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जब आखिरी बादशाह ने खायी रोटी-चटनी

राणा सफ़ी | Updated on: 4 November 2015, 12:43 IST
QUICK PILL
  • मुगल\r\nसाम्राज्य के पतन के आखिरी\r\nदिन बहादुर शाह जफर ने अपनी\r\nभूख मिटाने के लिए निजामुद्दीन\r\nदरगाह के सज्जादा नशीं से\r\nमांगकर खाना खाया.
  • ख्वाजा\r\nहसन निजामी ने 1929 के\r\nदशक में लिखी किताब टीयर्स\r\nऑफ द बेगम्स में अपनी मां से\r\nसुनी कहानियों और घटना के\r\nचश्मदीद गवाहों की बातें\r\nलिखीं.

भारत पर तीन सौ साल से ज्यादा वक्त तक हुकूमत करने वाली मुगल सल्तनत को खत्म हुए करीब 158 साल हो गए हैं. जिस मुगल साम्राज्य की नींव बाबर ने 16वीं सदी में रखी उसका आखिरी पत्थर बहादुुर शाह जफर के रूप में 1857 में गिरा.


20 सितंबर, 1857 को ब्रितानी सेनाओं ने भारतीय विद्रोहियों को निर्णायक रूप से हराकर दिल्ली पर दोबारा नियंत्रण कर लिया था.

विद्रोहियों ने मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को अपना नेता चुना था.


हिंदुस्तानियों की मिली हार के बाद जफर ने अपना किला छोड़कर उस समय दिल्ली शहर के बाहर स्थिति हुमायूं के मकबरे में पनाह ली थी. हुमायूं का मकबरा हजरत निजामुद्दीन औलिया की सराय के पास ही स्थित था. बादशाह को इस बात का अंदाजा नहीं था कि अगले ही दिन उन्हें अंग्रेजों के सामने आत्मसमर्पण करना होगा और इसके साथ ही मुगल साम्राज्य का अंत हो जाएगा.


इन दो दिनों की घटनाओं को तमाम इतिहासकारों ने अलग-अलग तरीके से लिखा है लेकिन इसका सबसे सजीव ब्योरा ख्वाजा हसन निजामी की किताब बेगमात के आंसू (टीयर्स ऑफ द बेगम्स) में मिलता है. उन्होंने ये किताब 1920 के दशक की शुरुआत में लिखी थी.

उन्होंने इसके लिए उन्होंने अपनी मां से सुनी कहानियों और 1857 में हुई घटनाओं के चश्मदीद गवाहों के बयानों की मदद ली थी. जिस समय बहादुर शाह जफर ने अंग्रेजों के सामने समर्पण किया उस समय निजामी के नाना ख्वाजा शाह गुलाम हसन हजरत निजामुद्दीन दरगाह के सज्जादनशीं (व्यवस्थापक) थे.


अंत की शुरुआत


बहादुर शाह जफर किला--मोहल्ला (लाल किले को तब इसी नाम से जाना जाता था) छोड़ कर सीधे हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पहुंचे. चश्मदीदों के मुताबिक तब बादशाह बहुत हताश और टूटे हुए दिख रहे थे.


वे अकेले ही दरगाह पहुंचे थे. उनके साथ केवल उनकी पालकी उठाने वाले सेवक और कुछ ख्वाजासरा (महल में रहने वाले किन्नर) थे. उनका परिवार पहले ही हुमायूं के मकबरे में पहुंच चुका था. उन्हें वहां बाद में पहुंचना था.


जब ख्वाजा शाह गुलाम हसन को पता चला कि बादशाह दरगाह पहुंच चुके हैं वो तुरंत वहां पहुंचे. वहां पहुंचकर उन्होंने पाया कि थके-हारे बादशाह मजार की बगल में बैठे हैं.


बहादुर शाह जफर ने ख्वाजा से कहा कि वो बहुत पहले से ही अपने भाग्य से समझौता कर चुके हैं. बादशाह खुद भी सूफियाना मिजाज के थे और फकीरों-संतों पर उन्हें काफी भरोसा था.

लाल किले में विद्रोही सैनिकों के पहुंचने से पहले ही एक प्रसिद्ध सूफी फकीर ने उन्हें बता दिया था मुगल साम्राज्य का अंत करीब है.

बहादुर शाह और उनके पहले के मुगल बादशाह अपने पूर्वजों के कर्मों का फल भोग रहे थे. बहादुर शाह ने ख्वाजा को बताया कि वो नहीं चाहते थे कि किले में खून-खराबा हो इसीलिए उन्होंने किला छोड़ दिया.


उन्होंने ख्वाजा को बताया, "मुझे कुछ समय पहले ही लग गया था कि मैं गौरवशाली तैमूर वंश का आखिरी बादशाह हूं. अब कोई और शासक होगा. उसका कानून चलेगा. मुझे किसी बात का पछतावा नहीं है, आखिर हमने भी किसी और को हटाकर गद्दी पायी थी."


बादशाह ने उनसे आगे बताया कि जब तैमूर ने कॉन्सटैनटिनोपोल (तुर्की का एक ऐतिहासिक शहर) पर हमला किया, तब उन्होंने वहाँ के पुराने सुल्तान बा यजीद यलदरम से पैगंबर मोहम्मद के 'दाढ़ी का बाल' हासिल किया था. जो अब तक मुगल शासकों के पास सुरक्षित था लेकिन "अब आसमान के नीचे या जमीन के ऊपर मेरे लिए कोई जगह नहीं बची है इसलिए मैं इस अमानत को आपके हवाले कर रहा हूं ताकि यह सुरक्षित रहें.”


