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क्या होता है 'एंटी-नेशनल' का वकील होना!

सुहास मुंशी | Updated on: 1 March 2016, 8:20 IST
QUICK PILL
  • ये बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है. ये एक तरह का विश्वासघात है कि खुद वकील और बार काउंसिल कानून का पालन न करें. ये\r\n भी देखने में आ रहा है कि दूसरों वकीलों को धमकाने वाले वकील आसानी से \r\nकानून से हाथों बचकर निकल जा रहे हैं. 
  • यह स्थिति बहुत गंभीर है. ऊपर बैठे लोग सीधा ये संदेश दे रहे हैं कि ऐसे लोग जो चाहे वो कर सकते हैं.अब वकील ऐसे गंभीर मामलों को लेने से पहले से ज्यादा डरने लगे हैं. वो दूसरों वकीलों के हमलों का शिकार नहीं बनना चाहते.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय(जेएनयू) के छात्रों की गिरफ्तारी के बाद देश में 'राजद्रोह' की परिभाषा को लेकर बहस छिड़ गयी है.

दिल्ली के कुछ वकीलों ने जेएनयू अध्यक्ष कन्हैया कुमार पर तब हमला कर दिया जब उनकी अदालत में पेशी होनी थी. इन वकीलों ने दूसरे छात्रों, टीचरों और पत्रकारों के संग भी मारपीट की.

जिन वकीलों ने बीच-बचाव की कोशिश की उनके संग भी मारपीट हुई. ये पहला मामला नहीं है जब वकीलों ने अपने वैचारिक पूर्वाग्रहों के चलते कानून हाथ में लिया हो.

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विवादित मामलों से जुड़े वकीलों को हमेशा ही जोखिम उठाना पड़ता है. ऐसे ही एक वकील शाहिद आज़मी थे. वो उन लोगों को मुकदमा लडते थे जो आतंकी मामलों में फंसा दिए जाते थे.

शाहिद पर भी आतंकवादी होने के आरोप लगे थे. आरोपों से बरी होने के बाद उन्होंने ऐसे लोगों की मदद को अपनी जिंदगी का मकसद बना लिया था.

आतंकी मामलो में फंसाए गए लोगों का केस लड़ने वाले शाहिद आज़मी की हत्या कर दी गई थी

आतंकवाद के मामलों से जुड़े अभियुक्तों का मुकदमा लड़ने के लिए शाहिद पर कई बार हमले हुए. फरवरी, 2010 में ऐसे ही एक हमले में उनकी मौत हो गयी.

कैच ने ऐसे चार वकीलों से बात की जो तथाकथित 'एंटी-नेशनल' का मुकदमा लड़ रहे हैं. आखिर उनपर किस तरह का दबाव होता है. वो इन दबावों का कैसे सामने करते हैं.

इंदिरा जयसिंह, सीनियर एडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट, पूर्व एडिशनल सॉलिसिटर जनरल


(इंदिरा जयसिंह सुप्रीम कोर्ट में कन्हैया कुमार की वकील हैं. उन्होंने सुरिंदर कोली का भी मुकदमा लड़ा था. कोली के फांसी के एक दिन पहले उन्होंने उसका मुकदमा लिया. देर रात अदालत में सुनवाई हुई जिसके बाद कोली की फांसी टल गई.)

इस समय मानवाधिकार रक्षकों पर हमला बढ़ गया है. उन्हें कानूनी संरक्षण की जरूरत है. मेरा मानना है कि अदालत में वकील मिलना किसी व्यक्ति का मौलिक अधिकार है, चाहे वो आतंकवादी हो या संत. इसलिए कन्हैया कुमार की पैरवी करने वालों वकीलों पर हमला असंवैधानिक है.

हम जैसों के पास कानून के अलावा कोई बचाव को कोई हथियार नहीं. जब न्याय पाने के अधिकार पर हमला होता है तो मुझे भय लगता है. मझे लगता है कि मेरे पेशे के संग धोखा किया जा रहा है.

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मैंने इसीलिए एनडी जयप्रकाश के लिए याचिका दायर की थी. जयप्रकाश के संग अदालत परिसर में मारपटी हुई थी. वो दूसरे आदमी को बचाने की कोशिश कर रहे थे.

