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क्या है ऑफिस ऑफ प्रॉफिट से जुड़ा पूरा विवाद?

कैच ब्यूरो | Updated on: 15 June 2016, 16:06 IST

सोमवार को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने दिल्ली सरकार के उस बिल को मंजूरी देने से मना कर दिया है, जिसमें संसदीय सचिव की पोस्ट को 'ऑफिस ऑफ प्रॉफिट' से अलग करने का प्रावधान था. राष्ट्रपति के इस फैसले के बाद आम आदमी पार्टी के 21 विधायकों की सदस्यता रद्द हो सकती है.

पिछले साल 13 मार्च को अरविंद केजरीवाल सरकार ने आम आदमी पार्टी के 21 विधायकों को संसदीय सचिव नियुक्त किया था. आपको बता दें कि दिल्ली के 70 सीटों वाली विधानसभा में आप के 67 विधायक विधायक चुनकर आए हैं.

इस मामले में दिल्ली के युवा वकील प्रशांत पटेल ने पिछले साल 19 जून को राष्ट्रपति के पास इन 21 विधायकों की सदस्यता रद्द करने की गुहार लगाई थी. सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले प्रशांत बताते हैं कि जब उनके इस कदम के बारे में केजरीवाल सरकार को पता चला तो आनन-फानन में दिल्ली सरकार ने 23 जून, 2015 को ऑफिस ऑफ प्रॉफिट बिल से जुड़ा संशोधन विधानसभा में पारित करा लिया.

इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के पास भी एक जनहित याचिका पिछले साल मई महीने से लंबित हैं. हाईकोर्ट ने भी दिल्ली सरकार से जवाब मांगा है. अब राष्ट्रपति ने बिल को खारिज कर दिया है तो चुनाव आयोग के पास इन विधायकों की सदस्यता रद्द करने का आखिरी अधिकार है. उम्मीद जताई जा रही है कि जल्द ही दिल्ली की 21 विधानसभा सीटों पर दोबारा चुनाव कराए जा सकते हैं.

क्या है ऑफिस ऑफ प्रॉफिट (लाभ का पद)

संविधान के अनुच्छेद 102 (1) (ए) के तहत सांसद या विधायक ऐसे किसी और पद पर नहीं हो सकता, जहां वेतन, भत्ते या अन्य फायदे मिलते हों. इसके अलावा संविधान के अनुच्छेद 191 (1)(ए) और जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 9 (ए) के तहत भी ऑफिस ऑफ प्रॉफिट में सांसदों-विधायकों को अन्य पद लेने से रोकने का प्रावधान है.

मई, 2012 में पश्चिम बंगाल में पूर्ण बहुमत से चुनकर आई तृणमूल कांग्रेस सरकार ने भी संसदीय सचिव बिल पास किया था. इसके बाद ममता बनर्जी सरकार ने करीब दो दर्जन विधायकों को संसदीय सचिव नियुक्त किया. इन सचिवों को मंत्री का दर्जा प्राप्त था. पिछले साल जून में कोलकाता हाईकोर्ट ने सरकार के बिल को अंसवैधानिक ठहरा दिया.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार चुनाव आयोग करेगा कार्रवाई

भारतीय संविधान की गरिमा के तहत ‘लाभ के पद’ पर बैठा कोई व्यक्ति एक ही साथ विधायिका का हिस्सा नहीं हो सकता. 2006 में जया बच्चन पर आरोप लगा कि वह राज्यसभा सांसद होते हुए भी उत्तर प्रदेश फिल्म विकास निगम की चेयरमैन है जो लाभ का पद है.

चुनाव आयोग ने जया बच्चन को सदस्यता के अयोग्य पाया. इस मामले में अपनी सिफारिश राष्ट्रपति को भेज दी. जया बच्चन ने चुनाव आयोग के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन वहां भी उन्हें निराशा हाथ लगी.

जया बच्चन के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार अगर किसी सांसद या विधायक ने 'लाभ का पद' लिया है तो उसे सदस्यता गंवानी होगी चाहे वेतन या भत्ता लिया हो या नहीं. चुनाव आयोग के पूर्व सलाहकार केजे राव कहते हैं कि आप के विधायकों पर आखिरी फैसले का ऐलान चुनाव आयोग ही करेगा. आपको बता दें कि लाभ के पद के मामले में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी भी इस्तीफा दे चुकी हैं और वह रायबरेली से दोबारा चुनकर संसद में पहुंची थीं.

चुनाव आयोग की भूमिका

चुनाव आयोग आम आदमी पार्टी के 21 विधायकों से पूछा है कि उनकी सदस्यता क्यों ना रद्द की जाए? कई विधायकों ने चुनाव आयोग को अपना जवाब भेज दिया है. विधायकों के अनुसार संसदीय सचिव होने के नाते वे दिल्ली सरकार से कोई वेतन, भत्ते और अन्य कोई सुविधा नहीं ले रहे जो लाभ के पद के दायरे में आए.

अब आम आमदी पार्टी के पास अदालत जाने का रास्ता बचा है. हालांकि, संविधान के जानकारों के अनुसार अगर किसी मामले में चुनाव आयोग और राष्ट्रपति एकमत हों तो अदालत भी उन फैसलों को रद्द नहीं करता. ऐसा जया बच्चन के मामले में हो चुका है.

केजरीवाल सरकार के आरोप

दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनकी सरकार को काम नहीं करने दे रहे हैं. उन्होंने मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा, 'दिल्ली में हो रहे अच्छे कामों से मोदी जी घबरा रहे हैं.'

उनके अनुसार आम आदमी पार्टी के किसी विधायक ने एक पैसा नहीं लिया है. सभी अपने खर्चे पर सरकार का काम रहे हैं. वहीं कांग्रेस ने सीएम केजरीवाल से नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा देने की मांग की है. कांग्रेस ने आरोप लगाया कि केजरीवाल इस मुद्दे पर झूठा दावा कर रहे हैं.

First published: 15 June 2016, 16:06 IST
 
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