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जानें क्या है धारा 377, क्यों छिड़ी है इस पर बहस?

कैच ब्यूरो | Updated on: 10 July 2018, 14:43 IST

धारा 377 जो कि समलैंगिगता को आपराधिक श्रेणी में लाती है. इस समय सुप्रीम कोर्ट में पर बहस चल रही है. धारा 377 जिसके अंतर्गत समलैंगिगता को रखा गया है. समलैंगिगता को आम बोलचाल में एलजीबीटी (LGBT) यानी लेस्ब‍ियन (LESBIAN ), गे(GAY), बाईसेक्सुअल (BISEXUAL) और ट्रांसजेंडर (TRANSGENDER) कहते हैं.

इसे कई जगहों पर QUEER भी बुलाया जाता है. क्वीर यानी की अजीब. लेकिन क्या अजीब होना या दूसरों से अलग होना आपराधिक है? इसी बात पर धारा 377 की बहार छिड़ी हुई है.

धारा 377 को सबसे पहले 1862 में लागू किया गया था. इस कानून के अंतर्गत अप्राकृतिक रूप से यौन संबंध बनाना कानून की नजर में गलत है और इसे गैरकानूनी ठहराया गया है. लेकिन ब्रिटिश शाशन द्वारा लागू इस कानून को ब्रिटेन में 1967 में ही अपराध की सूची से बाहर कर दिया था.

 

क्या है सजा
इस धरा के तहत दो पुरुषों या महिलाओं के बीच सहमति से भी शारीरिक संबंध हैं तो वो इस कानून के दायरे मे आएगा. सेक्शन 377 के तहत अगर कोई स्‍त्री-पुरुष आपसी सहमति से भी अप्राकृतिक यौन संबंध बनाते हैं तो इस धारा के तहत 10 साल की सजा एवं जुर्माने का प्रावधान है.

शक के आधार पर भी हो सकती है गिरफ्तारी
इस धारा के अंतर्गत गिरफ्तारी के लिए किसी प्रकार के वारंट की जरूरत नहीं होती है. शक के आधार पर या गुप्त सूचना का हवाला देकर पुलिस इस मामले में किसी को भी गिरफ्तार कर सकती है. और इसके तहत जमानत भी नहीं मिलती यह एक गैरजमानती अपराध है.

नाज फाउंडेशन कर रही है पैरवी
नाज फेउन्डेशन ने 2001 में एक याचिका दायर की. इसमें कहा गया था कि अगर दो एडल्‍ट आपसी सहमति से एकांत में सेक्‍सुअल संबंध बनाते है तो उसे धारा 377 के प्रावधान से बाहर किया जाना चाहिए. जिसके बाद 2 जुलाई 2009 को नाज फाउंडेशन की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने अपने ऐत‍िहासिक फैसले में कहा कि दो व्‍यस्‍क आपसी सहमति से एकातं में समलैंगिक संबंध बनाते है तो वह आईपीसी की धारा 377 के तहत अपराध नहीं माना जाएगा कोर्ट ने सभी नागरिकों के समानता के अधिकारों की बात की थी.

 

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने 11 दिसंबर 2013 में होमो सेक्‍सुअल्‍टी के मामले में दिए गए अपने जजमेंट में समलैंगिगता मामले में उम्रकैद की सजा बरकरार रखने का फैसला दिया. सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस फैसले को खारिज कर दिया था जिसमें दो बालिगो के आपसी सहमति से समलैंगिक संबंध को अपराध की श्रेणी से बाहर माना गया था.
सुप्रीम कोर्ट इस समुदाय को ‘मिनिस्क्यूल माइनोरिटी’ मानता है. जबकि इस समाज के हक की लड़ाई लड़ रहे लोगों का कहना है कि समलैंगिगता को अपराध की श्रेणी में रखे जाने की वजह से कई लोग खुलकर सामने नहीं आ रहे हैं.

हालांकि अगस्त, 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने निजता के अधिकार पर फ़ैसला सुनाते हुए कहा था कि सेक्शुअल ओरिएंटेशन किसी व्यक्ति का निजी मामला है और सरकार इसमें दखल नहीं दे सकती. ऐसे में एलजीबीटी समुदाय के लिए एक बार फ‍िर उम्मीद जगी है.

गौरतलब है कि कई धार्मिक संस्थाएं धारा 377 के पक्ष में खड़ी हैं. ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, उत्कल क्रिश्चियन काउंसिल, एपॉस्टोलिक चर्चेज अलायंस, तमिलनाड़ु मुस्लिम मुन्न कझगम के अलावा कई धर्मगुरुओं ने दिल्ली हाईकोर्ट 2009 के फैसले का विरोध किया था.

First published: 10 July 2018, 14:43 IST
 
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