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हिंदी अख़बारः कांग्रेस, राहुल गांधी और सलमान खान के नाम रहा हफ्ता

जीतेन्द्र कुमार | Updated on: 13 December 2015, 9:40 IST
QUICK PILL
  • बीते सप्ताह के दरम्यान प्रमुख हिंदी अखबारों में छाई रही खबरों और गतिविधियों की साप्ताहिक समीक्षा का कॉलम.
  • इस हफ्ते मीडिया में भारत-पाक वार्ता, नेशनल हेरल्ड विवाद और हिट एंड रन मामले में बरी हुए सलमान खान सुर्खियों में रहे.
 

इस हफ्ते बाबासाहब आंबेडकर जयंती के अवसर पर कुछ अखबारों ने उन पर सकारात्मक टिप्पणी की है जबकि दैनिक जागरण ने कांग्रेस और राहुल गांधी पर हमला जारी रखा है.

जागरण ने रविवार के अखबार में ‘श्रम सुधारों पर अड़ंगा’ बैनर से खबर लगाई, जिसकी सबहेडिंग थी- मजदूरों के नाम पर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने पीएम मोदी को घेरा. अखबार ने ‘विचित्र राजनीति’ नाम से संपादकीय में राहुल गांधी को उद्धृत करते हुए कहा है कि प्रधानमंत्री मजदूरों को बेइमान कामचोर समझते हैं. अखबार ने उन्हें नसीहत दी है कि राष्ट्रीय हितों की बलि चढ़ाने का काम नहीं करना चाहिए.

बाबरी मस्जिद की जगह पंहुचने पर सीआरपीएफ का जवान निर्देश देता है कि- यही है राम लला, प्रणाम करिए

छह तारीख को दैनिक भास्कर ने रथयात्रा के 25 साल बाद वर्तमान अयोध्या पर रिपोर्ट छापी है. रिपोर्ट में उपमिता वाजपेयी बताती हैं कि बाबरी मस्जिद की जगह पंहुचने पर सीआरपीएफ का जवान निर्देश देता है कि- यही है राम लला, प्रणाम करिए. सीआरपीएफ का यह अंदाज चौंकाता नहीं बस यह बताने के लिए काफी है कि अगर वहां कोई अनहोनी होगी तो कानून-व्यवस्था की रक्षा में तैनात सुरक्षाकर्मी कितना निष्पक्ष साबित होंगे.

दैनिक हिन्दुस्तान ने भी बाबरी मस्जिद के तोड़े जाने की बरसी पर एक विशेष रिपोर्ट तैयार की है जिसका शीर्षक है- अब कोई नहीं याद करता वो मंजर. अमर उजाला भी ‘अतीत को भूलना चाहता है अयोध्या’ शीर्षक से अखिलेश वाजपेयी की रिपोर्ट लिखी है. हिन्दी अखबारों में इतनी तैयारी चौंकाती जरूर है लेकिन अच्छा भी लगता है.


सोमवार को लगभग सभी हिंदी के प्रमुख अखबारों ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर के असहिष्णुता न होने वाले बयान को प्रमुखता से छापा है. दैनिक जागरण ने उनके बयान को बॉक्स बनाकर लीड स्टोरी के रूप में छापा है और कहा है कि देश में कहीं भीं असहिष्णुता नहीं है.

जागरण ने इसी विषय पर बेजा ‘बहस का पटाक्षेप’ नाम से संपादकीय भी लिखा है. संपादकीय में अखबार इस मसले को उठाने वालों को नसीहत देते हुए कहता है कि अब तो इस मुद्दे को हवा देना बंद कर दीजिए क्योंकि केंद्र सरकार ने ऐसा कुछ किया ही नहीं है जिसके आधार पर कहा जा सके कि वह इसके लिए जिम्मेदार है. अखबार तो यहां तक कहता है कि इस मसले को जानबूझकर उठाया गया जिसके कारण देश की छवि को नुकसान पहुंचा है. इसलिए इसे उठानेवालों को अपने इस कृत्य के लिए क्षमा मांगनी चाहिए.

