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क्या पाकिस्तान में हिंदू बचेंगे?

याक़ूब ख़ान बंगश | Updated on: 10 February 2017, 1:50 IST

करीब एक दशक पहले हुए शिक्षा सुधारों के बाद हर किसी ने पाकिस्तान की संविधान सभा के पहले सभापति और देश के पहले श्रम मंत्री जोगेंद्र नाथ मंडल के बारे में सुना. मंडल की उपस्थिति को इस बात का सुबूत माना जाता है कि पाकिस्तान की परिकल्पना एक बहुलतावादी देश के रूप में की गई थी. कायद-ए-आजम मोहम्मद अली जिन्ना ने जिस तरह मंडल को संरक्षण दिया था उससे उनकी विश्वसनीयता का पता चलता है.

लेकिन बहुत कम लोग ये जानने में रुचि रखते हैं कि ऐसी शानदार शुरुआत के बाद मंडल का क्या हुआ?

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मंडल की आगे की कहानी सुनाने से पहले मैं आपको पाकिस्तान के जन्म के समय के कुछ आंकड़े बताना चाहूंगा. जब पाकिस्तान बना तो पश्चिमी पाकिस्तान (आधुनिक पाकिस्तान) में करीब 24.6 प्रतिशत गैर-मुस्लिम थे. पूर्वी बंगाल और सिलहट (आधुनिक बांग्लादेश) में करीब 30 प्रतिशत आबादी हिंदुओं की थी. 

पाकिस्तान की पहली 69 सदस्यों वाली संविधान सभा में 18 सदस्य (करीब 26 प्रतिशत) गैर-मुस्लिम थे. बंटवारे के बाद पश्चिमी पंजाब की विधानसभा में 10 सदस्य (करीब 10 प्रतिशत) गैर-मुस्लिम थे. 

यानी पाकिस्तान जब बना तो हमारे देश में न केवल गैर-मुस्लिमों की अच्छी-खासी आबादी थी बल्कि संसद और विधानसभा में भी उनका पर्याप्त प्रतिनिधित्व था. हालांकि हालात जल्द ही बदल गए. पश्चिमी पाकिस्तान में गैर-मुस्लिम आबादी पांच प्रतिशत से भी कम हो गई. और आगे हालात नहीं सुधरे तो ये संख्या और भी कम हो सकती है.

मंडल की आगे की कहानी

मंडल अक्टूबर 1950 तक पाकिस्तान में रहे. उसके बाद वो भारत चले गए. वो काफी निराश और हताश होकर भारत वापस गए क्योंकि वो मुस्लिम लीग के लिए 1943 से काम कर रहे थे. पार्टी के संग उनका संबंध भी काफी अच्छा रहा था.

पाकिस्तान बनने के बाद इस संबंध में दरार उभरने लगी. सबसे पहले पूर्वी बंगाल के कैबिनेट में अनुसूचित जाति के सदस्यों को शामिल करने पर उनका पार्टी से मतभेद हुआ.

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मंडल के लिखे पत्रों और दूसरे स्रोतों के अनुसार पहले सर ख्वाजा निजामुद्दीन की और उसके बाद नुरूल अमीन के प्रांतीय कैबिनेट में अनुसूचित जाति के सदस्यों को शामिल नहीं किया गया. केंद्रीय मंत्री होने के बावजूद मंडल की अपील को नजरअंदाज कर दिया गया.

मंडल इससे गहरा धक्का लगा. उन्हें लगा कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों, खासकर अनुसूचित जाति के हितों की रक्षा करने का उनका प्रयास पूर्वी बंगाल की सरकार को पसंद नहीं आया.

मंडल ने हिंदुओं पर पूर्वी बंगाल में होने वाले कई हमलों का जिक्र किया है. फरवरी 1950 में ढाका में दंगे शुरू हो गए. मंडल के अनुसार हिंदुओं को हत्या और लूट का शिकार होना पड़ा. इसके बाद हिंदुओं का भारत पलायन शुरू हो गया.

हिंदुओं का बहिष्कार

मंडल ने हिंदुओं के संग होने वाले बरताव के बारे में लिखा, "मुस्लिम, हिंदू वकीलों, डॉक्टरों, दुकानदारों और कारोबारियों का बहिष्कार करने लगे, जिसकी वजह से इन लोगों को जीविका की तलाश में पश्चिम बंगाल जाने के लिए मजबूर होना पड़ा."

मंडल के अनुसार पूर्वी बंगाल के हिंदुओं के घरों को आधिकारिक प्रक्रिया पूरा किए बगैर कब्जा कर लिया गया और हिंदू मकान मालिकों को मुस्लिम किरायेदारों ने किराया देना काफी पहले बंद कर दिया था. इन कारणों से भी हिंदुओं को भारत में शरण लेने के लिए बाध्य होना पड़ा.

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मंडल आखिर में इस नतीजे पर पहुंचे कि पाकिस्तान में हिंदुओं की स्थिति "संतोषजनक तो दूर बल्कि हताशाजनक है और उनका भविष्य पूरी तरह अंधकारपूर्ण है." मंडल अक्टूबर 1950 में ये खत लिखने के बाद ही भारत चले गए.

पाकिस्तान में हिंदुओं की जो हालात मंडल ने तब बताई थी, आज उनकी स्थिति उससे भी बदतर हो चुकी है. 

हर साल करीब एक हजार गैर-मुस्लिम लड़कियों का अपहरण होता है और उन्हें इस्लाम स्वीकार करने पर मजबूर किया जाता है. गैर-मुस्लिमों के संग नौकरियों में अक्सर भेदभाव होता है. लोग हिंदुओं के साथ खान-पान भी पसंद नहीं करते.

हिंदुओं का भविष्य

हाल ही में सिंध प्रांत में एक हिंदू बुजुर्ग गोकुल प्रसाद की रमजान के दौरान खाने के लिए बुरी तरह पिटाई कर दी गई. जबकि उस बुजुर्ग की उम्र के मुसलमानों को भी रोजे से रियायत मिली हुई है.

पाकिस्तान के पंजाब में हिंदू अब ऐसी प्रजाति है जिसके बारे में वो किताबों में पढ़ते हैं क्योंकि प्रांत में अब नाममात्र के ही हिंदू बचे होंगे. सिंध, खैबर-पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में अभी भी हिंदुओं की ठीक-ठाक संख्या है.

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अब ये हमारे ऊपर है कि हम जाग जाएं और उनके अधिकारों की रक्षा करें या फिर जबरन धर्म परिवर्तन, दंगा या भारत पलायन इत्यादि की वजह से उन्हें पाकिस्तान से खत्म हो जाने दें. हिंदुओं की अच्छी खासी संख्या की वजह से एक विशेष प्रावधान बनाया जा रहा है. लेकिन विभाजन के 68 साल बीत जाने के बाद भी ऐसा लगता है कि जैसे हम वहीं थमे हुए हैं. 

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में पाकिस्तानी अखबार द एक्सप्रेस ट्रिब्यून में 14 जून, 2016 को प्रकाशित हो चुका है. मूल लेख यहां पढ़ें)

First published: 15 June 2016, 5:11 IST
 
याक़ूब ख़ान बंगश @catchhindi

लेखक पाकिस्तान स्थित इतिहासकार हैं.

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