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आज के आम पाकिस्तानी को महात्मा गांधी के बारे में क्या पता है?

शाहनवाज़ मलिक | Updated on: 16 August 2016, 8:41 IST

30 जनवरी 1948 की शाम महात्मा गांधी की मौत पाकिस्तान के लिए भी एक बड़ी दुर्घटना थी. आवाम रोई थी. देशभर में मातम छा गया था और इस शोक में पाकिस्तानी झंडा झुका दिया गया था. तब गांधी की शख्सियत की तारीफ़ करते हुए उर्दू और अंग्रेज़ी के अख़बारों में तमाम लेख लिखे गए. साफ लफ्ज़ों में लिखा था कि मुसलमानों की एक हमदर्द और हिमायती आवाज़ चुप करा दी गई.

मगर यह वाक़या 68 बरस पहले का है. पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार वुसतुल्लाह ख़ान के मुताबिक़, ‘अब जब मैं किसी से कहता हूं कि महात्मा गांधी की हत्या पर पाकिस्तान का परचम का झुक गया था तो लोग कहते हैं कि तुम सरासर झूठ बोल रहे हो.’

लोग यह भी नहीं मानते कि गांधी की मौत पर जिन्ना ने अफ़सोस ज़ाहिर करते हुए एक दल भारत रवाना किया था. तब जिन्ना ने अपने शोक संदेश में कहा था, ‘गांधी वाज़ अ ग्रेट हिंदू.’

लेकिन नई पीढ़ी के लिए इस ‘हिंदू’ शब्द के मायने कुछ और हैं. उसका मानना है कि हिन्दुस्तान हिंदुओं का मुल्क़ है. सारे हिंदू एक जैसे होते हैं मतलब कि मुसलमानों से नफ़रत करते हैं और गांधी भी थे तो एक हिंदू ही.

पाकिस्तान की नई पीढ़ी के लिए इस ‘हिंदू’ शब्द के मायने कुछ और हैं. उसका मानना है कि हिन्दुस्तान हिंदुओं का मुल्क है

वुसतुल्लाह ख़ान कहते हैं कि जब यहां के किसी नौजवान को पता चलता है कि हिन्दुस्तान में मुसलमान भी रहते हैं तो वह चौंककर पूछता है कि हिंदुओं के मुल्क़ में मुसलमानों का क्या काम?

पाकिस्तान की बहुत बड़ी आबादी यही मानती है कि जैसे हिन्दुस्तान हिंदुओं का देश है, ठीक वैसे ही उनका मुल्क़ मुसलमानों के लिए है. उनके ज़ेहन में यह समझ बाक़ायदा बिठाई गई है. इतिहास की उन सभी किताबों से ऐसी शख्सियतों को मिटाया गया है जिन्होंने पाकिस्तान बनाए जाने की मुख़ालिफ़त की थी. इस विरोध के पीछे विचार और तर्क जो भी रहे हों, यह जानने में नई पीढ़ी की दिलचस्पी नहीं है.

जब बंटवारा हुआ तो पाकिस्तान में हिंदू और ग़ैर मुस्लिम नाम वाले कई ऐतिहासिक स्थल-कस्बे हुआ करते थे लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता उन्हें मिटा दिया गया. कराची में बाग़-ए- महात्मा गांधी का नाम बदलकर कराची जुलॉजिकल गार्डन कर दिया गया. उनका एक मुजस्समा भी हुआ करता था.

वुसतुल्लाह कहते हैं कि 1982 में जब रिचर्ड एटनबरो ने गांधी की ज़िंदगी पर फिल्म बनाई तो पाकिस्तानी हुकूमत ने पलटवार करते हुए क़ायद-ए- आज़म की शान में जिन्ना की बायोपिक बनवा डाली.

मकसद सिर्फ इतना था कि हमारे क़ायद को हल्के में ना लिया जाए. ख़ान अब्दुल गफ्फ़ार ख़ान को ‘फ्रंटियर गांधी’ तंज़िया अंदाज़ में लिखा जाने लगा.

