क्या ऐसा ही वे अन्य मामलों में करते हैं? क्या ऐसा वे सिर्फ 'वीआईपी' के कहने पर करते हैं? वीआईपी की परिभाषा क्या है ?

सबसे चिंताजनक प्रतिक्रिया शासक दल और उसके नेताओं की है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, उसके छात्र संगठन और अन्य व्यक्तियों ने सबसे पहला काम यह किया कि साबित करें कि रोहित वेमुला असली दलित नहीं था. उसके माता-पिता में से एक पिछड़ी जाति से हैं, इसलिए रोहित पूरा दलित नहीं है, यह कई बार कहा गया. मानो इससे इस खुदकुशी की गंभीरता कम हो जाती है! लेकिन इस प्रचार में जो चालाकी है,वह इतनी छिपी भी नहीं !

रोहित के दलितपन में संदेह पैदा करने की कोशिश के साथ दूसरा प्रचार भी किया जा रहा है: जैसे रोहित और उसके मित्र दरअसल दलितों के प्रश्न पर काम भी नहीं करते थे. वे अंबेडकर के नाम का दुरूपयोग कर रहे थे. इसकी इजाजत कैसे दी जा सकती है कि दलित संगठन याकूब मेमन की फांसी के प्रश्न पर विरोध प्रदर्शन करे.

संघ को हर दलित पहलकदमी मंजूर है लेकिन दलित-मुस्लिम-पिछड़ा एकजुटता उसे बर्दाश्त नहीं

तर्क पेश किया जा रहा है कि अंबेडकर के बनाए संविधान के अनुसार चलने वाली अदालत ने जब कोई सजा सुना दी तो उसका विरोध करने का मतलब है अंबेडकर का अपमान! चूंकि अंबेडकर भारतीय राष्ट्र के परिकल्पकों में से एक थे, उसके नाम पर काम करने वाले राज्य का विरोध भी आंबेडकर का विरोध होगा! इस तरह औरों के साथ-साथ दलितों और आदिवासियों से विरोध का चुनाव करने का बुनियादी जनतांत्रिक अधिकार भी छीना जा रहा है.

लेकिन रोहित और उसके संगठन का अधिक बड़ा और असली जुर्म था मुस्लिम सवाल उठाना! उन्होंने याकूब मेमन की फांसी का विरोध किया और मुजफ्फरनगर में हुई सांप्रदायिक हिंसा पर बनी फिल्म 'मुज़फ्फरनगर बाकी है'  के प्रदर्शन  पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के छात्र संगठन के हमले का विरोध किया. इससे सिद्ध हुआ कि रोहित और उनका संगठन दलित अधिकार के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में संलग्न थे.

इस तर्क पर थोड़ा विचार कर लेना चाहिए. आजकल जितने उत्साह से संघ अंबेडकर को छाती से लगाने पर आमादा है उसका राजनीतिक आशय यह है कि दलित तब तक स्वीकार्य है जब तक वह व्यापक हिंदू हित की परियोजना में सहायक है. उसका प्यादा बना रहता है. उसे अपना राजनीतिक पक्ष चुनने की आज़ादी नहीं है. अगर वह अपने अलावा भारत के दूसरे सबसे पिछड़े समुदाय यानी मुसलमानों का कोई सवाल उठाएगा तो वह फौरन खतरनाक हो जाएगा. उसे वैसे ही निशाना बनाया जाएगा जैसे रोहित और उसके मित्रों को बनाया गया और उसका जीना दूभर कर दिया जाएगा.

आखिर ‘अम्बेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन’ जैसा अकेला संगठन, जिसकी भारत में और कहीं शाखा नहीं है, क्यों संघ के लिए इतना खतरनाक हो उठा? क्योंकि वह दलित राजनीति की एक दूसरी संभावना की ओर इशारा कर रहा था, कह रहा था कि दलित की मुक्ति का संघर्ष और दमित पहचानों के संघर्ष के साथ जुड़ा है. उनमें से एक पहचान मुसलमान की है.

क्या भारत में कोई मुसलमानों का सवाल उठाएगा तो वह फौरन खतरनाक हो जाएगा?

संघ को हर दलित पहलकदमी मंजूर है लेकिन दलित-मुस्लिम-पिछड़ा एकजुटता उसे बर्दाश्त नहीं. पिछले वर्षों में सामाजिक न्याय की राजनीति से पैदा दलित और पिछड़ा वर्ग की ऊर्जा का हिंदू राष्ट्रवादी हित में रूपांतरण करने में संघ ने जीजान लगा दी है. अंबेडकर का राष्ट्रीयकरण किया जा रहा है. इस अभियान में रोहित और उसके संगठन की मुखरता बाधा है.

दलित सिर्फ दलित का सवाल उठाए, कुछ और करने की सोचना, या अपना पक्ष खुद चुनना राष्ट्रीय अपराध है,संघ का संदेश यही है.

रोहित वेमुला का अकेलापन और खालीपन सिर्फ उसका नहीं. स्कूलों में अलग कतार में बैठने और भोजन करने को मजबूर दलित बच्चों और उनके परिवारों का अकेलापन सिर्फ दलितों को दिखता है. हमें यह झूठा प्रचार लगता है! उस दलित औरत के अकेलेपन को कौन समझेगा जिसके हाथ का खाना खाने से उसके गांव के ऊंची जातियों के बच्चे इनकार कर देते हैं?

अगर वे सब खुदकुशी नहीं कर ले रहे तो इसकी वजह कोई भारतीय समाज की उदारता और खुलापन और उसका समरस स्वभाव नहीं है: इसकी वजह खुद ज़िंदगी है जो जीते जाने के लिए मजबूर करती है. अंबेडकर कोई भारत की वजह से नहीं जीवित रहे, बल्कि उनकी शिक्षा ने उन्हें भारत का सामना करने की ताकत दी.

हमारे विश्वविद्यालयों में अपनी स्वायत्तता को लेकर कोई जिद भी नहीं बची है.वे अब नौजवानों के लायक रह भी नहीं गए हैं! समाज के कमजोरों के हक में खड़ा होने की उम्मीद उनसे करना व्यर्थ है.

राष्ट्रवादी विकास के मादक समय में हैरानी इस पर न होनी चाहिए कि एक रोहित ने क्यों खुदकुशी कर ली! इस पर होनी चाहिए कि वह एक ही क्यों है!

First published: 20 January 2016, 23:14 IST
 
अपूर्वानंद

He is a professor at the University of Delhi

पिछली कहानी
अगली कहानी