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कालेधन के बहाने कैशलेस: दबे पांव हुआ आर्थिक बदलाव

असीम श्रीवास्तव | Updated on: 20 December 2016, 8:23 IST
(नोहा सीलम/एएफ़पी)
QUICK PILL
  • नोटबंदी को मोदी और भाजपा ने देशहित से जोड़कर इसे कालेधन, भ्रष्टाचार और आतंकवाद के ख़िलाफ़ कार्रवाई के लिए उठाया गया कदम बताया है. 
  • मगर यह बहुत ही गुपचुप तरीके से अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के इशारे पर किया गया आर्थिक सुधार था. इसे समझने के लिए किसी को तत्कालीन ‘‘लाइसेंस राज’’ का साक्षी होना जरूरी नहीं है. 

25 साल पहले भी भारत में ‘आर्थिक सुधार’ हुए थे लेकिन उस पर किसी का इतना ध्यान नहीं गया. उस वक्त सरकार ने अपने भुगतान संकट से निपटने के बहाने बिना किसी बहस के कथित तौर पर लोकतांत्रिक समाज में फिट हो सकने वाले दीर्घ अवधि बदलाव किए. उदारीकरण (व्यावसायीकरण कहें तो ज्यादा उपयुक्त होगा) तो सबको याद ही होगा. यह क्या था? 

दरअसल यह बहुत ही गुपचुप तरीके से अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के इशारे पर किया गया आर्थिक सुधार था. इसे समझने के लिए किसी को तत्कालीन ‘‘लाइसेंस राज’’ का साक्षी होना जरूरी नहीं है. उदारीकरण के नाम पर इन बाहरी संस्थानों ने देश की मुख्य नीतियों की दिशा ही अगले दस सालों तक के लिए मोड़ दी. मगर इसने भारतीय अर्थव्यवस्था और समाज का पूरा स्वरूप ही स्थाई रूप से बदल कर रख दिया है. मौजूदा पारिस्थितिकी असंतुलन इसी उदारीकरण का नतीजा है.

बेरोजगारी बढ़ गई, पिछली पीढ़ी में असमानताएं बढ़ गई, करीब 4 लाख किसानों ने आत्महत्या कर ली. विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ) के साथ किए गए समझौतों के तहत अपनाई गई खुली आर्थिक कृषि नीति इसके लिए जिम्मेदार है.

आज भारत में 4,000 मल्टीनेशनल कम्पनियां फायदे में चल रही हैं. इन कम्पनियों को चाहे जो भी हासिल हुआ हो लेकिन 1991 में ‘चोर रास्ते’ से आए इन आर्थिक सुधारों ने इन कम्पनियों के लिए भारत में एक तरह से रेड कार्पेट बिछा दिया.

आर्थिक सुधार नंबर-2 वाया चोर रास्ते

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हाल ही किया गया नोटबंदी का फैसला भी इसी प्रकार चोर रास्ते से आए आर्थिक सुधार नम्बर 2 हैं. यह 1991 की ही तरह दबे पांव आया आर्थिक सुधार है. इसके तहत फिलहाल भारत में जो अर्थव्यवस्था के डिजिटाइजेशन की बात चल रही है, उसके वैश्विक वाणिज्यिक हितों की अनदेखी नहीं की जा सकती. इसके दूरगामी परिणाम इतने व्यापक होंगे कि इसे लागू करने वाले को भी उस व्यापकता का अंदाजा नहीं होगा.

दुनिया को चलाने वाली वैश्विक ताकतों को पता है कि वे अपने फायदे के लिए भारतीय नेताओं का इस्तेमाल किस तरह कर सकते हैं, जो अपनी वैश्विक छवि के प्रति कुछ ज्यादा ही चिंतित रहते हैं बजाय देश में अपनी लोकप्रियता के.

धीरे-धीरे लोगों को यह बात समझ में आ रही है कि मोदी ने कैशलैस की बात ऐसे देश में की है, जिसका सारा काम धंधा कैश पर ही टिका है. इसलिए यहां समझना होगा कि यह करने वाले मोदी नहीं है. मोदी से बड़ी कई ताकते हैं, जिन्होंने मोदी की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का अपने लिए इस्तेमाल किया. मोदी के ऑफिस, उनकी लोकप्रियता को देखते हुए उन्होंने कालेधन की समाप्ति की आड़ में बड़े नोटों को बंद करवा कर देश में कैश की ही किल्लत करवा दी.

