Home » इंडिया » हम आज भी फिल्में हिंदुस्तानी शैली में देखते हैं
 

हिंदुस्तानियों की फिल्म देखने की शैली थोड़ी अलग है, 'पिंक' ने इसे साबित कर दिया

अतुल चौरसिया | Updated on: 21 September 2016, 7:13 IST
QUICK PILL
  • तकरीबन एक दशक पुराना वाक़या है. बनारस के साजन सिनेमाघर में फिल्म के दौरान लाइट गुल होने पर जनता ने हंगामा काट दिया था. फिल्म चालू कर मा.....द, जनरेटर से फिल्म दिखाओ भों....के. जैसे स्वर जनता के बीच से एकतार गूंजने लगे.
  • एक दशक से ज्यादा हो गए इस किस्से को, सो स्मृतियों के धरातल से यह परंपरा धूमिल हो गई थी. मगर गुज़रे रविवार को जीके-2 जैसे पॉश इलाके में पिंक फिल्म के दौरान सिनेमाहॉल के भीतर दम पे दम सीटी बज रही थी, तालियों का समवेत स्वर गूंज रहा था. लोगों की मुट्ठियां तनी हुई थी, हालंकि लोग हिंदी में \'मार साले को\' की बजाय \'किल दैट बास्टर्ड\' जैसे वाक्य बोल रहे थे. ज्यादातर लड़कियों का हुजूम था.

साल 2000 में देश के मानस पर करगिल युद्ध की यादें एकदम ताजा थीं. इस दौर में पैदा हुए राष्ट्रवादी उन्माद के व्यावसायिक दोहन में सिनेमा वाले भी पीछे नहीं थे. तब अजय देवगन के नायकत्व में भारत-पाकिस्तान की दुश्मनी को भुनाने के लिए एक फिल्म बनी थी 'हिंदुस्तान की कसम'. फिल्म तो खैर अपनी कचरा कहानी और घटिया निर्देशन के चलते दम तोड़ गई, लेकिन उसी फिल्म को देखने के दौरान एक वाकया ऐसा रहा जो हमेशा के लिए स्मृतियों में दर्ज हो गया.

बनारस के सिगरा स्थित साजन सिनेमाघर के भीतर फिल्म की शुरुआत से पहले ही माहौल बेहद हंगामेदार था. एक समूह 'भारत माता की जय' के नारे लगा रहा था. नारेबाजी खत्म हुई, फिल्म शुरू हुई. फिल्म थोड़ी ही आगे बढ़ी थी कि लाइट गुल हो गई. जनता ने एक बार फिर हंगामा काट दिया. इस बार निशाना पाकिस्तान की बजाय सिनेमाघर प्रबंधन था. फिल्म चालू कर मा.....द, जनरेटर से फिल्म दिखाओ भों....के. जैसे स्वर जनता के बीच से एकतार गूंजने लगे.

उसी समय एक और वाकया हुआ. तब फिल्में प्रोजेक्टर से चलती थीं, सिनेमा का डिजिटलीकरण अभी हुआ नहीं था. रील को प्रोजेक्टर के सहारे रोल करने वाला एक कर्मचारी हॉल की सबसे पीछे मौजूद दीवार के उस पार रहता था. लगभग 70 फुट लंबी और 40 फुट चौड़ी सपाट दीवार के बीचोबीच एक छेद होता था जहां से प्रोजेक्टर की रोशनी सिनेमा के पर्दे पर गिरती थी.

उसी 70 गुणा 40 फुट सपाट दीवार के प्रोजेक्टर वाले छेद से एक सिर बाहर निकला. यह बड़ा दानवीय दृश्य था. लंबी चौड़ी दीवार से निकला एक सिर, उसकी दो आंखें. उसने जोरदार आवाज में कहा, कौन है भों.....वाला जो गाली दे रहा है, दम है तो सामने आए माद्....द.