मंगलवार को सभी अखबारों ने सोनिया-राहुल को नेशनल हेरल्ड में समन किए जाने की खबर को प्रमुखता से पहले पेज पर छापा है

जागरण के मुताबिक हाल में घटित घटनाएं तो पहले भी होती रही हैं. लेकिन खास किस्म के ध्रुवीकरण को तो सेक्युलरिज्म का नाम दे दिया जाता है जबकि उसके जवाब में होनेवाली गोलबंदी को सांप्रदायिकता का नाम दे दिया जाता है.

दुखद यह है कि अखबार की यह चिंता कतई नहीं है कि जो हुआ था और जो हो रहा है वो गलत है, चूंकि वे 'भाजपावंदन' में लगे हैं इसलिए इस मसले को उठाने वाले ही गलत हुए! हो सकता है कि अखबार के मालिक की निजी प्रतिबद्धता किसी राजनीतिक दल के प्रति हो लेकिन जिम्मेवारी तो बनती ही है कि अखबार निष्पक्ष जैसा दिखे. 

मंगलवार को सभी अखबारों ने सोनिया-राहुल को नेशनल हेरल्ड में समन किए जाने की खबर को प्रमुखता से पहले पेज पर छापा है. लेकिन दैनिक भास्कर ने एम्स के पूर्व सतर्कता अधिकारी संजीव चतुर्वेदी द्वारा मैग्सेसे पुरस्कार की 20 लाख रुपए की राशि प्रधानमंत्री राहत कोष में दिए जाने की सूचना को पहले पेज पर छापा है. 

भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत पर जागरण ने ‘पाकिस्तान से संवाद’ नाम से लिखे संपादकीय में कहा है कि यह एक बेहतर कदम है जिसका स्वागत होना चाहिए. नवभारत टाइम्स ने भी ‘संवाद का सिलसिला’ नाम से संपादकीय लिखकर सरकार के कदम का स्वागत किया है. जनसत्ता ने ‘वार्ता की राह’ शीर्षक से संतुलित संपादकीय लिखा है.

अमर उजाला ने ‘बैंकाॅक में पिघली बर्फ’ शीर्षक से सरकार का यह कहते हुए स्वागत किया है कि पाकिस्तान की कथनी-करनी में चाहे जितना भी फर्क हो, बात तो बातचीत से ही बनेगी. अखबार ने अपने संपादकीय पेज पर एक ग्राफिक देकर राज्यसभा के हवाले से एक चौंकाने वाले तथ्य से रूबरू कराया है कि देश के निचली अदालतों में 23 फीसदी जजों की कमी है लेकिन सबसे ज्यादा कमी गुजरात में है.

अखबार ने कड़े शब्दों में कहा है कि यह महज संयोग नहीं है कि सोनिया गांधी ने अपने को नेहरू से नहीं इंदिरा गांधी से जोड़ा

मंगलवार को ही जनसत्ता ने ‘मुसीबतजदा लोगों की जान बचाते ये सुपर हीरो’ नाम से एक एंकर स्टोरी छापी है. यह खबर पीटीआई/भाषा की है जिसमें तो पत्रकारिता का 'नायाब' नमूना पेश किया गया है. इसमें एक तस्वीर भी लगाई गई है जिसमें कहा गया है कि ये अमरीकी रक्षा कंपनी लॉकहीड मार्टिन का सी-130 है जो चेन्नई की बाढ़ की तबाही के राहत और बचाव काम में लगी हुई है. इसमें कौन चालक है, कैसे चलती है, कैसे ऑपरेशन संचालित होते हैं, कितनों को कैसे राहत पहुंचाया- इसकी कतई जानकारी नहीं दी गई है.

