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गुलबर्ग सोसाइटी केस: 28 फरवरी 2002 से अब तक क्या हुआ?

कैच ब्यूरो | Updated on: 2 June 2016, 12:33 IST
(पीटीआई)

गुजरात में गोधरा कांड के एक दिन बाद 28 फ़रवरी 2002 को अहमदाबाद के गुलबर्ग हाउसिंग सोसाइटी में भीड़ ने घुसकर 69 लोगों की हत्या कर दी थी. कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफरी को भी भीड़ ने जिंदा जला दिया था.

गोधरा में 27 फ़रवरी 2002 को साबरमती एक्सप्रेस पर हमले में 59 कारसेवकों के मारे जाने के बाद गुजरात के कई शहरों में बड़े पैमाने पर दंगे फैल गए थे. गुलबर्ग सोसाइटी इस दौरान हुए दस बड़े सांप्रदायिक दंगों में शामिल है.

एहसान जाफरी के घर में शरण

दंगों से बचने के लिए कई मुसलमानों ने अपने परिवार सहित अहमदाबाद के मेघाणीनगर इलाके की गुलबर्ग सोसायटी में रहने वाले एहसान जाफ़री के घर इस उम्मीद में शरण ली थी कि पूर्व सांसद होने के कारण वे शायद वहां बच जाएं.

लेकिन दंगाइयों ने गुलबर्ग सोसायटी को घेर कर उसमें आग लगा दी, जिसमें एहसान जाफ़री समेत कुल 69 लोग मारे गए थे. 39 लोगों के शव बरामद हुए जबकि कई लापता हो गए जिन्हें बाद में मृत मान लिया गया.

चार घंटे तक मार-काट

गुलबर्ग सोसायटी में 29 बंगले और 10 फ्लैट थे, जिसमें ज्यादातर मुस्लिम परिवार रहते थे और एक पारसी परिवार था. मुकदमे के दौरान अदालत को बताया गया कि उस दिन हज़ारों की संख्या में उत्तेजित भीड़ सोसाइटी के अंदर घुस आई.

घटना के चश्मदीदों ने बताया कि भीड़ ने चार घंटे तक सोसाइटी में मार-काट की. बच्चे, बूढ़े और औरतें, कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफरी के दो मंजिला घर में पनाह लिए हुए थे.

हत्या के बाद लगाई आग

उत्तेजित भीड़ को देखकर आखिर में एहसान जाफरी खुद बाहर आये और भीड़ से कहा कि वो उनकी जान ले लें, लेकिन बच्चों और औरतों को छोड़ दें. जिसके बाद एहसान जाफरी को घर से घसीट कर बाहर लाया गया और मौत के घाट उतार दिया. बाद में भीड़ ने उनके घर को आग लगा दी.

एहसान जाफरी की पत्नी जकिया जाफरी ने 8 जून 2006 को पुलिस में एक शिकायत दर्ज कराई. जिसमें इस हत्याकांड के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी सहित कई मंत्रियों और 62 अन्य लोगो को जिम्मेदार ठहराया गया. लेकिन पुलिस ने एफआईआर दर्ज करने से मना कर दिया.

2009 में एसआईटी को जांच

नवंबर 2007 में हाईकोर्ट ने भी उनकी अपील खारिज कर दी. मार्च 2008 में जकिया जाफरी और गैर-सरकारी संगठन 'सिटिजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस' संयुक्त रूप से सुप्रीम कोर्ट पहुंचे.

सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात दंगों के 10 बड़े मामलों की जांच के लिए गुजरात की तत्कालीन नरेंद्र मोदी सरकार को आदेश दिया. जिनमें गुलबर्ग सोसाइटी का मामला भी था. कोर्ट ने पूर्व सीबीआई निदेशक आर के राघवन की अध्यक्षता में जांच के लिए एक एसआईटी गठित की.

मार्च 2010 में मोदी से पूछताछ

मार्च 2009 में जकिया जाफरी की फरियाद की जांच करने का जिम्मा भी सुप्रीम कोर्ट ने एसआईटी को सौंप दिया. सितंबर 2009 को ट्रायल कोर्ट में गुलबर्ग हत्याकांड की सुनवाई शुरू हुई.

एसआईटी ने 27 मार्च 2010 को तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को पूछताछ के लिए बुलाया और मई 2010 में सुप्रीम कोर्ट को अपनी रिपोर्ट सौंप दी.

इस बीच अक्तूबर 2010 में प्रशांत भूषण इस केस से अलग हो गए. जिसके बाद अदालत ने राजू रामचंद्रन को एमाइकस क्यूरी नियुक्त किया. राजू रामचंद्रन ने अहमदाबाद का दौरा किया और गवाहों तथा उन अन्य लोगों से मुलाकात की, जिसके आधार पर एसआईटी ने जुलाई 2011 में सुप्रीम कोर्ट को अपनी रिपोर्ट सौंप दी.

2 जून को अदालत का फैसला

इस मामले में 67 लोगों के ख़िलाफ़ मुकदमा चला था, लेकिन मुकदमे के दौरान चार लोगों की मौत हो चुकी है. गुलबर्ग सोसाइटी केस में 338 से ज्यादा लोगों की गवाही हुई. 15 सितंबर 2015 को इस मामले की सुनवाई खत्म हो गई थी.

अहमदाबाद की विशेष अदालत ने आज गुलबर्ग सोसाइटी दंगे के मामले में वीएचपी नेता अतुल वैद्य समेत 24 अभियुक्तों को दोषी करार दिया है, जबकि बीजेपी पार्षद बिपिन पटेल समेत 36 अभियुक्तों को आरोपों से बरी कर दिया है. सजा का एलान छह जून को किया जाएगा.

First published: 2 June 2016, 12:33 IST
 
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