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कैराना का पूरा सच वह नहीं है जो हुकुम सिंह बता रहे हैं

सादिक़ नक़वी | Updated on: 14 June 2016, 13:12 IST
QUICK PILL
  • उत्तर प्रदेश के शामली जिले से भाजपा के सांसद हुकुम सिंह ने कैराना कस्बे से 346 हिंदू परिवारों के मुस्लिमों के आतंक के कारण पलायन की बात कहकर राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है.
  • हुकुम सिंह घटना को जिस तरीके से पेश करने की कोशिश कर रहे सच्चाई उसके विपरीत कहानी बयान कर रही है.
  • हुकुम सिंह 2013 में मुजफ्फरनगर में हुए सांप्रदायिक दंगोंं के आरोपियों में से एक हैं.

उत्तर प्रदेश के कैराना कस्बे से हिंदुओं के पलायन की कहानी एक झटके की तरह आई है. क्षेत्र के स्थानीय निवासियों और राजनीतिज्ञों का कहना है कि इस शहर में सांप्रदायिक संघर्ष या तनाव का कोई इतिहास नहीं रहा है और बीजेपी इसे खामखां का मुद्दा बनाकर राजनीतिक लाभ लेने का प्रयास कर रही है.

इलाहाबाद में पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के बाद बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘उत्तर प्रदेश को कैराना की घटना को हल्के में नहीं लेना चाहिये, यह एक बेहद चैंकाने वाला घटनाक्रम है.’’

सबसे दिलचस्प बात यह है कि अमित शाह के बोलने के चंद मिनटों बाद मंच संभालने वाले पीएम नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में एक बार भी कैराना का जिक्र तक नहीं किया. इसकी बजाय उन्होंने अपने संबोधन को पूरी तरह से बीजेपी के शासनकाल के दौरान हुए विकास कार्यों और बीजेपी की सफलता में उत्तर प्रदेश की महत्वपूर्ण भूमिका तक सीमित रखा.

सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल

बेहद समृद्ध गन्ना बेल्ट के बीच में स्थित शामली जिले का एक छोटा सा कस्बा कैराना इन दिनों सुर्खियों में है. बीजेपी के वरिष्ठ नेता और सांसद हुकुम सिंह ने हाल ही में एक सूची जारी की है. मुजफ्फरनगर दंगों के आरोपियों में से एक हुकुम सिंह ने कहा कि एक विशेष समुदाय के सदस्यों के डर के चलते क्षेत्र के 346 हिंदु परिवारों को शहर से पलायन करना पड़ा है.

कैराना एक मुस्लिम बहुल कस्बा है और बीजेपी सांसद ने अपने आरोपों को वजन देने के लिये इसे तथ्य के तौर पर इस्तेमाल किया है.कृषि जागरण मंच के अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश योजना आयोग के सदस्य प्रोफेसर सुधीर पंवार कहते हैं, ‘‘कैराना हमेशा से शांतिपूर्ण रहा है.’’ यहां तक कि बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद जब पूरे क्षेत्र में बड़े पैमाने पर दंगे फैले हुए थे, कैराना में कुछ नहीं हुआ. 2013 में हुए मुजफ्फरनगर दंगों के दौरान भी, जब शामली के कुछ क्षेत्र इसकी चपेट में आ गए थे, कैराना बिल्कुल शांत था.’’

हालांकि वे यह जरूर जोड़ते हैं कि कि किस तरह से कैराना में बड़ी सफाई से विभिन्न समुदायों के मोहल्लों में बंट चुका है.

राष्ट्रीय लोकदल के महासचिव जयंत चौधरी कहते हैं, ‘‘क्षेत्र का कोई भी व्यक्ति मेरे संज्ञान में ऐसी किसी गतिविधि होने की बात नहीं लाया.’’ वो सिंह के दावों की प्रमाणिकता पर सवाल उठाते हुए पूछते हैं कि आखिर इतनी बड़ी बात को लेकर कोई शिकायत या फिर पंचायत क्यों नहीं हुई? पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय लोकदल का मजबूत जनाधार है.

कहानी का दूसरा पहलू पुलिस की रिपोर्ट बताती है

शामली के एसपी विजय भूषण और जिलाधिकारी सुजीत कुमार द्वारा संयुक्त रूप से साहरनपुर रेंज के डीआईजी को भेजी गई एक रपट भी बताती है कि कैसे जब पूरा राज्य दंगों की आग में झुलस रहा था तब भी कैराना पूरी तरह से शांतिपूर्ण था.