बुधवार को ‘नेशनल हेरल्ड और कांग्रेस’ नाम से लिखे संपादकीय में अमर उजाला ने कांग्रेस नेतृत्व पर चुटकी लेते हुए लिखा है कि नेहरू जी द्वारा शुरू किए गए अखबार में नेहरू के आत्ममंथन, आदर्श लोकतंत्र के प्रति उनकी चिंता और अमेरिकी साम्राज्यवाद पर उनका आलोचनात्मक रुख दिखता था. जो नेहरू अपनी ही सरकार की आलोचना में नेशनल हेरल्ड में चिठ्ठी लिखकर नैतिक साहस दिखा सकते थे उनके उत्तराधिकारी आज खुद पर लगे आरोप का जवाब देने से हिचकिचा रहे हैं. 

अखबार ने कड़े शब्दों में कहा है कि ये महज संयोग नहीं है कि सोनिया गांधी ने अपने को नेहरू से नहीं इंदिरा गांधी से जोड़ा (मैं किसी से डरनेवाली नहीं हूं, इंदिरा गांधी की बहू हूं).


अमर उजाला ने संपादकीय पेज पर ग्राफिक देकर बताया गया है कि देश की आधी आबादी भूमिहीन है. सबसे ज्यादा 79.5 फीसदी भूमिहीन मिजोरम में है जबकि 34 वर्षों तक सीपीएम के सत्ता में रहने के बावजूद पश्चिम बंगाल में लगभग 70 फीसदी लोग भूमिहीन हैं. कुल मिलाकर इन राज्यों के अलावा मेघालय, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, केरल, मणिपुर, त्रिपुरा, बिहार और पंजाब के 64 फीसदी से अधिक लोगों के पास जमीन का एक टुकड़ा नहीं है. 

दैनिक जागरण ने सीएजी के रिपोर्ट का हवाला देते हुए लिखा है कि धान की खरीद में हजारों करोड़ रुपए का घोटाला हुआ है. इसकी तुलना चारा घोटाले से करते हुए बताया गया है कि कैसे धान की ढ़ुलाई मोटर साइकिल, ऑटो रिक्शा, टैक्सी और कार से की गई है.

अमर उजाला ने संपादकीय पेज पर ग्राफिक देकर बताया गया है कि किस तरह देश की आधी आबादी भूमिहीन है

गुरुवार को ‘स्वामित्व और सियासत’ नाम से जनसत्ता ने लिखे अपने संपादकीय में कहा है कि कांग्रेस को अगर सचमुच कानून पर भरोसा है, लोकतांत्रिक मूल्यों पर यकीन है तो संसद में उत्पन्न किए जा रहे गतिरोध को उचित नहीं ठहराया जा सकता है.

शुक्रवार को सभी अखबारों ने सलमान को मुंबई हाई कोर्ट द्वारा बरी किए जाने को प्रथम पेज पर स्थान दिया है, जबकि जनसत्ता ने इसे लीड बनाया है. नवभारत टाइम्स ने अपने संपादकीय में कहा है कि इस फैसले में मीन-मेख निकालने का कोई मतलब नहीं है फिर भी यह सवाल अपनी जगह कायम है कि इससे समाज के विभिन्न तबके पर क्या असर पड़ेगा. लेकिन हिन्दुस्तान ने ‘फैसले के मायने’ शीर्षक से एक बेचारगी भरा संपादकीय लिखा है जिसका लब्बोलबाब यह है कि जब पूरे व्यवस्था में ही खोट है तो इस फैसले को अकेले देखने का क्या मतलब है.


शनिवार को दैनिक भास्कर के अलावा हिन्दुस्तान और दैनिक जागरण ने भी एनजीटी के फैसले को लीड बनाया है बताया है कि दिल्ली में डीजल के नए वाहनों रजिस्ट्रेशन नहीं होगा. लेकिन दैनिक जागरण ने संसद में चल रहे गतिरोध पर ‘बर्बाद होता एक और सत्र’ शीर्षक से संपादकीय लिखकर कांग्रेस की कटु आलोचना की है. हालांकि अखबार मानता है कि संसद चलाने की जवाबदेही सत्ता पक्ष की होती है.

First published: 13 December 2015, 9:40 IST
 
जीतेन्द्र कुमार

Senior journalist and social activist

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