ख्वाजा शाह गुलाम हसन ने जफर से वह बाल ले लिए और उन्हें दरगाह की तिजोरी में रख दिया. सम्राट ने उनसे कहा, "मैंने एक दिन से कुछ भी नहीं खाया है. अगर तुम्हारे घर में खाने के लिए कुछ है तो कृपया ले आओ."


ख्वाजा हसन ने तुरंत बादशाह से कहा कि वो उनके साथ उनके घर चलें. लेकिन बादशाह ने इससे इनकार कर दिया. बादशाह ने उनसे कहा कि वो नहीं चाहते उनके जैसे नाचीज आदमी के लिए तुम्हारी और तुम्हारे परिवार की जान खतरे में पड़े. वो यहां केवल पैगम्बर मोहम्मद के पवित्र अवशेष सौंपने और आशीर्वाद लेने के लिए आए थे. वो बस थोडा सा खाना खाकर लौट जाएंगे.


ख्वाजा के घर में उस वक्त बेसन की कुछ रोटियां और सिरके की चटनी थी. उसे खाकर बादशाह हुमायूं के मकबरे में चले गए. उसके बाद जो कुछ हुआ वह इतिहास में दर्ज है.


कहानी का अंत


अंग्रेज मेजर विलियम हडसन ने जिस तरह बादशाह को गिरफ्तार किया और जिस तरह उनपर मुकदमा चला उसके बारे में काफी कुछ कहा-सुना जा चुका है. हालांकि ये कम लोग ही जानते हैं कि दिल्ली में हिन्दुस्तानी सेना के सेनापति जनरल बख्त खान ने लाल किला छोड़ने से पहले बादशाह को अपने साथ चलने के लिए कहा था.

बख्त खान ने बादशाह से कहा था, “हालांकि ब्रितानियों ने शहर पर कब्जा कर लिया है लेकिन हिन्दुस्तानी सेना के लिए ये उतना बड़ा सदमा नहीं है क्योंकि इस वक्त पूरा हिन्दुस्तान अंग्रेजों के खिलाफ उठ खड़ा हुआ है और हर कोई रहनुमायी के लिए आपकी तरफ देख रहा है. आप मेरे साथ पहाड़ों की तरफ चलें, वहां से लड़ाई जारी रखी जा सकती है. वहां अंग्रेजों के लिए हमारा मुकाबला करना संभव नहीं होगा.”

जफर को बख्त खान की बात सही लगी. उन्होंने खान को अगले दिन हुमायूं के मकबरे पर मिलने के लिए कहा. बख्त खान के किला छोड़ते ही एक तरह से बहादुर शाह जफर का अंत तय हो गया था.

अंग्रेजों के मुखबिर मिर्जा इलाही बख्स और मुंशी राजब अली ने उन दोनों की बातचीत की ये खबर अंग्रेजों तक पहुंचा दी और वादा किया कि वो बादशाह को दिल्ली में रुकने के लिए मनाने की कोशिश करेंगे.


मिर्जा इलाही बख्श दरअसल बहादुर शाह के जफर के ससुर थे और उनसे नाराज थे. इलाही बख्स को लगता था कि बादशाह अपनी सबसे छोटी बीवी जीनतमहल और उनके बच्चों को ज्यादा चाहते हैं. इसके करीब एक साल पहले इलाही बख्स के नाती और बादशाह के उत्तराधिकारी को जहर देकर मार दिया गया था. उन्हें शक था ये काम जीनतमहल ने कराया था.


अपने ख्वाजासराओं की चेतावनी के बावजूद भी बादशाह ने उन दोनों की बात पर भरोसा कर लिया और दिल्ली में रुक गए. मेजर हडसन हुमायूं के मकबरे के पश्चिमी गेट पर बाहर ही खड़ा रहा. बख्स और राजब अली बादशाह के पास भीतर मकबरे में पहुंचे. वो बादशाह को यह यकीन दिलाने में सफल रहे कि उन्हें बख्त खान के साथ पहाड़ों की तरफ जाने की बजाय मेजर हडसन के साथ लाल किले में वापस चले जाना चााहिए.


नतीजतन, बादशाह को हडसन ने गिरफ्तार कर लिया, उनपर मुकदमा चलाया गया और सजा के तौर पर उन्हें रंगून निर्वासित कर दिया गया. इसके बाद जो भी बचा वो तो इतिहास है ही.


जफर अदब पसंद करते थे और खुद भी अच्छे शायर थे. उन्होंने खुद अपने हालात को कुछ यूं बयां किया था.


लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में

किस की बनी है आलम--नापायेदार में


कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें

इतनी जगह कहां है दिल--दागदार में


उम्र--दराज मांग कर लाये थे चार दिन

दो आरजू में कट गये दो इन्तजार में


कितना है बदनसीब "ज़फ़र" दफ़्न के लिये

दो गज जमीन भी न मिली कू--यार में

First published: 4 November 2015, 12:43 IST
 
राणा सफ़ी @iamrana

Rana Safvi is an author and historian with a passion for culture and heritage. She is the founder and moderator of the popular #shair platform on Twitter. Her book Where Stones Speak: Historical Trails in Mehrauli, The first city of Delhi has just been published.

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