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377 पर संवैधानिक पीठ से ज्यादा उम्मीद करने की जल्दी न करें

सौरभ दत्ता | Updated on: 10 February 2017, 1:52 IST
QUICK PILL
  • मंगलवार को धारा 377 पर क्युरेटिव याचिका की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मामले को पांच जजों की संविधान पीठ को भेज दिया.
  • संविधान पीठ मामले के किन बिंदुओं पर गौर करेगी ये अभी साफ नहीं है. संविधान पीठों की कमी भी मामले की सुनवाई को प्रभावित कर सकती है.

भारत में समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर निकलवाने की एक आखिरी उम्मीद बाकी है. मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को चुनौती देने वाली क्युरेटिव याचिका को विचार के लिए पांच सदस्यों वाली संविधान पीठ को भेज दिया.

अभी तक ये स्पष्ट नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने किन बिंदुओं पर विचार के लिए मामला संविधान पीठ को भेजा है. सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर ने संविधान पीठ को मामला भेजते हुए कहा कि ये विषय संवैधानिक महत्व का है.

अभी तक ये भी नहीं पता चला है कि संविधान पीठ का गठन कब होगा और कब से मामले की सुनवाई शुरू करेगा.

सुनवाई से पहले संविधान पीठ को ये तय करना होगा कि वो किन आधार पर क्युरेटिव याचिका पर विचार करेगा. संभव है कि संविधान पीठ सुप्रीम कोर्ट के साल 2013 के फैसले के मेरिट पर विचार करे.

मुख्य याचिककर्ता नाज़ फाउंडेशन के अलावा सात अन्य लोगों ने कोर्ट के 2013 के फैसले के खिलाफ याचिका दायर की थी. अदालत ने आठों याचिकाओं को एक याचिका में शामिल कर लिया.

धारा 377 निजता के बुनियादी मानवाधिकार का गंभीर उल्लंघन करती हैः आनंद ग्रोवर

सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने मामले में याचिकाकर्ताओं का पक्ष अदालत में रखा. सिब्बल ने एलजीबीटी (लेस्बियन, गे, बाइसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर) समुदाय की गरिमा को अपनी दलील का मुख्य आधार बनाया.

सिब्बल ने अदालत से कहा, "अगर अदालत ने 2013 के फैसले को बदला नहीं तो इससे समलैंगिकों की वर्तमान और भावी पीढ़ियों का जीवन दुष्कर हो जाएगा. वो समाजिक तिरस्कार का शिकार बनते रहेंगे और पुलिस और अदालत के हाथों शोषित होने को अभिशप्त होंगे."

सीनियर एडवोकेट आनंद ग्रोवर लॉयर्स कलेक्विट (एक याचिकाकर्ता) की तरफ से मामले में पेश हुए थे. ग्रोवर ने 'निजता के अधिकार' को अपनी दलील का मुख्य आधार बनाया. ग्रोवर ने अदालत से कहा कि धारा 377 निजता के बुनियादी मानवाधिकार का गंभीर उल्लंघन करती है.

पढ़ेंः समलैंगिकता के मामले की सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बनाई संवैधानिक पीठ

साल 2009 में दिल्ली हाईकोर्ट ने धारा 377 को रद्द कर दिया था. दिल्ली स्थित ज्योतिष सुरेश कुमार कौशल उस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गए जिसके बाद सर्वोच्च अदालत ने हाईकोर्ट का फैसला पलट दिया. मंगलवार को कौशल भी अदालत में मौजूद थे. वो समलैंगिकता को अनैतिक और अप्राकृतिक मानते हैं.

विभिन्न धर्मों से जुड़ी कुछ संस्थाओं ने भी मामले में अपना पक्ष रखा. इन संस्थाओं के कहना था कि समलैंगिकता अनैतिक मनोविकृति है. अगर इस अपराध की श्रेणी से बाहर किया गया तो समाज पर इसका बहुत प्रभाव पड़ेगा.

संविधान पीठ से कितनी उम्मीद


साल 2013 में कानून के कई जानकारों ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले की आलोचना की थी. आलोचकों के अनुसार समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर निकाला जाना चाहिए. तब इस मामले की सुनवाई दो जजों जीएस सिंघवी और सुधांशु ज्योति मुखोपाध्याय की बेंच ने की थी.

उस समय हार्वर्ड लॉ स्कूल के निक रॉबिंसन ने भारतीय अदालत के फैसले की कड़ी आलोचना करते हुए कहा था कि इस मामले को संवैधानिक पीठ को सौंपा जाना चाहिए था.

संविधान की व्याख्या से जुड़े हुए किसी भी महत्वपूर्ण कानूनी सवाल पर संविधान पीठ ही विचार कर सकती है

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 145(3) के तहत संविधान पीठ में पांच ये उससे ज्यादा जज होते हैं. इसके अनुसार 'संविधान की व्याख्या से जुड़े हुए किसी भी महत्वपूर्ण कानूनी सवाल' पर संविधान पीठ ही विचार कर सकती है.

पिछले कुछ समय से सुप्रीमो कोर्ट में संविधान पीठ का काफी अभाव रहा है. कानून के जानकार मानते हैं कि इस कमी के कारण न्याय की गुणवत्ता पर असर पड़ता है. शायद इसे ध्यान में रखते हुए ही वर्तमान मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर ने पद संभालते ही तीन संवैधानिक पीठों को गठन किया, जो इस साल जनवरी से सुनवाई शुरू कर चुकी हैं. ये पीठ हर सोमवार और शुक्रवार को सुनवाई करती है.

इस मामले पर संविधान पीठ कब सुनवाई करेगी और इस पीठ में कौन-कौन से जज होंगे ये अभी साफ़ नहीं है. सुप्रीम कोर्ट के कई जज अपने 'रूढ़िवादी' विचार खुलकर सार्वजनिक कर चुके हैं ऐसे में संविधान पीठ को लेकर अभी बहुत ज्यादा उत्साहित होना उचित नहीं होगा.

First published: 3 February 2016, 11:45 IST
 
सौरभ दत्ता @catchnews

संवाददाता, कैच न्यूज़

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