ये मामले पुलिस की जवाबदेही से भी जुड़ा हुआ है. पुलिस ने इस मामले में जो किया वो सबके सामने आना जरूरी है. मैं एक विलुप्तप्राय प्रजाति की तरह महसूस कर रही हूं. जब समाज के रक्षक ही उसके भक्षक बन जाएंगे तो हमें कौन बचाएगा?

आपने पूछा है कि क्या खुद पर भी खतरा महसूस करती हैं? इसका जवाब है, हां, मैं करती हूं.

जब आपके किसी व्यक्ति का मुकदमा लड़ने के अधिकार पर हमला हो तो चुप नहीं रहा जा सकता. वकीलों का पेशेवर काम यही है. कन्हैया के वकीलों पर हमला करके इस अधिकार को चोट पहुंचायी गई है.

करीब 200 वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट से बार काउंसिल ऑफ इंडिया तक इस घटना के विरोध में मार्च किया.

आनंद ग्रोवर, सीनियर एडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट


(याकूब मेमन के वकील. याकूूब की फांसी के पहले वो देर रात अदालत में हाजिर हुए थे.)

मैं वकालत के पेशे में बेसहारा लोगों की मदद के लिए आया था. मैं लॉयर कलेक्टिव्स के साथ मिलकर रेहड़ी-पटरी वालों, फुटपाथ पर रहने वालों, महिलाओं, एचवाई पीड़ितों, नशे के शिकार लोगों का मुकदमा लड़ते आए हैं. हम लोग मृत्युदंड के खिलाफ भी लगातार कानून लड़ाई लड़ते रहे हैं.

मेरी प्रतिबद्धता उन लोगों के प्रति है जिनकी न्याय व्यस्था तक पहुंच आसान नहीं है.

नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, दिल्ली के डेथ पेनाल्टी प्रोजेक्ट ने याकूब मेमन के मामले में मुझसे अदालत में उसका पक्ष रखने के लिए कहा. मैं 27, 28 और 29 जुलाई को उस मामले में पेश हुआ. अदालत ने उसके खिलाफ फैसला दिया.

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29 जुलाई की शाम को मुझे पता चला कि शत्रुघ्न चौहान के मामले के आधार पर सुप्रीम कोर्ट में एक नयी याचिका दायर की गई है ताकि उसे 14 दिन की मोहलत मिल सके. शाम को नौ बजे के करीब मेरे पास फोन आया कि उन लोगों ने करीब 25 सीनियर एडवोकेटों से मेमन के पक्ष में पेश होने के लिए पूछा था. उनमें से कोई भी तैयार नहीं हुआ.

उन लोगों ने मुझसे भी पूछा. चूंकि ये मामला मृत्युदंड से जुड़ा हुआ था और मैं उसके खिलाफ रहा हूं इसलिए मुझे मामला लेने में कोई हिचक नहीं हुई. उसके बाद देर रात में मैं अदालत में पेश हुआ.

जाहिर है कि मुझे भी 'एंटी-नेशनल' इत्यादि कहा गया. लेकिन मैं वही करता हूं जो मेरी अंतरात्मा कहती है. मैं कानून की परंपरा के अनुसार लोगों को न्याय दिलाने के लिए प्रतिबद्ध हूं.

वृंदा ग्रोवर, प्रसिद्ध, क्रिमिनल लॉयर


(वृंदा ग्रोवर जेएनयू के छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार का केस लड़ रही हैं.)

एक पेशेवर वकील के तौर पर मैं लोगों की भावनाओं को ध्यान में रखकर मुकदमे लेने, न लेने का फैसला नहीं कर सकती. पूरी न्यायपालिका इस अवधारणा पर खड़ी है कि हर अभियुक्त को अदालत में अपना पक्ष रखने के लिए वकील मिलेगा.

लेकिन हम कई बार देखते हैं कि कुछ वकील तथाकथित 'एंटी-नेशनल' के साथ हिंसा पर उतर आते हैं या कुछ बार काउंसिल वकीलों से किसी खास व्यक्ति का केस न लड़ने के लिए कह देते हैं.

ये बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है. ये एक तरह का विश्वासघात है कि खुद वकील और बार काउंसिल कानून का पालन न करें.

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ये भी देखने में आ रहा है कि दूसरों वकीलों को धमकाने वाले वकील आसानी से कानून से हाथों बचकर निकल जा रहे हैं. शायद उन्हें पता है कि उन्हें राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है.

इन चीजों को देखते हुए मुझे लगता है कि स्थिति बहुत गंभीर हो गयी है. ऊपर बैठे लोग सीधा ये संदेश दे रहे हैं कि ऐसे लोग जो चाहे वो कर सकते हैं.

