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दत्तात्रेय का अवध गमन और भाजपा का 14 वर्षीय वनवास

पाणिनि आनंद | Updated on: 10 February 2017, 1:51 IST
QUICK PILL
  • संघ के इतिहास में ऐसा दूसरी बार हो रहा है जब किसी सह सरकार्यवाह को लखनऊ \r\nकेंद्र का दायित्व दिया गया है. इससे पहले भाऊराव देवरस ने यह ज़िम्मेदारी \r\nसंभाली थी.
  • दत्तात्रेय को नेतृत्व के संकट से जूझ रही भाजपा को \r\nभी संभालना है और संघ के विचार और वर्चस्व को भी सूबे और उत्तर भारत में \r\nमज़बूत करना है.
  • दत्तात्रेय के बारे में माना जाता है कि वो संघ के शीर्ष पद के दावेदार \r\nहैं. उन्हें सर-संघचालक के भावी चेहरे के तौर पर देखा जाता है.

पिछले दिनों नागौर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में जो अहम निर्णय लिए गए, उनमें से एक था संघ के सह-सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले को लखनऊ में पदस्थापित करना. यह भी दुर्लभ संयोग है कि उत्तर प्रदेश की सत्ता से भाजपा को बाहर हुए चौदह साल हो चुके हैं. 2002 में राजनाथ सिंह की सरकार आखिरी बार उत्तर प्रदेश की सत्ता से बाहर हुई थी.

संघ के इतिहास में ऐसा दूसरी बार हो रहा है जब किसी सह सरकार्यवाह को लखनऊ केंद्र का दायित्व दिया गया है. इससे पहले भाऊराव देवरस ने यह ज़िम्मेदारी संभाली थी. दत्तात्रेय को दी गई इस जिम्मेदारी के कई निहितार्थ ढूंढ़े जा रहे हैं. जाहिर है इसमें तमाम राजनीतिक, सांगठनिक और रणनीतिक लक्ष्यों के साथ 2017 में भाजपा के वनवास को समाप्त करना भी अहम लक्ष्य है.

दत्तात्रेय का लखनऊ केंद्र आने का निर्णय संघ ने उनकी एक व्यापक भूमिका को ध्यान में रखते हुए लिया है. उन्हें नेतृत्व के संकट से जूझ रही भाजपा को भी संभालना है और संघ के विचार और वर्चस्व को भी सूबे और उत्तर भारत में मज़बूत करना है. संघ सूत्रों की मानें तो भाउराव देवरस के बाद संघ के विस्तार की व्यापक ज़मीन तैयार करने में दत्तात्रेय एक निर्णायक भूमिका निभाने जा रहे हैं. उनके पास संघ और अन्य संगठनों के कामकाज का अनुभव भी है और समझ भी.

दत्तात्रेय का लखनऊ केंद्र आने का निर्णय संघ ने उनकी एक व्यापक भूमिका को ध्यान में रखते हुए लिया है

दत्तात्रेय के बारे में माना जाता है कि वो संघ के शीर्ष पद के दावेदार हैं. उन्हें सर-संघचालक के भावी चेहरे के तौर पर देखा जाता है. उनका लंबा समय विद्यार्थी परिषद के लिए काम करते बीता है और उस दौरान लंबा प्रवास उत्तर प्रदेश में रहा है.

इस तरह से उत्तर प्रदेश के तमाम जनपदों में उनके परिचित लोग हैं. जिन लोगों ने उनके साथ परिषद का काम किया है, आज वो प्रदेश और देश में भाजपा के बड़े नेता हैं. इस तरह संघ के साथ-साथ भाजपा में भी उनकी मज़बूत पैठ है.

ऐसे में भाजपा को सांगठनिक संकटों से निकालने में भी दत्तात्रेय की अहम भूमिका हो सकती है. राज्य में संघ से जुड़े रहे भाजपा के फिलहाल सबसे बड़े चेहरे के तौर पर राजनाथ सिंह को देखा जाता है लेकिन सूबे में भाजपा की अंतर्कलह और गुटबाज़ी को संभाल पाना उनके वश में नहीं है.

राज्य में भाजपा नेताओं का एक हिस्सा राजनाथ सिंह को अपने नेता के तौर पर नहीं देखता है. ऐसा ही भाजपा के अन्य नेताओं के बारे में भी है. सूबे में पार्टी के भीतर किसी एक नाम पर आम सहमति का अभाव है. लंबे समय से भाजपा एक प्रेरक मज़बूत नेतृत्व और संगठित पहल के संकट से सूबे में जूझ रही है.

राज्य में भाजपा नेताओं का एक हिस्सा राजनाथ सिंह को अपने नेता के तौर पर नहीं देखता है

राम मंदिर आंदोलन के दिनों के बाद से भाजपा का ग्राफ सूबे में लगातार गिरता गया है. पिछले आम चुनाव को छोड़ दें तो भाजपा की विधानसभा में संख्या लगातार कम होती गई है. ऐसे में संगठन को साधना और संगठित करना संघ के लिए भी एक बड़ी चिंता का विषय है.

प्रदेश में अगले वर्ष के विधानसभा चुनावों की दृष्टि से भी यह अति महत्वपूर्ण है. 2017 में उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव 2019 के आम चुनावों के सेमीफाइनल के तौर पर देखा जा रहा है और भाजपा के साथ साथ संघ के लिए भी आवश्यक है कि सत्ता की निरंतरता बनी रहे ताकि वो अपनी रणनीति पर आगे बढ़ सकें.