रिपोर्ट कहती है, ‘‘2013 में जब नजदीकी शहर शामली सांप्रदायिक हिंसा से जल रहा था तब हिंसा के पीड़ितों ने कैराना में शरण ली थी.’’ रपट में आगे उल्लिखित है, ‘‘जब इन शरणार्थियों ने क्षेत्र का सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने की कोशिश की तो वह कैराना के स्थानीय निवासी ही थे जिन्होंने सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने में पुलिस और प्रशासन का सहयोग किया.’’

सिंह ने राजनीति में अपनी बेटी के प्रवेश का रास्ता आसान करने के लिये इसे एक मुद्दा बनाया है

विधानपरिषद में क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले एक विधायक नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, ‘‘एक तरफ बीजेपी इस मुद्दे को उठाये रखना चाहती है और दूसरी तरफ सिंह भी प्रदेश की राजनीति में खुद को प्रासंगिक बनाए रखने के लिये ऐसे ही मुद्दों की तलाश में हैं.’’

कुछ लोगों का दावा है कि सिंह ने राजनीति में अपनी बेटी के प्रवेश का रास्ता आसान करने के लिये इसे एक मुद्दा बनाया है. सांसद चुने जाने से पहले हुकुम सिंह कैराना से विधानसभा का चुनाव जीते थे. बाद में हुए उपचुनाव में बीजेपी, समाजवादी पार्टी के नाहिद हसन के हाथों इस सीट को हार गई थी.

कुछ लोग सांसद के रूप में और उससे पहले विधायक के रूप में हुकुम सिंह के कार्यकाल पर सवालिया निशान लगाते हैं. एमएलसी पूछते हैं, ‘‘वे एक मजबूत जनाधार वाले वरिष्ठ राजनीतिज्ञ हैं. अगर कल्पना में मान भी लें कि ऐसा वास्तव में हुआ है तो ऐसा कैसे हो सकता है कि वे इस पलायन को रोकने में असफल रहे.’’

जयंत चौधरी कहते हैं, ‘‘अगर एक पल के लिये कोई उनकी बात को सच भी मान लेता है तो भी यह उनकी विफलता की ओर संकेत करता है. आखिर उन्होंने पिछला चुनाव सुरक्षा सुनिश्चित करने के ‘बहू-बेटी बचाओ’ के नारे के साथ लड़ा था.’’ चौधरी कहते हैं कि बीजेपी समय के साथ अपनी बातों से पलटती रहती है और पहले तो उसके नेताओं का दावा था कि हमें केंद्र में ले आओ तो हम सभी समस्याओं का हल कर देंगे और अब उन्होंने यू-टर्न लेते हुए मतदाताओं से उन्ही मुद्दों के आधार पर प्रदेश की सत्ता उनके हाथों में सौंपने का आह्वाहन करना प्रारंभ कर दिया है.

हुकम सिंह की सूची की सच्चाई

पुलिस और जिला प्रशासन ने अपनी रपट में कहा है कि उन्होंने सिंह द्वारा उपलब्ध करवाई गई सूची की जांच करनी प्रारंभ कर दी है. सिंह द्वारा सूचीबद्ध किये गए 346 परिवारो में से 119 की जांच की जा चुकी है.

रिपोर्ट के अनुसार सूचिबद्ध लोगों में से 4 की मौत हो चुकी है और 13 लोग अभी भी कैराना में ही रह रहे हैं. रिपोर्ट आगे कहती है कि 68 परिवारों को कैराना छोड़े कम से कम 5 और अधिकतम 15 साल हो चुके हैं. इनके कैराना छोड़ने की वजहें भी सांप्रदायिक न होकर बेहतर व्यापार, रोजगार, स्वास्थ्य या फिर अपने बच्चों की बेहतर शिक्षा-दीक्षा रही है.

ज्यादातर लोगो पानीपत, सोनीपत, करनाल और दिल्ली चले गए हैं. तमाम ऐसे परिवार भी हैं जो कम से कम पांच वर्ष पहले कस्बे से जा चुके हैं लेकिन उनके घरों और दुकानों जैसी पैतृक संपत्तियों पर अभी भी उनका ही हक़ है. दिलचस्प बात यह है कि पुलिस की रिपोर्ट में बिल्कुल इन्हीं वजहों से कुछ मुसलमान परिवार भी इलाके से पलायन कर चुके हैं.

