Home » इंडिया » when india free to manual scavenging
 

देश भर में तिरंगा उठाए हाथों के बीच एक सवाल, देश को मैला उठाए हाथों से मुक्ति कब मिलेगी?

सुभाष गाताडे | Updated on: 9 August 2016, 10:47 IST
(सुलभ इंटरनेशनल )

देश की राजधानी में हाथ से मैला उठानेवालों की तादाद हजारों में है. शायद बहुत कम लोग इस ख़बर पर आसानी से यकीन करेंगे कि 21वीं सदी की दूसरी दहाई के उत्तरार्द्ध में दिल्ली में ही हजारों लोग, जिनमें एक पोस्टग्रेजुएट भी शामिल है, हाथ से मैला उठाने के काम में मुब्तिला है.

दिल्ली का हाईकोर्ट खुद भी यह सुनकर ‘विचलित और बेचैन थी’’ जब उसके सामने ‘दिल्ली स्टेट लीगल सर्विसेस आथारिटी’ ने अपनी रिपोर्ट पेश की जिसमें इस संबंध में विवरण शामिल थे.

दरअसल अदालत ‘नेशनल कैम्पेन फार डिग्निटी एण्ड राइटस आफ सीवरेज वर्कर्स द्वारा वर्ष 2007 में दायर याचिका पर विचार कर रही थी, जिसमें मैला उठानेवाले लोगों के लिए पुनर्वास की मांग की गयी थी.

अदालत के सामने प्रस्तुत विवरण इस बात को उजागर कर रहे थे कि हजारों लोग दिल्ली जल बोर्ड, म्युनिसिपल कार्पोरेशन, रेलवे और अन्य ठेकेदारों के लिए मैला उठाने के काम में स्वच्छकार के तौर पर सक्रिय थे.

गौरतलब है कि कुछ वक्त़ पहले इन्हीं महकमों ने शपथ लेकर अदालत को बताया था कि उनके यहां राजधानी में हाथ से मैला उठानेवाला कोई व्यक्ति तैनात नहीं है. फिलहाल अन्दाज़ा नहीं लगाया जा सकता कि अदालत को गुमराह करने के लिए माननीय न्यायाधीश इन विभागों के खिलाफ कोई कार्रवाई करते हैं या नहीं?

पढ़ें: बेजवाड़ा विल्सन ने कहा मेरा पुरस्कार उनको, जिन्होंने रोजी-रोटी के ऊपर स्वाभिमान को तवज्जो दी

बात जो भी हो जमीनी हालात और सरकारी महकमों द्वारा किए जा रहे औपचारिक दावों के बीच अन्तराल को अपवाद नहीं कहा जा सकता. इस बात को मददेनज़र रखते हुए कि हाथ से मल उठाने के बारे में स्वीकारोक्ति एक तरह से सरकार द्वारा उनके पुनर्वास के वायदों को मिली असफलता का ‘प्रमाण’ होगी.

सूखे संडासों की संख्या और उसके लिए तैनात स्वच्छकारों/मैला उठानेवालों की संख्या के बीच के गहरा अन्तर है

जिसने केन्द्रीय स्तर पर हाथ से मैला प्रथा के उन्मूलन के लिए दो कानून बनाए हैं और उसके द्वारा बनायी गयी विभिन्न कमेटियों ने इस मसले पर उसे सिफारिशें सौंपी हैं. हम इसे आम परिपाटी ही कह सकते हैं.

अभी हाल में ही जब अनुसूचित जातियों के राष्ट्रीय आयोग के सामने विभिन्न राज्य सरकारों के वरिष्ठ अधिकारियों की एक समीक्षा बैठक हुई तब वहां प्रस्तुत आंकड़ें भी सूखे संडासों की संख्या और उसके लिए तैनात स्वच्छकारों/मैला उठानेवालों की संख्या के बीच के गहरे अन्तर को उजागर कर रहे थे, जिसके चलते यह प्रश्न भी उठा कि ‘क्या देश भर के हजारों सूखे संडास खुद अपने आप सफाई करते हैं क्या?’