  

उनका उद्देश्य? भारतीयों की डिजिटलाइजेशन के प्रति झिझक कम करना और उन्हें हर चीज का इलैक्ट्रॉनिक भुगतान करने के लिए तैयार करना है.

बोस्टन कन्सल्टिंग ग्रुप द्वारा की गई रिसर्च के अनुसार, डिजिटल पेमेंट इंडस्ट्री में अगले पांच सालों में एक जैकपॉट निकाला जाएगा, जिसकी कीमत 500 खरब अमेरिकी डॉलर है (यानी भारत की जीडीपी का एक चौथाई) लेकिन यह तभी होगा जब करोड़ों लोग कैश में लेन-देन बंद करेंगे.

अगर भारत की ऊपरी आधी आबादी भी इस मुहिम में जुड़ जाती है तो इस डिजिटल इंडस्ट्री का भविष्य काफी उज्ज्वल है. निचली आधी आबादी को अनदेखा किया जा सकता है जब तक कि वह राजनीतिक तौर पर बेचैन और मुखर न हो जाए.

जड़ में आखिर क्या?

आर्थिक अतीत के गंभीर परिणाम हमारे सामने हैं. उसके बावजूद मोदी इन वैश्विक डिजिटल फाइनेंस कम्पनियों के झांसे में आ गए. नोटबंदी के नाम पर सारे बैंक खाली हो गए (बैंकों में जमा हुआ धन पुराने नोटों के रूप में है और नए नोट बैंकों में पर्याप्त मात्रा में है नहीं); और नतीजा यह है कि लोग डिजिटल भुगतान करने को मजबूर हैं.

भारतीय बैंकों का रिकैपेटलाइजेशन अस्थाई और संयोग मात्र ही है. बैंक तो अब बर्बादी की कगार पर ही खड़े हैं, बैंकिंग की डिजिटल गड़बड़ियों से इनकार नहीं किया जा सकता जैसे पूर्व में मीडिया और रिटेल में देखा जा चुका है.

अब हर जगह डिजिटल भुगतान का होना पारम्परिक बैंकिंग के लिए खतरा साबित हो सकता है (मैक किन्सी रिपोर्ट से यह जाहिर होता है) एक बार बाजार पर डिजिटल पेमेंट बैंकों का आधिपत्य जमा नहीं कि अगले दशक तक हर मोबाइल फोन तो आम आदमी का एटीएम बन जाएगा और पता भी नहीं लगेगा कि एयरटेल वहां पहुंच चुका है, जहां आईसीआईसीआई नहीं पहुंच सकता.

फ़ायदा किसे ?

इस सारी डिजिटल कवायद का फायदा उन्हीं को मिलेगा जो पहले से ही संपन्न हैं. 8 नवम्बर को नोटबंदी की घोषणा के तुरंत बाद एक बहुत ही अहम बिजनेस इवेंट हुई. रिलायंस इंडस्ट्रीज और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के बीच अपनी तरह का पहला पीपीपी मोड का वेंचर जियो पेमेंट बैंक. इसका सीधा सा उद्देश्य रिलायंस जियो मोबाइल फोन के उपभोक्ता और एसबीआई के बड़े ग्राहक वर्ग को लक्ष्य बनाना है, और इस प्रकार यह भविष्य में देश की सबसे बड़ी कम्पनी बन सकती है. रिलायंस पहले ही 4 जी बिजनेस में 20 खरब डॉलर से ज्यादा क निवेश कर चुका है. जाहिर है इतना निवेश करने के बाद कम्पनी घाटा तो नहीं उठाएगी.

जियो पेमेंट बैंक भी देश के दूसरे डिजिटल पेमेंट बैंक की ही तरह है, जैसे एयरटेल पेमेंट बैंक, पेटीएम, इंडिया पोस्ट, एनएसडीएल पेमेंट बैंक, आदित्य बिड़ला आइडिया पेमेंट बैंक, फिनो पेटेक और वोडाफोन एम पैसा. इन कम्पनियों के प्रमोटर भले ही भारतीय हों लेकिन इनका जाल विश्व भर में फैला है.