इस तरह की कई मिसालें हैं जिसने पाकिस्तान में गांधी को एक खलनायक के रूप में स्थापित कर दिया है लेकिन तथ्य इसके उलट हैं. 30 जनवरी 1948 शाम पांच बजकर 10 मिनट पर गांधी की हत्या के पीछे के कई अधकचरी, जहालत भरी सोच में एक सोच यह भी थी कि गांधी पाकिस्तान को उसका हक़ दिलवाने की कोशिश कर रहे थे. देश के खजाने से पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए दिलवाने के लिए वह उपवास पर बैठे थे.

वुसतुल्लाह कहते हैं कि आम पाकिस्तानी को गांधी नज़र ही नहीं आता. जिन्होंने गांधी का नाम सुना है, वो उन्हें एक ऐसे हिंदू नेता के रूप में जानते हैं जो मुसलमानों का दुश्मन था और पाकिस्तान बनाए जाने के खिलाफ भी. बक़ौल वुसतुल्लाह, ‘मैं जब भी किसी से कहता हूं कि गांधी हमारे दुश्मन नहीं दोस्त थे. उनकी हत्या पाकिस्तान का हक़ दिलवाने की कोशिश में हुई तो सामने वाला मुझे अजीब सी नज़र से देखता है.'

इस तरह की कई मिसालें हैं जिसने पाकिस्तान में गांधी को एक खलनायक के रूप में स्थापित कर दिया है

मगर गांधी की यह दुर्दशा सिर्फ पाकिस्तान में नहीं है. दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर शम्सुल इस्लाम कहते हैं कि गांधी के लिए लीगियों जितनी ही घृणा हिंदू महासभा और आरएसएस के भी मन में है. लीगी उन्हें हिंदू नेता मानते थे और महासभा वाले मुसलमानों का दलाल. शम्सुल इस्लाम कुछ मुद्दों पर वुसतुल्लाह ख़ान से एकमत नहीं हैं. इनका मानना है कि जिन्ना भी महात्मा गांधी को पसंद नहीं करते थे. ऑल इंडिया मुस्लिम लीग उन्हें अपना बड़ा दुश्मन मानती थी. पाकिस्तान की नई पीढ़ी उसी विरासत के बोझ तले दबी हुई है.

दूसरा सवाल पाकिस्तान में पढ़ाई जाने वाली इतिहास की किताबों का है. शम्सुल इस्लाम कहते हैं कि पाकिस्तान ने इतिहास अपनी सहूलियत के मुताबिक लिख लिया है. तमा जरूरी हिस्से पाकिस्तान में पढ़ाई जा रही इतिहास के किताबों से गायब हैं.

अब पाकिस्तान में इतिहास शुरू होता है मुहम्मद बिन कासिम से जो दरअसल एक हमलावर था. इसी तरह उनकी किताबें मुस्लिम राजाओं-शहंशाहों के गुणगान से अटी पड़ी हैं. इन्हें इस्लाम का झंडाबरदार बताया गया है लेकिन तथ्य इसके उलट हैं.

शम्सुल इस्लाम कहते हैं कि जब महात्मा गांधी ने मौलवियों को कांग्रेस से जोड़ने की कोशिश की तो जिन्ना ने पुरज़ोर मुख़ालिफत की थी लेकिन आज जिन्ना का मुल्क मौलवियों का मुल्क बनकर रह गया है. गांधी ने धर्म के आधार पर राष्ट्र निर्माण का विरोध इसीलिए किया था. उन्होंने 80 फीसदी आबादी होने के बावजूद हिन्दुस्तान को हिंदू राष्ट्र नहीं बनने दिया, इसलिए कम से कम हम उन्हें कभी नहीं भुला सकते.

First published: 16 August 2016, 8:41 IST
 
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