देश के एक अग्रणी अख़बार में इस संदर्भ में प्रकाशित रिपोर्ट ने इस मसले पर और रौशनी डाली थी:

मिसाल के तौर पर तेलंगाना ने बताया कि 31 दिसम्बर 2015 को उसके यहां 1,57,321 सूखे संडास थे जबकि हाथ से मल उठाने में एक भी सक्रिय नहीं था.

हिमाचल प्रदेश द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट ने भी बताया था कि उसके यहां 854 सूखे संडास है जबकि एक भी स्वच्छकार नहीं है. छत्तीसगढ़ ने रिपोर्ट किया कि उसके यहां 4,391 सूखे संडास हैं, मगर महज तीन लोग सफाई के काम में लगे हैं.

इसी तरह कर्नाटक ने 24,468 सूखे संडासों का विवरण दिया जबकि महज 302 मैला उठानेवालों की संख्या बतायी और मध्यप्रदेश का आंकड़े था 39,962 सूखे संडास और महज 11 मैला उठानेवाले.

यह अलग बात है कि जितनी कोशिशें सरकार या उसकी एजेंसियों की तरफ से इस प्रथा को भुला दिए जाने में लगती हैं दलितो के खिलाफ होने वाली घटनाएं इसके व्यापक प्रादुर्भाव को बार-बार रेखांकित करती हैं. इसमें काम करने वाले 99 फीसदी लोग दलित तबके से संबंधित हैं, उनमें भी 95 फीसदी महिलाएं हैं, जो ‘इस बात को प्रतिबिंबित करता है कि जाति, पित्रसत्ता और अस्पृश्यता का बहुस्तरीय उत्पीड़न इन तबकों पर अभी भी कहर बरपा रहा है.

अगर हम मैला उठाने की प्रथा के खिलाफ लम्बे समय से मुहिम में लगे बेजवाड़ा विल्सन को मिले रेमन मैगसेसे अवार्ड को देखें या 125 दिन की यात्रा पूरी करके 14 अप्रैल को दिल्ली पहुंची सफाई कर्मचारी आन्दोलन की अगुआई में निकली ‘भीम यात्रा’, जिसने इस दौरान 30 राज्यों और 500 जिलों को पार किया, को देखें जिसका विशेष फोकस सीवर एवं सैप्टिक टैंकों में होने वाली मौतों पर था, जिसका प्रमुख नारा था ‘सूखे संडासों, सीवर और सैप्टिक टैकों में हमें मारना बन्द कर दो.’ या राज्यसभा में सत्ताधारी पार्टी से जुड़े एक सांसद ने ‘सफाई कर्मचारियों पर बने राष्ट्रीय आयोग के हवाले से शून्यकाल में संसद को दी गयी सूचना को देखें कि हर साल देश के अलग अलग हिस्सों में 22,000 से अधिक लोग सीवर सफाई के दौरान मर रहे है.’

यही देखने में आता है कि समस्या कितनी विकराल है. प्रश्न उठता है कि आखिर हाथ से मैला उठाने का काम आज भी क्यों जारी है जबकि टेक्नोलोजी में जबरदस्त प्रगति हुई है और भौतिक संपन्नता भी बढ़ी है?

क्या इसकी वजह यह है कि ‘पानी की आपूर्तिवाले संडासों की कमी है’ जैसा कि योजना विभाग ने कुछ समय पहले कहा था इसके गहरे कारण हैं.

पढ़ें: भारत के टीएम कृष्णा और बेजवाड़ा विल्सन को मिलेगा मैग्सेसे अवॉर्ड

अगर हम अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन द्वारा वर्ष 2015 में जारी ‘रिसोर्स हैण्डबुक टू एन्ड मैन्युअल स्केवेजिंग’ को देखें तो वह मानता है कि मैला उठाने की प्रथा इस वजह से जारी है क्योंकि-

