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न्याय की आस में एक बार फिर अन्याय की लाठी

श्रिया मोहन | Updated on: 20 January 2017, 3:04 IST
(कैच न्यूज़)

रोहित वेमुला की पहली पुण्यतिथि पर उनकी याद में हैदराबाद विश्वविद्यालय के कैंपस में श्रद्धांजलि सभा बुलाई गई थी. मगर रोहित की मां राधिका और भाई राजा को वहां तक नहीं पहुंचने दिया गया और श्रद्धांजलि देने से वंचित रह गए. 

हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय के शोध छात्र रोहित वेमुला ने पिछले साल कथित तौर पर जातिय उत्पीड़न के चलते हॉस्टल के कमरे में फांसी लगाकर खुदकुशी कर ली थी. रोहित एक दिल दहलाने वाला सुसाइड नोट छोड़ गए थे. 

रोहित की मां राधिका और भाई राजा वेमुला के लिए यह दिन सिर्फ उन्हें याद करने भर का ही दिन नहीं था, बल्कि यह भी था कि उन्हें अभी तक न्याय नहीं मिल सका है. दलित परिवार का होने के नाते उन्हें रोहित की मौत के लिए विश्वविद्यालय को जवाबदेह ठहराने और शैक्षणिक परिसरों में रोहित एक्ट को लागू कराने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है. 

रोहित एक्ट में ऐसे प्रावधान हैं जिनमें कानूनन जिससे पिछड़ी जातियों के छात्रों को शिक्षा व्यवस्था में बराबरी का आधार मिल सके और उन्हें जाति आधारित नृशसंता से संरक्षण मिल सके. 

ऐसे में जब 17 जनवरी आई तो उनकी एकमात्र इच्छा थी कि वे विश्वविद्यालय परिसर में जाकर रोहित स्तूप पर रोहित को श्रद्धांजलि दे सकें. मगर रोहित वेमुला की मौत के एक साल बाद भी न्याय मिलने को तो नकारा ही गया है, साथ ही राधिका और राजा को श्रद्धांजलि पुलिस का अपमान, दुर्व्यवहार भी झेलना पड़ा है. उन्हें हैदराबाद के थाने पर रोक कर भी रखा गया. 

जब दोनों लोग अपने बेटे और भाई को श्रद्धांजलि देने के लिए विश्वविद्यालय में प्रवेश कर रहे थे तो उन्हें पुलिस ने परिसर में जाने से इसलिए रोक दिया कि यह कोर्ट के आदेशों के खिलाफ है. 

प्रदर्शन

17 जनवरी को शाम 4 बजे लगभग 200 छात्र, जिनमें अम्बेडकर स्टूडेन्ट एसोसिएशन से जुड़े छात्रों के साथ अन्य छात्र भी थे, रोहित को श्रद्धांजलि देने के लिए एकत्रित हुए. उन्होंने उपकुलपति अप्पा राव के विरोध में नारे लगाए और तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर के पुतले फूंके. 

राजा वेमुला कहते हैं कि हमें छात्रों ने आमंत्रित किया था ताकि हम रोहित स्तूप पर उसे श्रद्धांजलि दे सकें. लेकिन जब हम वहां पहुंचे तो हमें स्तूप तक जाने की अनुमति नहीं दी गई. राजा ने कहा कि पहले तो पुलिस ने हमसे कहा कि थोड़ा इंतजार करें मगर शाम 5.30 तक यह साफ हो गया कि हमें अनुमति नहीं मिलने वाली है. पुलिस ने कहा कि अगर हम लोगों को अंदर जाने दिया जाता है तो यह कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन होगा.

पुलिस के इस निर्णय के विरोध में छात्र जोर-जोर से नारे लगाने लगे. राजा और रोहित की मां को पुलिस ने जबरन हिरासत में ले लिया गया. राजा कहते हैं कि उन्होंने हमारी गर्दन और कान पकड़ लिए. मैंने सुना कि हमें भद्दी-भद्दी गालियां (महिलाओं से जुड़ी हुई) दी जा रहीं हैं. जब मैं यह देखने के लिए पीछे मुड़ा कि गर्दन पकडऩे वाला कौन हैं, तो वे विश्वविद्यालय के सुरक्षा सुपवाइजर टी वी राव थे. जो खुद भी दलित हैं.

जैसे कि इतना ही पर्याप्त नहीं था. शाम 7 बजे तो हालात और बदतर हो गए. राजा और रोहित की मां समेत 15 अन्य लोगों को, जिनमें मित्र, रिश्तेदार, शुभचिन्तक, छात्र और पत्रकार आदि थे, पुलिस ने अपनी वैन में बैठा लिया और सभी को गचीबोवली स्टेडियम ले जाया गया. रात 9 बजे सड़कों पर चक्कर कटाते हुए थाने ले जाया गया. 

राजा कहते हैं कि हम तो अपने भाई को श्रद्धांजलि अर्पित करना चाहते थे. हमें रोक लिया गया. हमें बेहतर न्याय व्यवस्था की आस थी. इन सभी लोगों को रात 11.30 बजे सभी को थाने से छोड़ दिया गया. राजा कहते हैं कि हमारी आगे की कोई योजना नहीं हैं. हम यह देखेंगे कि हम क्या कर सकते हैं? दलित होने की वजह से राजा और राधिका का यह पूरा साल संताप और  शोक में बीता है, और कड़े अनुभवों के दौर से गुजरना पड़ा है कि इस हालात से कैसे निकला जाए.

लेकिन मंगलवार को उन्हें अपने बेटे और भाई को श्रद्धांजलि देने के मूल अधिकार से ही वंचित कर दिया गया. इसे तो नया अन्याय ही कहा जाना चाहिए.

First published: 20 January 2017, 3:04 IST
 
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