Home » इंडिया » Catch Hindi: what does it mean to be a black in Delhi capital of India
 

क्‍या दिल्‍लीवालों के बच्‍चे हमारे बच्‍चों से नफ़रत करने के लिए पैदा हुए हैं?

श्रिया मोहन | Updated on: 10 February 2017, 1:50 IST
(कैच)

दिल्‍ली की एमिटी यूनिवर्सिटी में मेडिकल के अंतिम वर्ष के छात्र क्रूज़ याद्दा जब पहली बार मेट्रो में चढ़े थे, तो एक बच्‍चे ने उनकी ओर इशारा कर के अपने पिता से पूछा था, ''वो क्‍या है''? पिता ने हंसते हुए बच्‍चे को नसीहत दी थी, ''वो एक इंसान है. वो हमारी ही तरह बात कर सकता है. उससे डरने की ज़रूरत नहीं है.''

याद्दा का यह पहला तजुर्बा था जब किसी ने उसके मनुष्‍य होने की पुष्टि की थी. यह बताया था कि वह कोई वस्‍तु नहीं, इंसान है. कोई अजीबोगरीब जंतु नहीं, बल्कि एक जीता-जागता आदमी है.

क्या भारतीय कालों से नफरत करते हैं और गोरों की पूजा

कांगो की राजधानी ब्राज़ाविले से दिल्‍ली आने के बाद इस शहर के बारे में उन्‍हें एक ज्ञान यह मिला है कि दिल्‍ली के लोग जाहिल होते हैं.

यहां के लोगों की सांस्‍कृतिक जहालत का हवाला देते हुए वे कहते हैं, ''इन लोगों ने बाहर की दुनिया बहुत कम देखी है. वे नहीं जानते कि भारत से बाहर एक ऐसी दुनिया है जहां अलग-अलग नस्‍लों और समुदायों के लोग रहते हैं. अपने से अलग दिखने वाले लोगों से इन्‍होंने कभी कोई संवाद ही नहीं किया है.''

विरोध की खदबदाहट

राजधानी में 10,000 से ज्‍यादा अफ्रीकी रहते हैं, लेकिन ये सभी अपने-अपने दड़बों में सिमटे हुए हैं और इनका शहर से संपर्क न्‍यूनतम है. 

दक्षिणी दिल्‍ली के राजपुर खुर्द में दोपहर का एक बज रहा है लेकिन रिहायशी इलाके सुनसान से हैं. गलियों में रात का पानी जमा है. मकानों की बालकनी में कुछ कपड़े सूख रहे हैं.

वीडियो: चीन में काले से गोरा करने के विज्ञापन पर विवाद?

कुछ अफ्रीकी सामने से गुज़रते हैं लेकिन इस रिपोर्टर से बात करने से इनकार कर देते हैं और तेज़ी से निकल लेते हैं. ऐसा लगता है कि इनकी निजी जिंदगी में आप किसी अनचाहे दखल की तरह चले आए हों.

इकनॉमिक टाइम्‍स की एक रिपोर्ट के अनुसार एक कैब चालक पर भोर में छह अफ्रीकियों ने हमला कर दिया था. राजधानी में इधर हुए हमलों और अफ्रीकी छात्रों पर प्रतिक्रिया में किए गए हमलों की कड़ी में यह घटना सबसे ताज़ा है.

किसी एक अफ्रीकी की सजा सबको भोगनी पड़ती हैः कांगो निवासी याद्दा

पिछले ही माह एक कंगोलीज़ शिक्षक ओलिवर मसुंद को पास के वसंत कुंज इलाके में पीट-पीट कर मार दिया गया था. भारत में अफ्रीकी छात्रों के संघ ने इस घटना के बाद 26 मई को दिल्‍ली पुलिस को एक ख़त भेजकर गृह मंत्रालय से पुलिस मुख्‍यालय के बीच मंगलवार को एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने की मांग की थी और पुलिस का सहयोग मांगा था.

पत्र में लिखा था: भारत और अफ्रीका के बीच वर्षों से अच्‍छे रिश्‍ते रहे हैं. अफ्रीकी छात्र इसे और मज़बूत करना चाहते हैं और उसके लिए वे अपने भारतीय भाइयों के बीच यह जागरूकता फैलाने की ख्‍वाहिश रखते हैं कि वे हमारे छात्रों के मन में खटास पैदा कर रहे हैं. अफ्रीकी मूल के लोगों के ऊपर भीड़ द्वारा किए जाने वाले हमले, सड़कों पर मारपीट, अपमान, उनके मानवाधिकारों का उल्‍लंघन और नस्‍ली हरकतें किसी भी कीमत पर बरदाश्‍त नहीं की जाएगी.