  • शुद्धता और प्रदूषण को लेकर जाति संबंधी सांस्कृतिक धारणाएं बनी हुई हैं और लांछनास्पद कहे गए कामों का जन्म आधारित आवंटन आज भी जारी है.
  • जेण्डर भेदभाव से संलिप्त जातिगत विषमताएं, क्योंकि अधिकतर सूखे संडासों की सफाई का काम महिलाएं करती हैं, अभी भी बरकरार हैं
  • हाथ से मैला उठाने की प्रथा की रोकथाम एवं ऐसे स्वच्छकारों के पुनर्वास के लिए बनी योजनाओं पर अमल के मामले में देश भर की राज्य सरकारों की बेरूखी और असफलता बार-बार उजागर होती है
  • जातिगत भेदभाव की समाप्ति के प्रति लोगों में गंभीरता की कमी और दंडविहीनता की संस्कृति का बोलबाला तथा राज्य की जवाबदेही की कमी, जिसके चलते उनका आज भी जारी रहना एक हकीकत है.

जैसा कि हम पहले ही उल्लेख कर चुके हैं, ऐसा नहीं है कि इस प्रथा की समाप्ति के लिए संसद या कार्यपालिका के स्तर पर कोशिशें नहीं चलीं मगर वह पूरे मन से नहीं की गयी और उनके प्रति शासकजमातों की बेरूखी पहले से स्पष्ट थी.

संसद या कार्यपालिका के स्तर पर कोशिशें चलीं मगर उनके प्रति शासकजमातों की बेरुखी स्पष्ट थी

अगर हम आज़ादी के तत्काल बाद महाराष्ट्र सरकार द्वारा बनायी गयी बर्वे कमेटी की रिपोर्ट को देखें (1948), तो उसकी जिसकी सिफारिशों को केन्द्र सरकार ने भी स्वीकारा था और उसके बाद बनी मलकानी कमेटी की रिपोर्ट को पलटें या इसी किस्म के अन्य नीतिगत हस्तक्षेपों या विधायी कार्रवाइयों को देखें, जिसमें केन्द्र सरकार द्वारा 1993 में तथा 2013 में बने कानूनों को शामिल कर सकते हैं. इन कवायदों से यही समझ में आता है कि ऐसे कदमों की कोई कमी नहीं रही है. मगर कुल मिला कर वहीं कदमताल होता रहा है.

अगर हम 1993 मे बने ‘एम्प्लायमेण्ट आफ मेन्युअल स्केवेंजर्स एण्ड कन्स्ट्रक्शन आफ ड्राइ लैटरिन्स/प्रोहिबिशन/अधिनियम-1993 को देखें तो पता चलता है कि इस अधिनियम को महज नोटिफाई करने में चार साल लग गए, जब उसे भारत सरकार के गैजेट में दर्ज किया गया.

प्रस्तुत कानून को बने बीस साल हुए मगर इस अन्तराल में न कभी किसी सरकारी अधिकारी और न ही किसी कम्पनी या फर्म को इसके लिए सजा दी गयी कि उनके मातहत यह प्रथा क्यों बेरोकटोक चल रही है.

पढ़ें: भारत दलित न होता, तो भी ऐसे ही मारा जाता क्या?

गोया इस अधिनियम की विफलता को ही रेखांकित करने के लिए सरकार ने एक नया कानून सितम्बर, 2013 में बनाया जिसे ‘द प्रोहिबिशन आफ एम्प्लायमेण्ट एज मैन्युअल स्केवेंजर्स एण्ड देअर रिहैबिलिटेशन एक्ट-2013’ के तौर पर संबोधित किया गया और उसके लिए सरकारी नोटीफिकेशन भी जारी किया गया.

इस बात पर जोर दिया जाना जरूरी है कि स्थानीय और रेलवे अधिकारियों को इसके प्रावधानों से बचाने के लिए पहले से ही एक रास्ता कानून में ही दिया गया, जो हाथ से मैला उठानेवालों को अपने काम में तैनात करते रहे हैं.

निःसन्देह हाथ से मैला उठाने की प्रथा का राष्ट्रीय राजधानी से लेकर सुदूर गांव तक आज भी व्यापक प्रादुर्भाव है. जबकि 2014 में मोदी सरकार द्वारा बड़े गाजेबाजे के साथ शुरू किए गए स्वच्छ भारत अभियान की दूसरी सालगिरह जल्द ही मनायी जाएगी. यह काफी विरोधाभासी प्रतीत होता है.

