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बिलकिस बानो को मिले इंसाफ़ का मतलब?

चारू कार्तिकेय | Updated on: 5 May 2017, 9:46 IST

किसी भी रक्त-पिपासु को उस वक़्त कैसा लगा होगा जब उसने साढ़े तीन साल की एक बच्ची को उसकी मां से छीन लिया होगा और ज़मीन पर पटककर उसकी हत्या कर दी होगी? वासना और नफ़रत का यह कैसा संबंध है, जब हत्यारे के साथियों ने उस बच्ची की गर्भवती मां से बलात्कार किया होगा? कानून से नहीं डरने का कितना बड़ा 'यंत्र' उनके पास रहा होगा, जब उसके दूसरे साथियों ने रेप किया होगा और परिवार के एक दर्जन से ज्यादा लोगों की हत्या की होगी?

कानून इस तरह के सवाल नहीं पूछता, लेकिन अगर हम उनके जवाबों की तलाश करते हैं तो हम साल 2002 के गोधरा कांड के बाद हुए संगठित अपराध को समझने के नज़दीक आ सकते हैं. यह कहानी बिलकिस बानो की है. 3 मार्च 2002 को गुजरात के दाहोद जिले के छपरवाड़ गांव में एक टूटी सड़क के किनारे बिलकिस बानो के साथ बलात्कार किया गया था और उन्हें मरा समझकर छोड़ दिया गया था. जब यह घटना घटी थी, उस समय बिलकिस और उनके परिवार के 16 सदस्य दंगाइयों से बचने के लिए आदिवासियों जैसे कपड़े पहनकर अपना गांव छोड़कर कहीं छिपने की जगह की तलाश में जा रहे थे.

बना है विश्वास

मगर आदिवासियों जैसे कपड़े पहनकर अपनी पहचान छिपाने की कोशिश भी उनके किसी काम न आ सकी, क्योंकि कुछ लुटेरे भी उसी गांव के थे जिस गांव की बिलकिस थी. इन लुटेरों ने बिलकिस को पहचान लिया था. बॉम्बे हाईकोर्ट ने जघन्य और क्रूरतम घटना को अंजाम देने वालों की उम्रकैद की सज़ा बरकरार रखते हुए देश की न्यायिक व्यवस्था में लोगों के विश्वास को बनाए रखा है. ट्रायल कोर्ट ने 9 साल पहले इन क्रूर मुजरिमों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी. 

इतना ही नहीं, कोर्ट ने गुजरात पुलिस के एक अधिकारी और एक सरकारी डॉक्टर समेत 5 लोगों को बरी किए जाने के ट्रायल कोर्ट के फैसले को भी पलट दिया है. इन पर सबूतों से छेड़छाड़ का आरोप है. गोधरा कांड के बाद हुई हिंसक वारदातों के 2000 मामलों में बिलकिस बानो मामला दुर्लभ मामलों में से एक है, जिसमें न्याय बहुत धीमी गति से हुआ है लेकिन न्याय का हथौड़ा ज़ोर से पड़ा है. यह लगभग 1,600 मामलों में से एक है जो सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर फिर से खोले गए हैं, उनकी फिर से जांच की गई और दोषियों को सजा दी गई. इसके लिए सुप्रीम कोर्ट को धन्यवाद दिया जाना चाहिए.

यहां यह बात भी ध्यान रखने योग्य है कि अपराधों के पीछे की क्रूरता के अलावा इस मामले को लम्बे समय तक इसलिए भी याद किया जाएगा कि सिस्टम में व्याप्त विभिन्न पहलुओं की ओर किस तरह कदम बढ़ाए गए हैं, ताकि न्याय की प्रबलता और व्यापकता सुनिश्चित हो सके. गुजरात पुलिस ने तो प्रारम्भिक तौर पर सबूतों के अभाव में मामले को ही बंद कर दिया था और जितना सम्भव हो सकता था, अपनी तरफ से उतना मामले को कमजोर ही किया था. यह तो बिलकिस बानो की देन है जब उसने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और सुप्रीम कोर्ट तक गुहार लगाई, तब जाकर सीबीआई को जांच के आदेश दिए गए.

खोदी गई थीं कब्रें

मामला चरम पर तब पहुंचा जब केंद्रीय फॉरेन्सिक विज्ञान प्रयोगशाला (सीएफएसएल) दिल्ली और सीबीआई द्वारा नियुक्त अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के विशेषज्ञों की एक टीम ने पीड़ितों की पहचान करने और मौत के कारणों का पता लगाने के लिए अहमदाबाद में बड़े पैमाने पर कब्रें खोदीं. टीम ने संदिग्ध स्थानों पर तीन दिनों तक लगातार खुदाई की तब जाकर पहली बार गाड़े गए शव की बांह की हड्डी मिली. खुदाई का काम और उसके परीक्षण का काम अगले चार दिन और चलता रहा.

निष्पक्ष सुनवाई के लिए यह मामला गुजरात से बाहर मुम्बई ट्रांसफर किया गया. शुरुआती दौर में नाकाम रहने के बावजूद, सीबीआई ने अभियुक्तों पर चार्जशीट लगाने और उन्हें अदालत से दोषी ठहरवाने का अपना काम बखूबी किया. यह सीबीआई ही थी, जिसने उल्लेखनीय रूप से अदालत में तर्क दिया कि दोषियों के लिए मृत्युदंड की सज़ा से कम कुछ भी नहीं है. सीबीआई ने कहा कि यह " रेयरेस्ट ऑफ रेयर" की अवधारणा पर बिल्कुल फिट बैठने वाला मामला है. सम्भवतः अभियुक्त इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करें, तब फिर एक अन्य कहानी ट्रैक पर आ जाएगी. लेकिन यह मामला इंसाफ पर यकीन को और बुलन्द ही करेगा.

गोधरा दंगों के बाद हुए कई अन्य हिंसक मामले, जो बिलकिस बानो के मामले से अलग हैं, पुलिस और सीबीआई की जांच में जान-बूझकर की गई कोताही के चलते बहुत ही धीमी गति से चल रहे हैं और कमजोर हैं. उन मामलों में उस व्यक्ति पर भी आरोप हैं जो आज भारत के प्रधानमंत्री हैं और उनके डिप्टी पर भी, जो पार्टी के मुखिया हैं. सुप्रीम कोर्ट की निगरानी वाले विशेष जांच दल की भूमिका भी ताकतवर अभियुक्तों को क्लीनचिट देने के चलते विवादों के घेरे में रही है. जो मामले अभी चल रहे हैं, ताकतवर नामों में से एक नाम अभी भी मामलों की सुनवाई के दौरान आ रहा है. आरोपी गवाह के तौर पर अदालत में उन्हें खड़ा करने की मांग करते रहे हैं. 

गोधरा कांड के बाद हुई हिंसा एक कथा है भले ही अलग-अलग व्यक्तिगत मामले क्यों न चल रहे हों. अदालत ने कई मामलों में मजबूती के साथ अपराध का होना साबित किया है और दोषियों को अपराधी ठहराया है, पर एक बात याद रखनी होगी कि पूरी हिंसा नियोजित थी, हिंसा की योजना बनाई गई थी और उसे एक नेटवर्क द्वारा व्यवस्थित और क्रियान्वित किया गया था जिनकी शक्तियों को बाद में कानून की पहुंच से परे भी पाया गया.

First published: 5 May 2017, 9:46 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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