Home » इंडिया » What political vendetta! Congress looks more like a spoilt brat
 

नेशनल हेरल्डः संसद ठप करके कांग्रेस ने मारी अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी

पाणिनि आनंद | Updated on: 12 December 2015, 19:51 IST
QUICK PILL
  • नेशनल हेरल्ड के मुद्दे पर कांग्रेस संसद नहीं चलने दे रही है. उसका दावा है कि बीजेपी \'राजनीतिक बदले की भावना\' से इस मुद्दे को उछाल रही है.
  • इस मुद्दे पर सोनिया गांधी समेत कांग्रेस से कई बड़े नेताओं ने बीजेपी पर निशाना साधा है. इस मामले की अगली सुनवाई 19 दिसंबर को होने वाली है.

वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) पर विपक्ष का हल्ला बोल जारी है. फरवरी 2011 में अखबारों में हेडिंग छपी थी: ''अमित शाह की गिरफ्तारी के कारण बीजेपी जीएसटी बिल को रोक रही है.'' उस समय मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे. पिछले चार साल में विपक्ष बदल गया है लेकिन जीएसटी पर हंगामा जारी है.

जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और पूर्व पीएम मनमोहन सिंह को जीएसटी बिल के लिए ''चाय पर चर्चा'' पर बुलाया तो लगा अब संसद में गतिरोध खत्म हो जाएगा. लेकिन नेशनल हेरल्ड मामले ने उन उम्मीदों पर पानी फेर दिया.

जब सोनिया, राहुल और कांग्रेस के कुछ अन्य नेताओं को कोर्ट में तलब किया गया तो कांग्रेस ने संसद की कार्रवाई ठप कर दी

अगर गतिरोध ज्यादा बढ़ता है तो इस सत्र में भी जीएसटी बिल पास होने की उम्मीद नहीं है. साथ ही कांग्रेस की रणनीति पर सवाल भी उठ रहे हैं. पूछा जा रहा है कि भारत की सबसे पुरानी पार्टी को अभी दिशा-निर्देश कौन दे रहा है.

कई विश्लेषकों को मानना है कि कांग्रेस अपनी रणनीति बनाने में गलती कर रही है. देश की वित्तीय स्थिति, पाकिस्तान के साथ यू-टर्न लेने पर और बिहार में करारी हार झेलने के बाद सरकार की छवि को नुकसान पहुंचा है.

कांग्रेस को इन मुद्दों को भुनाने की कोशिश करनी चाहिए. हालांकि, नेशनल हेरल्ड मामले ने इन मुद्दों को दबा दिया. यह मामला अब न्यायपालिका और संसद के सम्मान के बरक्स कांग्रेस के अहंकार को दिखा रहा है.

दिल्‍ली हाईकोर्ट ने नेशनल हेरल्ड मामले में गांधी परिवार की तरफ से दायर की गई उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें गांधी परिवार ने ट्रायल कोर्ट के समन को चुनौती दी थी. यह मामला सात दिसंबर का है. इसके अगले दिन कांग्रेस ने संसद के अंदर और भीतर हंगामा कर दिया.

गलती कहां हुई

कांग्रेस ने सोचा होगा कि इस मुद्दे पर उसे विपक्षी दलों का समर्थऩ मिलेगा लेकिन तृणमूल कांग्रेस के अलावा किसी ने उसे समर्थऩ नहीं दिया. कांग्रेस की कमजोर रणनीति के कारण वह लोकसभा में अलग-थलग पड़ गई.

इस मुद्दे ने मोदी को यह कहने का मौका दे दिया, '' लोकतंत्र किसी की मर्जी और पसंद पर काम नहीं कर सकता.''

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा, ''भारत कभी कानून से ऊपर रानी को स्वीकार नहीं कर सकता''

आम लोगों के बीच भी इसी तरह का संदेश गया. कांग्रेस खुद को पीड़ित के तौर पर पेश करना चाहती थी लेकिन उसकी छवि खुद को कानून से ऊपर मानने वाली की बनती जा रही है. कांग्रेस की रणनीति अप्रत्याशित तरीके से उलटी पड़ गई.

इस मुद्दे पर कांग्रेस पार्टी के अंदर भी दो स्वर उठ रहे हैं. कई सांसद संसद में कांग्रेस के विरोध के तरीके से खुश नहीं है. एक वरिष्ठ नेता के अनुसार, ''हमें यह नहीं देखना है कि परिवार के साथ कौन खड़ा है बल्कि यह देखना है कि इससे क्या हासिल होगा.''

कांग्रेस की एक महत्वपूर्ण बैठक में सभी सांसदों ने स्वीकार किया कि संसद में 'राजनीतिक बदले की भावना ' का कड़ा विरोध होना चाहिए. इस बैठक के बारे में कांग्रेस के एक नेता ने बताया, "बैठक में लोगों की बीच वफादरी दिखाने की होड़ मच गई. इस कारण कोई ठोस रणनीति नहीं बन पाई. और इसका समापन कुछ इस तरह हुआ कि ''सभी सिपहसालार रानी की जय ही बोलेंगे.''