क्या यह कहना वाजिब होगा कि इसका प्रादुर्भाव सामयिक है और जैसे-जैसे अभियान आगे बढ़ेगा वह समाप्त होगा? या यह स्थिति इस बात को खुले तौर पर स्वीकारते हुए कि समूचे अभियान की रूपरेखा में कुछ गंभीर खामियां हैं लिहाजा उसमें अधबीच में बदलाव की मांग करती है.

सुनने में आया है कि सरकार ने काफी पहले से स्वच्छ भारत अभियान की दूसरी सालगिरह को लेकर तैयारियां शुरू की है. यहां तक कि उसने विभिनन सरकारी महकमों को निर्देश दिया है कि अभियान की शुरूआत में उन लोगों ने जो प्रतिज्ञा ली थी, उसे फिर दोहराएं, ताकि सुस्त पड़ रहे अभियान में नयी गति पैदा की जा सके.

विश्व बैंक में सक्रिय रहे एक विशेषज्ञ को, जिन्होंने जल एवं सैनिटेशन के क्षेत्रा में काम किया है, सरकार ने अपनी इस योजना की देखरेख के लिए विशेष तौर पर नियुक्त किया है और सेवा करों के मद में उसने स्वच्छ भारत सेस लगा कर इस योजना के लिए धन संग्रहीत करने की रूपरेखा तैयार की है.

दरअसल यह एहसास करने की जरूरत है कि धनसंग्रहण, बेहतर प्रबंधन, गतिशीलता जैसी बातें अभियान जैसे चल रहा है, उसमें नयी हरकत अवश्य पैदा कर सकती है, मगर उसमें कोई गुणात्मक बदलाव नहीं ला सकती.

पढ़ें: व्यंग्य: दलितों, मुस्लिमों के बाद गोभक्तों के निशाने पर शेर!

शायद अब वक्त आ गया है कि जाति के आधार पर बंटे भारतीय समाज में हम ऊंच-नीच में जातियों की स्थिति, एवं निम्न कही गयी जातियों के साथ सदियों से नत्थी स्वच्छता संबंधी कामों की लम्बी चौड़ी सूची, और उसे मिली सामाजिक वैधता को समझें और एक सामाजिक समस्या के तकनीकी समाधान को ढंूढने में न जुट जाएं.

नीतिनिर्माताओं को चाहिए कि वह आलोचकों के इस नज़रिये पर भी गौर करें कि भारत को ‘स्वच्छ’ बनाने की तमाम कोशिशें मोटा मोटी जाति के ‘पेशागत’ दायरे तक फोकस रही हैं और कोशिशें इसी बात की हुई है कि व्यक्ति को सुधारा जाए या उसे कुछ तकनीकी उपकरण प्रदान किया जाए और जाति को वैसे ही बरकरार रखा जाए. क्या इस दिशा में नयी जमीन तोड़ने का आगाज़ किया जा सकता है?

शायद अब वक्त आ गया है कि संविधान का मसविदा बनाने की कमेटी के चेयरमैन डाक्टर आंबेडकर की हक़ीकतबयानी को देखें और भविष्य के कामों की रूपरेखा तैयार करें.

डा अम्बेडकर ने लिखा था:

‘हिन्दू सामाजिक व्यवस्था श्रम विभाजन पर टिकी है जो हिन्दुओं के लिए स्वच्छ एवं सम्मानजनक नौकरियों को आरक्षित करती है और अछूत कहे गए लोगों के लिए गंदे एवं हल्के काम देती है. इस तरह वह हिन्दुओं को प्रतिष्ठा से लाद देती है और अछूतों को गुमनामी में ढकेलती है.'

आज़ादी की सत्तरवीं सालगिरह जल्द ही मनायी जाएगी. मालूम चला है कि लोगों में राष्ट्रभक्ति की भावना को भरने के लिए सरकार की तरफ से तिरंगा यात्रा का भी आयोजन होने वाला है. देश भर में उठे इन तिरंगों के बीच क्या हम अपने आप से यह पूछने का साहस करेंगे कि आखिर हाथ से मैला उठाने वालों के लिए खुली हवा में सांस लेने का मौका कब आएगा?

First published: 9 August 2016, 10:47 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी