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लालबत्ती पर झंडा बेच रहे हिंदुस्तान के बच्चे क्या जानते हैं गणतंत्र के बारे में

दुर्गा एम सेनगुप्ता | Updated on: 11 February 2017, 5:45 IST

हाल के दिनों में अगर आपने दिल्ली की सड़कों पर यात्रा की होगी तो हर लालबत्ती पर ऐसे बच्चों को जरूर देखा होगा जो तिरंगा बेच रहे थे.

हर साल गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस के मौके पर ऐसे बच्चों के हाथ में यूएसबी केबल, फूल, गुब्बारे, सस्ते खिलौनोंं की जगह तिरंगा ले लेता है. इस साल छोटे कागज के तिरंगे दिल्ली की लालबत्ती से नदारद हैं. इनकी जगह बड़े सिल्की कपड़े वाले तिरंगे ने ले ली है.

जो बच्चे इन्हें बेच रहे हैं वो इसका महत्व नहीं जानते, इसके मायने नहीं जानते. वे सिर्फ इसलिए तिरंगा बेच रहे हैं क्योंकि उनके लिए यह रोजी-रोटी का जरिया है.

50 साल के करीब पहुंच चुके गोवर्धन अधिचिनी गांव की लालबत्ती पर दूर से बैठकर तिरंगे की बिक्री कर रहे बच्चों पर नजर रख रहे हैं. इस दौरान वे दम पर दम बीड़ी फूंके जा रहे हैं.

40 साल साल से सड़क पर गोवर्धन का गणतंत्र

गोवर्धन तिरंगा बेच रहे बच्चों के इंचार्ज हैं लेकिन लगभग 40 साल से दिल्ली की सड़कों की खाक छानने के बावजूद वे अब तक न खुद को न अपने परिवार को सड़क से ऊपर उठा सके हैं.

'चालीस साल हो गए बहनजी. बच्चा था जब मैं चित्तौड़ से आया था,' वो बताते हैं. गोवर्धन बीड़ी पीते रहते हैं, तिरंगे का ढेर उनके बगल में पड़ा है. गोवर्धन एक नौकरी की तलाश में आए थे ताकी वे अपने परिवार को कुछ पैसे भेजकर मदद कर सके पर आज वे और उनका परिवार एक फ्लाइओवर के नीचे फूल बेचने का काम कर रहा है.

वे थके और भूखे हैं. इस हालत में तिरंगा उनके लिए सिर्फ एक और रात के लिए खाने का जरिया भर है.

'भूख लगी है इसलिए झंडा बेच रहे हैं,' ऐसा कहते हुए गोवर्धन मेरी आंखों में सीधा झांकते हैं

'भूख लगी है इसलिए झंडा बेच रहे हैं,' वो कहते हैं. ऐसा कहते हुए वे मेरी आंखों में सीधे झांकते हैं. वे ऐसी बात कह जाते हैं जो मुझे असहज कर जाती है, आगे कोई सवाल करने से पहले सोचना पड़ता है.

जब मैंने उनसे पूछा क्या तिरंगा, देशभक्ति या भारत का उनके लिए कोई विशेष अर्थ है. गोवर्धन का रूखा सा जवाब मिला, 'हां, शायद पेट के लिए इसके मायने हैं.'

झंडा थोक के भाव में सदर बाजार से लाया जाता है और उन्हें सड़कों पर जिंदगी बिताने वाले बच्चे, महिलाओं, विकलांगों और गोवर्धन जैसे उम्रदराज लोगों के बीच बांट दिया जाता है. इसके बाद असली जद्दोजहद शुरू होती है झंडे बेचने और उससे मुनाफा कमाने की. ये लोग लालबत्ती दर बत्ती, कार दर कार झंडे लिए इस उम्मीद से खटखटाते हैं ताकि उन कारों में बैठे हैसियत वाले लोग झंडे खरीद सकें और अपने भीतर देशभक्ति का भाव महसूस कर सकें.

एक भारतीय होने के नाते उनके लिए देशभक्ति के क्या मायने हैं? इस सवाल पर गोवर्धन कहते हैं, 'हमारे लिए कुछ नही है.'

रंगीन तिरंगा और बदरंग भविष्य

लाली और काली दोनो किशोरवय लड़कियां है जो अजमेर से आई हैं. दोनों नेहरू प्लेस की लालबत्ती पर अपने छोटे भाई की देखभाल भी करती हैं और दिन भर झंडे बेचती रहती है. रात के समय नेहरू प्लेस का फ्लाइओवर इनकी रिहाइश बन जाता है.

तिरंगा उनमें कच्ची उम्र की उमंग भरता है. जब बत्ती हरी हो जाती है, ट्रैफिक चलने लगता है, कोई खरीददार नहीं होता है तब वे झंडे को जोर-जोर से हवा में लहराकर जोश में हंसी ठिठोली करती हैं.

हम जिस देश की भक्ति करते हैं, जिसके विकास और समृद्धि की दुहाई देते हैं, वह उनके लिए कहीं मौजूद ही नहीं है

'हम बहुत आइटम बेचते हैं दीदी,' काली ने गर्व से बताया. 'गुब्बारे वगैरह सब मिलता है यहां.' बीते तीन-चार दिनों से ये लड़कियां सिर्फ तिरंगा बेच रही हैं लेकिन इनमें से सिर्फ एक ने गणतंत्र दिवस के बारे में सुना है.

लाली जो बमुश्किल 16 साल की होगी, शादीशुदा है. वो इस सवाल से शर्मा जाती है और ट्रैफिक की ओर देखने लगती है. 'काफी बिके हैं,' वो बताती है.

जब मैंने उससे पूछा कि लोग ये झंडा क्यों खरीदते हैं, वे इसका क्या करते हैं, उसका जवाब मिला- नहीं पता. काली जो कि लाली की तुलना में कम शर्मीली है, भारत और सरकार के बारे में अपनी राय बताती है. 'कोई कुछ नहीं करता दीदी, बस खुद ही...' इसके बाद उसके मुंह से शब्द गायब हो गए.

लाली, काली और उनका भाई जो कि तस्वीर खिंचवाने के लिए उतावला हो रहा था, एक ऐसा चीज बेच रहे हैं जिसका उनके लिए महत्व नहीं है. ऐसा शायद इसलिए है कि हम जिस देश की भक्ति करते हैं, जिसके विकास और समृद्धि की दुहाई देते हैं, वह उनके लिए कहीं मौजूद ही नहीं है. और उन्हें इन हालात के बदलने की कोई उम्मीद भी नहीं है.

यह पूछने पर कि जब तुम दोनों थोड़ी उम्रदराज हो जाओगी तब क्या करोगी, क्या इसी तरह सड़कों पर जिंदगी बिताओगी. लाली-काली एक दूसरे की ओर देखकर सिर्फ मुस्करा दी. मजबूरी की मुस्कान.

इसके साथ ही मैं भी समझ गई कि अब उनके अपने काम पर लौटने का समय हो गया है. मैं भी वहां से चली आई.

First published: 26 January 2017, 8:43 IST
 
दुर्गा एम सेनगुप्ता @the_bongrel

संवाददाता, कैच न्यूज

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