अब वकील ऐसे मामलों को लेने से पहले से ज्यादा डरने लगे हैं. वो दूसरों वकीलों के हमलों का शिकार नहीं बनना चाहते. ऐसे केस लेते समय आपके ज़हन में ख्याल आता है कि आप अगला निशाना बन सकते हैं.

मैं असहाय लोगों का मुकदमा लड़ती रहूंगी. मैं ऐसे लोगों की कानूनी सहायता करती रहूंगी. मुझे उम्मीद है कि मेरे साथी मेरे कानूनी अधिकार और फैसले का सम्मान करेंगे. जिस तरह मैं उनकेे तस्करों, हत्यारों और बलात्कारियों के मुकदमे लड़ने के अधिकार और फैसले का सम्मान करती हूूं.

महमदू प्राचा, क्रिमिनल लॉयर


(प्राचा जर्मन बेकरी मामले(2010) और दिल्ली हाई कोर्ट धमाके(2011) में अभियुक्तों के वकील रहे. इसके लिए उनपर शारीरिक हमले तक हुए.)

वकीलों पर पहले भी हमले हुए, उनकी हत्या तक हुई. शाहिद आज़मी का ही मामला ले लें या यूपी धमाके के मामले के वकील की जिन्हें मारापीटा गया. जर्मन बेकरी केस में पुणे के बार काउंसिल ने एक प्रस्ताव पारित करके कहा कि काउंसिल का कोई भी वकील इस मामले में अभियुक्तों की तरफ से अदालत में पेश नहीं होगा. फिर कुछ वकीलों ने केस लिया जिसके बाद उनपर हमले हुए.

जर्मन बेकरी केस में पुणे के बार काउंसिल ने सभी वकीलों को अभियुक्तों का केस लेने से मना कर दिया था

मैंने कई तरह के दबाव महसूस किए है. जिस आदमी को बड़ी संख्या में लोग नापसंद करते हों उसका केस लड़ने पर बाकियों के साथ दोस्तों और परिवार का भी दबाव होता है. शारीरिक हमला तो आदमी एक बार को बर्दाश्त भी कर सकता है. जब लोगों के ये लगने लगात है कि आप 'एंटी-नेशनल' का केस लड़ रहे हैं तो वो आपके संग जिस तरह देखने लगते हैं वो बर्दाश्त के बाहर है.

सरकार आपको इस कदर परेशान करती है कि जिसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता. उन्होंने मुझे धमकाने की कोशिश की और जब वो ऐसा नहीं कर पाए तो मेरे मुवक्किलों को धमकाने लगे.

लेकिन हम ये सब इसलिए सहते हैं क्योंकि मासूमों को आजादी दिलाने से बड़ी संतुष्टि मिलती है. दिल्ली हाई कोर्ट बम धमाके मामले में एक नौजवान डॉक्टर का करियर तबाह किया जा रहा था. मैं ऐसे ही लोगों को बचाने के लिए काम करता हूं.

मैं तो फिर भी सुरक्षित माहौल में काम करता हूं. उन वकीलों को सोचिए जो मुख्य धारा में नहीं है. उनके बारे में सोचकर मैं कांप जाता हूं.

मेरे ख्याल से वकीलों पर आतंकवाद से जुड़े मामले न लेने का दबाव बढ़ता जा रहा है. लोगों की भावनाएं उबाल पर हैं और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया इसका एक बड़ा कारण है. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भावनाओं के नाम पर तुरंत रायशुमारी करके तुरंत फैसला सुनाने लगती है. इस तरह वो भीड़ की भावनाओं को संतुष्ट करने लगता है.

मैं ये मामले इसलिए लेता हूं ताकि असली अपराधी पकड़े जा सकें. मैं नहीं चाहता कि वो आजाद घूमें और हम पर हंसे.

First published: 1 March 2016, 8:20 IST
 
सुहास मुंशी @suhasmunshi

He hasn't been to journalism school, as evident by his refusal to end articles with 'ENDS' or 'EOM'. Principal correspondent at Catch, Suhas studied engineering and wrote code for a living before moving to writing mystery-shrouded-pall-of-gloom crime stories. On being accepted as an intern at Livemint in 2010, he etched PRESS onto his scooter. Some more bylines followed in Hindustan Times, Times of India and Mail Today.

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