सूत्रों ने बताया कि अंबिका सोनी, कुमारी शैलजा और भूपिंदर सिंह हुड्डा जैसे बड़े नेता सदन चलने देने के खिलाफ थे

बैठक में राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद के बोलने के दौरान अंबिका सोनी ने उन्हें तीन बार टोका. सूत्रों के अनुसार सोनी ने कहा, ''जो लोग सदन चलाना चाहते हैं वो गांधी परिवार के खिलाफ हैं.'' सिर्फ गुलाब नबी आजाद ही नहीं बल्कि पार्टी के कई वफादारों का भी मानना है कि सदन के अंदर की रणनीति 'आलाकमान' को नहीं तय करनी चाहिए.

सूत्रों ने इशारा किया कि 19 दिसंबर को पार्टी नेतृत्व कोर्ट के आदेश को चुनौती नहीं देने जा रहा है लेकिन अब देर हो चुकी है. कांग्रेस को कुछ सहानुभूति जरूर मिल सकती है लेकिन उससे सदन में बड़ी भूमिका की आशा नहीं करनी चाहिए.

पार्टी को क्या करना चाहिए?

1. मंगलवार को सोनिया गांधी ने कहा, '' मैं इंदिरा गांधी की बहू हूं. किसी से भी नहीं डरती हूं.'' पार्टी को तुरंत इस मुद्दे से खुद को अलग कर देना चाहिए. सदन में इस मामले के घसीटने के बजाय गांधी परिवार को इस मसले पर ऊंचे नैतिक मानदंड अपनाना चाहिए.

2. पार्टी कानून और कोर्ट से ऊपर है ये मैसेज देने की बजाय कांग्रेस नेताओं को बस इतना कहना चाहिए था कि इस मामले में कुछ भी गलत नहीं है. पार्टी को कोर्ट के आदेश को चुनौती नहीं देना चाहिए.

3. अगर पार्टी ये संदेश देती है कि 'एक बीमार नेता और उसके परिवार को राजनीतिक विद्वेष के कारण परेशान किया जा रहा है' तो उसे इसका बड़ा फायदा हो सकता है. अगर सोनिया और राहुल कोर्ट में जाते हैं तो उनके कार्यकर्ताओं में नया जोश पैदा होगा और वे सड़कों पर उतर कर सरकार को घेरने का काम करेंगे. ऐसी स्थिति में पार्टी प्रचार कर सकती है कि जब अमित शाह और सलमान खान जैसे लोग बाहर सड़कों पर हैं तब उनके नेता को जेल भेजा जा रहा है.

4. कांग्रेस संसद के अंदर और बाहर सड़क पर दोनों जगह कड़ा प्रतिरोध दर्ज करा सकती थी.

5. जनता के बीच में कांग्रेस को यह संदेश देने की जरूरत है कि अगर सत्ताधारी दल निर्दोष लोगों को जेल में भेजना चाहती है तो हम इसके लिए तैयार हैं. पार्टी को स्पष्ट रूप से यह संदेश देने की जरूरत है कि वह देश के संविधान और कानून में पूरी तरह से भरोसा करती है और वह गांधी, नेहरू के सिद्धांतों पर अमल करते हुए अगर कोई उसे जेल भी भेजता है तो इसके लिए तैयार है.

6. एक दिन के लिए जेल जाकर राहुल और सोनिया राजनीति का नया मंच सजा देंगे. एनडीए में भी इसको लेकर एक किस्म का डर है. 2जी मामले में मनमोहन सिंह के जेल जाने की संभावनाओं पर बीजेपी के अंदर भी बेचैनी फैल गई थी.

7. नेशनल हेरल्ड मामले को जरूरत से ज्यादा बढ़ाने की बजाय पार्टी को जीएसटी, वीके सिंह और एनडीए की पाकिस्तान नीति पर अपना रुख कड़ा करते हुए बीजेपी को उस पर घेरने की कोशिश करनी चाहिए. इन मुद्दों पर उसे बाकी विपक्षी दलों का भी समर्थन हासिल होगा.

8. अगर जीएसटी बिल कांग्रेस द्वारा प्रस्तावित सभी संशोधनों के साथ पारित हो जाता है तो यह कांग्रेस की जीत होगी. उस स्थिति में कांग्रेस खुद को पीड़ित के रूप में दिखा सकती है और कह सकती है कि उसने सरकार के नकारात्मक रवैए के बावजूद सदन में सकारात्मक रुख अपनाया.

फिलहाल तो कांग्रेस पार्टी मौका चूक गई है. उसे अगले अवसर की प्रतीक्षा करनी चाहिए.

First published: 12 December 2015, 19:51 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

Senior Assistant Editor at Catch, Panini is a poet, singer, cook, painter, commentator, traveller and photographer who has worked as reporter, producer and editor for organizations including BBC, Outlook and Rajya Sabha TV. An IIMC-New Delhi alumni who comes from Rae Bareli of UP, Panini is fond of the Ghats of Varanasi, Hindustani classical music, Awadhi biryani, Bob Marley and Pink Floyd, political talks and heritage walks. He has closely observed the mainstream national political parties, the Hindi belt politics along with many mass movements and campaigns in last two decades. He has experimented with many mass mediums: theatre, street plays and slum-based tabloids, wallpapers to online, TV, radio, photography and print.

पिछली कहानी
अगली कहानी