हाल ही आईटी खरबपति और आधार के एक जनक नंदन नीलकेणि जो आजकल मोदी के सलाहकार भी हैं, वे लेकर आए हैं-यूपीआई (यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस). यह भी डिजिटल भुगतान का ही एक ऐप है, जिसे आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने लॉंच किया था.

यूपीआई के जरिये पैसा ट्रांसफर करना वाकई बहुत आसान है. नीलकेणि का दावा है कि इससे बैंकिंग प्रणाली कम, ऊंची कीमत, ऊंची लागत व फीस से बदल कर अधिक, कम कीमत में, कम लागत व कम फीस वाली हो सकती है. कार्पोरेट जगत और सरकार दोनों के ही बीच एक समानता है जो यह मानते हैं कि यही सही समाधान है. हालांकि यह कितना फायदेमंद होगा; यह तो वक्त ही बताएगा.

डिजिटल भारत की मुहिम

मोदी हमेशा से ही डिजिटल के प्रति आकर्षित और जागरूक रहे हैं. 25 करोड़ लोगों के लिए जन-धन खाते खोलने की योजना हो या यूपीए सरकार द्वारा लाए गए आधार कार्ड को वित्तीय लेन-देन और सब्सिडी खातों से जोड़ना; मोदी ने सदैव तत्परता ही दिखाई है और अब मोदी सरकार मोबाइल फोन के जरिए पूरे देश को कैशलैस बनाने पर जोर दे रही है. 

देखा जाए तो जन-धन और आधार से जुड़े मोबाइल पेमेंट(जेम) को गांवों को डिजिटल बनाने में ज्यादा देर नहीं लगेगी, जहां आसन ईएमआई पर मोबाइल फोन उपलब्ध हैं. लोगों ने जैसे मोबाइल आते ही लैंड लाइन फोनों से किनारा कर लिया वैसे ही वह दिन दूर नहीं जब देश भर में बैंकों को शाखाएं खोलने की जरूरत नहीं होगी. मेबाइल फोन पर ही सारी बैंकिंग हो जाएगी.

कोई अचरज नहीं कि भारत का नीति आयोग जल्द ही देश भर में डिजिटल भुगतान की जड़ें फैला देगा, जहां अब तक लोग सिर्फ कैश पर ही निर्भर रहते आए हैं.

प्रधानमंत्री अपने सार्वजनिक भाषणों में चाहे जो कहें, लेकिन सरकार की प्राथमिकताएं अब साफ नजर आ रही हैं. अगर इससे गरीबों को लाभ होता है तो वे भी खुश होंगे. कैशलेस (फिलहाल इसका मतलब लैस यानी कम कैश हो रहा है); शुरूआत से ही सरकार का लक्ष्य था, जिसका पहला चरण नोटबंदी के रूप में सामने आया.

अर्थव्यवस्था का पूरा डिजिटलीकरण करना भी अहम लक्ष्य है. इस प्र्रिकया में 10-20 साल और लग सकते हैं लेकिन विश्व की वित्तीय एजेंसियों ने भारत में इसकी शुरूआत कर ही दी है.‘काले धन’(या आतंकवाद की फंडिंग) के खात्मे के बहाने सरकार ने डिजिटलीकरण पर निशाना साधा है, जो उसका असली ध्येय था. कैशलेस के चलते एक दिन प्लास्टिक भी गायब हो जाएगा. मोबाइल डेबिट कार्ड का भी काम करेगा और अगर सब कुछ सकारात्मक रहा तो भविष्य में क्रेडिट कार्ड का काम भी मोबाइल ही करेगा. 

विश्व बैंक की एक प्रेस विज्ञप्ति में बिल एंड मेलिन्डा गेट्स फाउंडेशन के सीईओ के हवाले से कहा गया है, ‘सरकारों को आगे बढ़ कर डिजिटल वित्तीय विकास को आगे बढ़ाना होगा...हम चाहते हैं सरकारें ऐसी व्यवस्थाएं स्थापित करें कि करोड़ों लोग कैश लैस होकर नई अत्याधुनिक अर्थव्यवस्था में भागीदार बन सकें. ’(बिल गेट्स ने स्वयं नोटबंदी का समर्थन किया है.) और सरकारें यही कर रही हैं.