सांवली सूरत का फेसबुक, ट्विटर पर हमला

दिल्‍ली पुलिस ने प्रदर्शन की इजाज़त नहीं दी. उसने छात्रों को जंतर-मंतर पर जाकर विरोध करने की सलाह दी है. 

याद्दा ने तय किया है कि वे विरोध करेंगे. वे कहते हैं, ''मैं यहां 2012 में जब आया था तो लोग मुझे और मेरे दोस्‍तों को देखकर भाग जाते थे... अब वे भागते तो नहीं हैं लेकिन उनकी आक्रामकता और नफ़रत में इजाफा हो गया है.''

सरकार का रवैया

इस समस्‍या पर कांगो गणराज्‍य के दूतावास से आधिकारिक बयान लेने की कोशिश करने वाले किसी भी रिपोर्टर को निराशा ही हाथ लगेगी. 

वहां के लैंडलाइन फोन का रिसीवर पटकने से पहले रिसेप्‍शनिस्‍ट का आक्रोश भरा जवाब कुछ यूं मिलता है: ''ये कांगो एम्‍बैसी है. हमारा इससे कोई लेना-देना नहीं है.''

विदेश नीति के स्‍तर पर देखें तो इस किस्‍म की खटास परस्‍पर जान पड़ती है. अधिकतर अफ्रीकी देशों के लिए यहां जो वीज़ा नीति लागू है, उसके अंतर्गत वहां के लोगों को हर छह महीने पर आप्रवासन अधिकारी के समक्ष वीज़ा नवीनीकरण के लिए पेश होना पड़ता है.

अफ्रीकी छात्र की हत्या: विरोध में भारत से ‘अफ्रीका दिवस’ स्थगित करने की मांग

याद्दा पूछते हैं, ''मेरा एमबीबीएस का पाठ्यक्रम यदि पांच साल का है, तो वे हर छह महीने पर मुझे क्‍यों बुलाते हैं? हमें इस तरह शर्मिंदा क्‍यों किया जा रहा है?''

याद्दा की बात का एक व्‍यापक आयाम है. वे समझाते हुए कहते हैं, ''इसमें कोई शक़ नहीं कि यहां के लोग सोचते हैं कि हम लोग गरीब हैं और यहां शरण लेने आते हैं. वे सोचते हैं कि अगर उन्‍होंने हमें रह जाने दिया तो हम लौट कर अपने घर नहीं जाएंगे. उन्‍हें इस बात का इल्‍म नहीं है कि हम लोग यहां किसी भी भारतीय के मुकाबले शिक्षा, मकान का किराया और यहां तक कि परिवहन भाड़ा जैसी बुनियादी सेवाओं की कीमत कहीं ज्‍यादा चुकाते हैं. हमें हमेशा ज्‍यादा चुकाने को कहा जाता है क्‍योंकि हम विदेशी हैं.''

एक की सज़ा सबको

राजपुर खुर्द के निवासी 35 वर्षीय बिजेंदर तंवर रियल एस्‍टेट ब्रोकर हैं. वे तल्‍ख लहजे में कहते हैं, ''मैं अफ्रीकियों को यहां मकान दिलाने में आम तौर से मदद नहीं करता क्‍योंकि वे मुझे समझ में ही नहीं आते.'' 

उनके सहयोगी कहते हैं, ''ये सब संदिग्‍ध हैं. ये अपने मकान को अस्‍तव्‍यस्‍त रखते हैं और उसी में घुसे रहते हैं. इनकी औरतें सेक्‍स का धंधा करती हैं और बहुत पीती हैं. देखिए, दोपहर का एक बज रहा है लेकिन रात के नशे में ये लोग अब तक धुत्‍त पड़े सो रहे हैं.''

क्‍या आप इनमें से किसी को जानते हैं? यह पूछने पर वे तपाक से जवाब देते हैं, ''नहीं, इनके बारे में मैंने बस सुना है.''

हमें लगातार हब्‍शी और कालिया पुकारा जाता है और भी गालियां दी जाती हैंः फाजुमु

छह दिन पहले बेनिन गणराज्‍य का एक कारोबारी फाजुमु रात के ग्‍यारह बजे के आसपास ऑटो से राजपुर गांव से लौट रहा था. तीन ऑटोवालों ने जब देखा कि वह अश्‍वेत है, तो उन्‍होंने उसका ऑटो रुकवा लिया. 

