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तरुण सागर पर ददलानी के इस्तीफे से सामने आया केजरीवाल का सच

चारू कार्तिकेय | Updated on: 11 February 2017, 5:45 IST
QUICK PILL
  • जैन मुनि तरुण सागर के हरियाणा विधानसभा में हुए प्रवचन पर विशाली ददलानी के पार्टी से इस्तीफे ने अरविंद केजरीवाल की पोल खोल दी है.
  • केजरीवाल ने ददलानी की आलोचना करने में देर नहीं लगाई लेकिन उन्होंने सागर के पित्तृसत्तात्मक, लोकतंत्र विरोधी और सामंती विचारों पर कुछ नहीं कहा.
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पिछले एक दशक के दौरान लोकसभा की तरफ से आयोजित करीब 30 लेक्चर में इन सभी मुद्दों पर चर्चा हुई. वहीं 26 अगस्त को चंडीगढ़ में आयोजित हरियाणा विधानसभा के सत्र में जैन संत का भाषण हुआ. इस दौरान उनके संकीर्ण विचारों का भी प्रसारण हुआ. फिर विशाल ददलानी के लोकतंत्र का मजाक वाले बयान को लेकर क्या गलत हो गया?

तरुण सागर ने मानसून सत्र के दौरान पहले दिन हरियाणा विधानसभा के सत्र को संबोधित किया. तरुण सागर के लिए जो आसन लगाया गया था वह सदस्यों और विधानसभा स्पीकार के आसन से भी ऊंचा था. जबकि विधानसभा में स्पीकर से बड़ा कोई नहीं होता. 

इतना ही नहीं सागर का उपदेश अपने आप में सामंती, पितृसत्तात्मक और लोकतंत्र विरोधी था. उन्हें सरकार ने बुलाया था और पूरे सदन ने उनके भाषण को बेहद ध्यान से सुना. इस पूरी घटना का मजाक उड़ाने के अलावा और किया ही क्या जा सकता था?

सागर के कुछ विचार बेहद चिंतनीय थे. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसका प्रसारण एक निजी कार्यक्रम में किया ही क्यों गया? न केवल संविधान बल्कि भारत की लोकतांत्रिक भावना के खिलाफ जाते हुए सागर ने राजनीति के ऊपर धर्म को जगह देने का काम किया. इसके साथ ही उन्होंने अपनी बात रखने के लिए स्त्रीविरोधी बयानों का भी सहारा लिया.

केजरीवाल पर ददलानी का वार

आम आदमी पार्टी से जुड़े गायक, संगीत निर्देशक और पार्टी के जोरदार समर्थक रहे ददलानी ने इस कार्यक्रम की तुरंत आलोचना कर डाली. ट्वीट को उन्हें तत्काल दबाव में मिटाना भी पड़ गया क्योंकि उन्होंने इसमें साधु और लोकतंत्र का मजाक जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया था. 

इस ट्वीट का हैशटैग बेहद शानदार था लेकिन उसका इस्तेमाल बेहद सावधानी और चालाकी के साथ किया गया था. आम तौर पर मुख्य धारा के नेता इस तरह के बयानों से दूरी बनाते हैं. भले ही वह इस तरह के कार्यक्रम की आलोचना कर लें लेकिन वह इस तरह के बयानों से दूरी बना लेते हैं. ददलानी को इसके लिए फटकार लगाई जा सकती थी. लेकिन जो हुआ वह चौंकाने वाला था. 

आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल ने कहा, 'तरुण सागर जी महाराज बेहद प्रतिष्ठित संत हैं और जिन्होंने उनका अनादर किया है, वह दुर्भाग्यपूर्ण है और इसे रोका जाना चाहिए.'

केजरीवाल यही नहीं रुके. उन्होंने यह कहने में देर नहीं लगाई कि वह सागर को निजी तौर पर जानते हैं और उनका परिवार टीवी पर उनके भाषण को नियमित तौर पर सुनता है. 

हालांकि इस जानकारी की कोई जरूरत नहीं थी. क्या केजरीवाल वाकई में सागर के इस विचार का सम्मान करतेे हैं कि ''धर्म पति हैं और राजनीति पत्नी.'' या फिर वह इस विचार से सहमत हैं, 'राजनीति को नियंत्रित करने के लिए धर्म का जरूरी है. या फिर यह कि पत्नी का यह कर्तव्य होता है कि वह पति के अनुशासन का पालन करे.' क्या वह सागर के इस बयान का समर्थन करते हैं, 'एक बार गलती करे वो अज्ञान, दो बार नादान, तीन बार शैतान और जो बार-बार गलती करे वह पाकिस्तान.'

क्या केजरीवाल सागर के विचारों का समर्थन करते हैं?

हम नहीं जानते कि दिल्ली के मुख्यमंत्री जैन मुनि के भाषण को लेकर क्या महसूस करते हैं क्योंकि उन्होंने हमें इस बारे में कुछ नहीं बताया. उन्होंने इस बारे में कोई बयान नहीं दिया कि कोई धार्मिक गुरू विधानसभा के भीतर राजनीतिक प्रवचन क्यों दे रहा था? क्यों उन्होंने ददलानी के बयान पर ही प्रतिक्रिया दी?

उन्होंने विधानसभा में एक संत द्वारा दिए गए धार्मिक भाषण के बारे में क्यों नहीं बोला? उन्होंने यह साफ संदेश दिया कि संत का मजाक नहीं बनाया जाना चाहिए.

सागर पर केजरीवाल के बयान से कुछ चीजें साफ हो जाती हैं.

आप के मुखिया अरविंद केजरीवाल हरियाणा के मुख्यमंत्री और उन विधायकों से बिलकुल भी अलग नहीं है जिन्होंने सागर के भाषण को तल्लीनतापूर्वक सुना. दूसरा उन्होंने अपना निजी धार्मिक मत राजनीति में मिलाने से बिलकुल भी परहेज नहीं है. तीसरा वह अपनी पार्टी के सभी सदस्यों से अपने मत का समर्थन चाहते हैं और अगर कोई ऐसा नहीं करता है तो वह उसे चुप करा सकते हैं.

ददलानी का चरित्र कड़े रवे का है लेकिन उन्होंन इस बार आत्मसमर्पण करते हुए न केवल माफी मांगी बल्कि राजनीति भी छोड़ दिया. उन्होंने कहा कि उनकी समस्या राजनीति में धर्म को लेकर थी. 

उन्होंने इसके बाद कई ट्वीट किए.

अब किसी को आश्चर्य हो सकता है कि केजरीवाल इन ट्वीट्स पर क्या प्रतिक्रिया देंगे. ददलानी आप के कट्टर समर्थक थे और उन्होंनें पांच साल केजरीवाल गाना लिखा था जो 2015 के विधानसभा चुनाव में पार्टी की ऐतिहासिक जीत का सबब बना. ददलानी का जाना आप के लिए नुकसान है लेकिन उससे भी बड़ा नुकसान इस विचार का सामने आना है कि राजनीति और धर्म के मिलावट को लेकर केजरीवाल को कोई आपत्ति नहीं है. 

First published: 30 August 2016, 2:23 IST
 
चारू कार्तिकेय @charukeya

असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़, राजनीतिक पत्रकारिता में एक दशक लंबा अनुभव. इस दौरान छह साल तक लोकसभा टीवी के लिए संसद और सांसदों को कवर किया. दूरदर्शन में तीन साल तक बतौर एंकर काम किया.

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