16 रुपए की टिकट लेकर सिनेमाहॉल पहुंचे दर्शकों में इतना दम न था कि ताकतवर सिनेमाहॉल प्रबंधन से लोहा ले पाते, लिहाजा हॉल में सन्नाटा छा गया. प्रबंधन और दर्शकों के बीच युद्धविराम हो गया. आपसी संवाद का यह अनूठा दृश्य था.

कभी बिजली कट जाने, कभी रील फंस जाने या अलहदा वजहों से इस तरह की स्थितियां छोटे शहरों के सिनेमाहॉल में आना आम फहम चीज थी. इस पर दर्शकों का हो-हल्ला भी उतनी ही आम बात थी. लगभग इसी तरह की प्रतिक्रियाएं दर्शकों की बिजली आ जाने, हीरो द्वारा विलेन को पीट देने, शानदार संवाद कहने पर भी आती थीं. यह छोटे शहरों में सिनेमा देखे लोगों की आम कहानी है.

एक कहानी इसके उलट है

मगर आज करीब डेढ़ दशक बाद दिल्ली-मुंबई-बंगलुरू के मल्टीप्लेक्सों में सिनेमा देखने वालों की कहानी इसके उलट है. यहां बेहद संयत, शालीन, अभिजात्य शैली में फिल्में देखी जाती हैं. सीटी बजाना, ताली बजाना या पात्रों के साथ खुद को जोड़कर प्रतिक्रिया जताना यहां की शैली नहीं है. अमूमन ऐसा करना यहां एक अलग निगाह से देखा जाता है. दिल्ली के सिनेमाघरों का माहौल अमूमन प्रतिक्रिया रहित रहता है.

शायद इसकी एक वजह वहां पहुंचने वाला तबका भी है. अमूमन दिल्ली के किसी सिनेमाघर में एक फिल्म देखना पांच सौ-एक हजार रुपए का मसला होता है. जाहिर है इसकी वजह से एक नियत आर्थिक और सामाजिक हैसियत वाला व्यक्ति ही सिनेमाघरों में पहुंचता है जो अपने साथ गंभीरता और निजता का एक आडंबर भी ओढ़े रहता है.

ऐसे ही माहौल में बीते रविवार को पिंक फिल्म देखना हुआ. ऐसा लगा कि हम कुछ चीजें पीछे छोड़ आए थे जो अचानक से पलट कर सामने आ खड़ी हुई हैं. हीरो के डायलॉग पर सीटी मारना, ताली बजाना आदि. एक दशक से ज्यादा हो गए सो स्मृतियों के धरातल से यह परंपरा धूमिल हो गई थी. अचानक पिंक देखते हुए वह सबकुछ जैसे रीप्ले होने लगा. जीके-2 जैसे पॉश इलाके में सिनेमाहॉल के भीतर दम पे दम सीटी बज रही थी, तालियों का समवेत स्वर गूंज रहा था. लोगों की मुट्ठियां तनी हुई थी, हालंकि लोग हिंदी में 'मार साले को' की बजाय 'किल दैट बास्टर्ड' जैसे वाक्य बोल रहे थे. ज्यादातर लड़कियों का हुजूम था.

कहानी का सार यह है कि हर अभिजात्य के भीतर भी एक सामान्य इंसान छिपा रहता है, शहरों में गांव बचा रहता है, दिल्ली में यह 'लालडोरा' कहलाता है. मौका-दस्तूर पर यह परवाज़ भरने लगता है., हथेली-दूसरी हथेली से अनायास टकराने लगती है, मुंह से बरबस ही कुछ बोल फूट पड़ते हैं. यह पिंक की सफलता है.

First published: 21 September 2016, 7:13 IST
 
अतुल चौरसिया @beechbazar

एडिटर, कैच हिंदी, इससे पूर्व प्रतिष्ठित पत्रिका तहलका हिंदी के संपादक के तौर पर काम किया

पिछली कहानी
अगली कहानी