ऑटो चालक को उन्‍होंने खींचकर बाहर फेंक दिया. इसके बाद वे फाजुमु को बेतहाशा घूंसे मारने लगे. 

पास की एक डिस्पेंसरी में अपना इलाज करवाने जा रहे फाजुमु बताते हैं, ''बिना किसी वजह के ये सब हो गया. लोगों ने मुझे बताया था कि भारत में अफ्रीकियों के प्रति नफ़रत बढ़ती जा रही है लेकिन मैं पहला बार पिटा हूं.''

दिल्ली: अफ्रीकी मूल के नागरिक की हत्या के मामले में दूसरी गिरफ्तारी

अपनी उम्र और उपनाम बताने से इनकार करते हुए फाजुमु कहते हैं, ''हमें लगातार हब्‍शी और कालिया पुकारा जाता है. और भी गालियां दी जाती हैं जो समझ में तो नहीं आती हैं लेकिन इतना पता है कि वे गंदी हैं.''

याद्दा का कहना है कि कुछ गड़बड़ लोगों के कारण सबको झेलना पड़ रहा है. एक बार याद्दा ने देखा कि उसका पड़ोसी अपने मकान मालिक से झगड़ रहा था. शायद उसने वक्‍त पर किराया नहीं दिया था या किसी और को कमरा किराये पर चढ़ा दिया था. 

मकान मालिक सड़क पर निकल आया और उसने बिल्डिंग के सभी अफ्रीकियों को गाली देनी शुरू कर दी. अच्‍छा खासा बवाल खड़ा हो गया. अचानक एक भीड़ इकट्ठा हो गई जो उस मकान में रहने वाले हर अफ्रीकी को मारने-पीटने पर आमादा थी. याद्दा बताते हैं, ''यह तो भयावह है. एक ने किराया नहीं चुकाया तो इसका मतलब ये थोड़ी हुआ कि हमारा उससे कोई संबंध है, न ही हम सभी ऐसे हैं. अच्‍छा और बुरा हर जगह एक साथ होता है.''

सरकार की प्रतिक्रिया

बढ़ती हुई नस्‍ली हिंसा के विरोध में अफ्रीकी राजदूत ने 25 मई को दिल्‍ली में अफ्रीका दिवस समारोह का बहिष्‍कार करने का फैसला लिया. 

इससे हुई शर्मिंदगी के चलते मानव संसाधन विकास मंत्री स्‍मृति ईरानी ने हाल ही में घोषणा की है कि उनका मंत्रालय राजधानी की अफ्रीकी कॉलोनियों में जागरूकता के कार्यक्रम आयोजित करेगा. 

यह कदम तंवर और उनके सहयोगी जैसे लोगों की धारणाओं को दुरुस्‍त करने में कारगर साबित हो सकता है.

एगबोरो मिशेल माली के कपड़ा व्‍यापारी हैं जो तिरुपुर से टी-शर्ट खरीदकर अपने यहां निर्यात करते हैं. इस रिपोर्टर से मिलते ही वे आक्रोश में सवालों की झड़ी लगा देते हैं.

मिशेल पूछते हैं, ''आप लोग अपने बच्‍चों को क्‍या खिलाते हैं? हमारे बारे में आप उन्‍हें क्‍या बताते हैं? हमारे लिए नफ़रत लेकर वे क्‍यों पैदा होते हैं? छोटे-छोटे बच्‍चे तक हमारे ऊपर पत्‍थर फेंकते हैं. हमने आप लोगों का क्‍या बिगाड़ा है?'' 

अफ्रीकियों पर हमला: वीके सिंह ने बताया मामूली झड़प, मीडिया पर जड़ी तोहमत

गहरे रंग के कपड़े पहने मिशेल हमारे ऊपर सवालों की बौछार कर के हलकी बूंदाबांदी के बीच निकल लेते हैं.

यहां का बिंदासपन एक धोखा है. यहां की छांव महज एक आड़ है. दिल्‍ली में बस पाना बेहद कठिन है. इसके लिए दिल कड़ा करना पड़ता है. खुद को कड़ा दिखाना पडता है.

याद्दा मुस्‍कराते हुए कहते हैं, ''मैंने अपनी जिंदगी में कभी खुद को इतना काला नहीं महसूस किया जितना भारत आकर किया है. आप हमारे अफ्रीका आइए. वहां के लोगों का प्‍यार महसूस करिए. आपको खुद पर शर्म आने लगेगी.''

First published: 31 May 2016, 7:34 IST
 
श्रिया मोहन @shriyamohan

एडिटर, डेवलपमेंटल स्टोरी, कैच न्यूज़

पिछली कहानी
अगली कहानी