संघ के पास उत्तर प्रदेश से एक अहम चेहरा कृष्णगोपाल का है. वो भी सह सरकार्यवाह हैं और 2014 का आम चुनाव पार्टी ने उनकी देखरेख में लड़ा था. इस चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन ऐतिहासिक रहा. लेकिन अब चुनौती 2017 के विधानसभा चुनाव की है. ऐसे में कृष्णगोपाल एक अहम नाम हो सकते थे. लेकिन सूबे से होने के नाते किसी भी तरह की पसंद-नापसंद की स्थिति या गुटबाज़ी को टालने के लिए यह दायित्व किसी बाहर के व्यक्ति को देना अधिक उपयुक्त माना गया. इस दृष्टि से भी दत्तात्रेय को लाया जाना काफी अहम माना जा रहा है.

भाजपा की स्थिति ज्यादा जोगी मठ उजाड़ वाली हो गई है. चीज़ें व्यवस्थित नहीं हैं और अमित शाह भी भाजपा के इस संकट को सूबे में हल नहीं कर पाए हैं. राज्य के पूर्व में आदित्यनाथ से लेकर दिल्ली की सीमाक्षेत्र में महेश शर्मा तक, वरिष्ठों में मुरली मनोहर जोशी से लेकर कल्याण सिंह और कलराज मिश्र तक, धर्मपाल सिंह, मनोज सिन्हा से लेकर विनय कटियार तक एक लंबी सूची है जो अपने अपने समय और क्षेत्रों के नेता तो हैं लेकिन भाजपा में संगठन की दृष्टि से ताकत कम, संकट ज्यादा बने हुए हैं.

विधानसभा चुनावों की दृष्टि से यह महत्वपूर्ण है. क्योंकि 2017 के विधानसभा चुनाव को 2019 के आम चुनावों के सेमीफाइनल के तौर पर देखा जा रहा है

संघ का हस्तक्षेप इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण है क्योंकि संघ को लगता है कि इन संकटों को भाजपा पर नहीं छोड़ा जा सकता और इसके लिए उसे खुद ही दखल देना होगा.

दरअसल, अगर भाजपा के किसी एक व्यक्ति को चीज़ें संभालनी होंगी तो यह खतरा हमेशा बना रहेगा कि पदों और दायित्वों से लेकर टिकटों के बंटवारे तक हिस्सेदारी और पक्षपात होगा और खेमेबाज़ी में पार्टी वो नहीं हासिल कर सकेगी जो उसके लिए अहम है.

एक बड़ा हिस्सा नेतृत्व के निर्णयों से असहमत रहेगा तो भीतरघात का संकट भी बना रहेगा. अगर संगठन और नेतृत्व के स्तर पर सुधार नहीं हुए तो मोदी लहर के सहारे हासिल हुआ 2014 का जनादेश दोहराया नहीं जा सकेगा. ऐसे में किसी मज़बूत, प्रभावी और बड़े कद के व्यक्ति की देखरेख में ही चीज़ों को साधने का काम किया जा सकता है.

दत्तात्रेय के पास संगठन का लंबा अनुभव है और माना जाता है कि उनकी देखरेख में पदों और दायित्वों से लेकर टिकटों तक पात्र लोगों का चयन संभव हो सकेगा.

भाजपा की स्थिति ज्यादा जोगी मठ उजाड़ वाली हो गई है. अमित शाह भी सूबे में भाजपा के संकट को हल नहीं कर पाए हैं

लेकिन दत्तात्रेय का काम केवल भाजपा को संकटों से उबारना और मज़बूत करना भर नहीं है. असल में उनको संघ के एजेंडे को उत्तर प्रदेश में मज़बूती से लागू करने की दिशा में काम करना है. उनके पहले भाउराव देवरस ने संघ के संख्या विस्तार के लिए सोशल इंजीनियरिंग का मंत्र सुझाया था और कहा था कि संघ को व्यापक स्तर पर दलितों, पिछड़ों को जोड़ने की दिशा में काम करना चाहिए.

दत्तात्रेय संघ में अगली सोच के चेहरे के तौर पर भी देखे जाते हैं. वो नए विचारों के लिए खुले और ग्राह्य माने जाते हैं. ऐसे में सोशल इंजीनियरिंग से आगे के प्रयोग के लिए दत्तात्रेय उत्तर प्रदेश की ज़मीन को प्रयोगशाला बना सकते हैं.

संघ और भाजपा के चेहरों को इस बात का अंदाज़ा है कि दत्तात्रेय का वर्तमान और भविष्य क्या है और इसलिए उनके नेतृत्व को लेकर असहमति और विरोध की गुंजाइश न के बराबर रहेगी. दत्तात्रेय के लिए हालांकि उत्तर प्रदेश में बेहतर कर पाना उनके भविष्य के लिए कोई निर्णायक दायित्व नहीं है और जानकार बताते हैं कि अगर उन्हें लखनऊ का दायित्व न भी दिया जाता, तब भी उनको लेकर चीज़ें लगभग स्पष्ट हैं, फिर भी संघ के एक अहम चेहरे के नाते संघ को बेहतर स्थिति में ले जाना दत्तात्रेय की ज़िम्मेदारी भी है और संघ के लिए चुनौती भी. दत्तात्रेय इसी ज़मीन के विस्तार के लिए अवध का रुख कर रहे हैं.

First published: 30 March 2016, 8:40 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बीबीसी हिन्दी, आउटलुक, राज्य सभा टीवी, सहारा समय इत्यादि संस्थानों में एक दशक से अधिक समय तक काम कर चुके हैं.

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