बुनियादी सुविधाओं का अभाव, सरकारी तंत्र का नकारापन और सामाजिक जरूरतों के कारण पैदा हुई है

जाहिर है हुकुम सिंह जिस घटना को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश में हैं वह बुनियादी सुविधाओं का अभाव, रोजगार की कमी, सरकारी तंत्र का नकारापन और सामाजिक जरूरतों के कारण पैदा हुई है.

स्थानीय रालोद नेता और विधानपरिषद सदस्य चौधरी मुश्ताक कहते हैं, ‘‘यहां पर कोई व्यापार नहीं है जिसके चलते स्थानीय लोग बेहतर अवसरों की तलाश में शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन कर रहे हैं.’’ जयंत चौधरी कहते हैं कि खेती का संकट और बरोजगारी वे मुख्य मुद्दे हैं जिनके चलते क्षेत्र से बड़े पैमाने पर पलायन हो रहा है और साथ ही आरोप लगाते हैं कि राज्य सरकार इस समस्या से निबटने में नाकाम रही है.

हुकुम सिंह ने मुकीम काला गैंग का भी जिक्र किया जिसके सदस्य व्यापारियों से जबरन वसूली कर रहे थे. उन्हीं के आतंक के चलते हिंदुओं को शहर छोड़कर जाना पड़ा. पंवार बताते हैं कि वास्तव में काला स्थानीय व्यापारियों से जबरन वसूली कर रहा था जिसके चलते कुछ लोग क्षेत्र छोड़कर गए भी. लेकिन उसका निशाना कोई विशेष समुदाय के लोग नहीं थे.

पुलिस की रिपोर्ट भी इस दावे की पुष्टि करती है. रिपोर्ट के अनुसार मुकीम गैंग के 25 सदस्य विभिन्न जेलों में बंद हैं और चार अलग-अलग पुलिस से मुठभेड़ में मारे जा चुके हैं. लिहाजा मौजूदा पलायन की जो तस्वीर हुकुम सिंह पेश कर रहे हैं उसके लिए मुकीम गैंग को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.

यह रिपोर्ट आगे स्पष्ट करती है कि मुख्यतः सोनीपत, पानीपत, करनाल और सहारनपुर में सक्रिय रहने वाले इस गैंग द्वारा 2014 में 2 व्यापारियों राजेंद्र और शिवकुमार की हत्या के बाद इनके द्वारा इस क्षेत्र में कोई अन्य घटना सामने नहीं आई है. पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक वर्ष 2016 में मुकीम के भाई वसीम ने आपने दो साथियों बाबू और सुभाष के साथ मिलकर एक व्यापारी निखिल से जबरन वसूली का प्रयास किया था लेकिन पुलिस ने अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की.

पुलिस रिपोर्ट साफ कहती है, ‘‘पूर्व में जिन घटनाओं में मुकीम गैंग के सदस्य शामिल थे वे विशुद्ध रूप से आपराधिक घटनाएं थीं और उन घटनाओं के भुक्तभोगी हिंदु और मुसलमान दोनों ही थे.’’जयंत चौधरी कहते हैं कि यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि बीजेपी सिर्फ हिंदुओं की बात कर रही है और उसने मुसलमानों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया है.

वे कहते हैं, ‘‘लोगों को बांटना उनकी राजनीति का सबसे बड़ा चरित्र है.’’पंवार को लगता है कि सिंह द्वारा जारी की गई सूची बीजेपी के समर्थकों के बीच ही पार्टी की साख को बट्टा लगा सकती है. वे कहते हैं, ‘‘2013 के मुजफ्फरनगर दंगों से पहले उस घटना को याद कीजिये जब जब कुछ स्थानीय बीजेपी नेताओं ने एक ऐसे वीडियो को बढ़ावा दिया जिसने जनता को उकसाया. बाद में साफ हुआ कि वह वीडियो पाकिस्तान की किसी घटना से संबंधित है.’’

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि बीजेपी ने इस घटना की जांच के लिये अपने नेताओं की गठित की गई उच्च स्तरीय समिति की कमान भी हुकुम सिंह के हाथों में ही सौंपी है. आरोपी को ही जज बना दिया गया है.

First published: 14 June 2016, 13:12 IST
 
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