क्या यह सब कालेधन के लिए हुआ?

अगर आरबीआई के पूर्व गवर्नर से लेकर आम आदमी तक की बात की जताए तो किसी को यकीन नहीं था कि नोटबंदी का असर काले धन के खत्मे के रूप में सामने आएगा, भले ही वह थोड़े समय के लिए ही हो. सब जानते हैं कि प्रधानमंत्री ने पचास दिन की अवधि का आधा ही वक्त गुजरने पर कहा-बंद हुए नोट अब अधिकांष मात्रा में बैंको में वापस आ गए हैं; यह अच्छा संकेत है. 

अगर कालेधन का खात्मा ही नोटबंदी की वजह था, जैसा कि सरकार बार-बार कह रही है तो यह गलत है. थोड़े दिन में सब कुछ सामने आ जाएगा. यह कैशलैस अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ते कदम हैं, जिसका एक प्रभाव काला धन रखने वालों पर निषाना साधने के रूप में भी सामने आया (नए नोट आते ही ये जमाखोर फिर से काला धन इकठ्ठा कर लेंगे!)

माना जा रहा है कि डिजिटलनीकरण के बाद लोगों का सारा लेन-देन पारदर्शी हो जाएगा. एक अदृश्य शक्ति के पास सारे लेन-देन का रिकॉर्ड रहेगा. ऐसी अर्थव्यवस्था में लोग स्वाभाविक रूप से ज्यादा ईमानदार रहेंगे. कहा तो यह भी जा सकता है कि क्या गारंटी है कि इस डिजिटलाइजेशन में लोग ईमानदार रहेंगे. डिजिटलीकरण के इस जमाने में लोगों को अपना पैसा गंवाते या खोते भी देर नहीं लगेगी क्योंकि साइबर चोरी आज आम बात है.

विदेशी खातों को डील कर रहे बैंकिंग नियामकों से पूछें तो वे यही कहेंगे कि दुनिया भर में साइबर अपराधी कब सरकार की आखों में धूल झोंक दे, कहा नहीं जा सकता.

बदलते लक्ष्य

दरअसल प्रधानमंत्री से यह सवाल करना लाजमी है कि वे अब तक विदेषों में जमा कालाध्न वापस क्यों नहीं ला सके, जहां देश का अधिकतर पैसा जाता है.  नवम्बर से लेकर अब तक के मोदी के भाषणो पर गौर करें तो अचरज नहीं कि अब प्रधानमंत्री ने अपने भाषणों से काला धन और जाली नोट जैसे शब्द हटा दिए हैं. अब वे कैशलैस के बारे में ही अधिक बात करते हैं. अब सारा फोकस और लक्ष्य कैशलैस अर्थव्यवस्था पर आ गया है.

यह सरकार नोटबंदी जैसा कदम उठाकर भारतीय अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ने का जघन्य अपराध करने के बावजूद सिर्फ इसलिए टिकी हुई हैकि सरकार का यह दावा है कि वह देश से काले धन का सफाया करके रहेगी. अगर जनता को यह कहा जाता कि नोटबंदी का उद्देश्य कैशलैस अर्थव्यवस्था है और काला धन हटाना उसके बाद आता है तो निश्चित रूप से तस्वीर कुछ और होती. सरकार की यह नीति उसी वक्त नकार दी जाती.

पूरी तस्वीर साफ होने में अभी वक्त लगेगा, तब तक जनता इसे देश भक्ति के चश्मे से ही देखती रहेगी. आर्थिक सुधार ऐसे ही दबे पनांव लाए जाते हैं. 1991 की ही तरह एक बार फिर अर्थव्यवस्था नीतियों का शिकार बनेगी और डिजिटल चिंताएं बहस का मुद्दा बना रहेगा.

(लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. संस्था का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है)

First published: 20 December 2016, 8:23 IST
 
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