Home » इंडिया » When rahul gandhi and varun gandhi came to support each other
 

हाथ के पंजे पर मुहर लगाकर वरुण गांधी को विजयी बनाएं!!!

अतुल चौरसिया | Updated on: 4 May 2016, 22:47 IST
QUICK PILL
  • पिछले एक हफ्ते के दौरान गांधी परिवार के दो वारिसों राहुल और वरुण गांधी के बीच दिखी सहजता और नजदीकी कुछ नए समीकरणों की तरफ संकेत कर रही है.

शीर्षक से पाठक चौंक सकते हैं. यह एक कल्पना और कुछ हालिया उत्पन्न परिस्थितियों को मिलाकर पैदा हुआ आकलन है. लेकिन राजनीति हमेशा से ही नई-नई संभावनाओं का खेल रही है. यहां संभावनाएं कभी खत्म नहीं होती.

यूं भी अंग्रेजी में एक कहावत है "ब्लड इज़ थिकर दैन वाटर" यानी खून के रिश्ते बहुत मजबूत होते हैं. लिहाजा किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले एक बार सरसरी तौर पर इस स्टोरी पर नजर जरूर डाल लें. तो सबसे पहले उन तीन बिंदुओं की बात कर लेते हैं जिनके आधार पर इस कहानी के भ्रूण विकसित हुए.

1- 28 अप्रैल को विदेश मामलों की स्थायी संसदीय समिति की बैठक संसद भवन में चल रही थी जिसके अध्यक्ष शशि थरूर हैं. राहुल गांधी और वरुण गांधी भी इसके सदस्य हैं. दोनो भाई पहली बार इस बैठक में हिस्सा लेने पहुंचे और करीब डेढ़ घंटे तक बैठे रहे. इस दौरान दोनों भाइयों के बीच जिस तरह का सौहार्द और सहजता दिखी वह पूरे दिन बाकी नेताओं के बीच चर्चा का विषय बनी रही.

2004 में जब वरुण भाजपा से जुड़े थे तब यह चर्चा जोरों पर थी कि राहुल ने उन्हें कांग्रेस ज्वाइन करने का निमंत्रण दे रखा था

राहुल ने एनआरआई से शादी करने वाली महिलाओं को बाद में किसी तरह के संकट में पड़ने पर कानूनी सहायता सरकार द्वारा मुहैया करवाने का सुझाव दिया. इसे तपाक से वरुण गांधी का समर्थन हासिल हुआ. करीब डेढ़ घंटे तक बैठक में मौजूद रह कर दोनों एक दूसरे के सुझावों का समर्थन करते दिखे.

2- तीन मई को मंगलवार का दिन एक बार फिर से बंटे हुए परिवार के बीच मधुर होते संबंधों का गवाह बना. वरुण गांधी ने प्रश्नकाल में पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर से सवाल पूछा कि क्या सरकार ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और दक्षिण अफ्रीका की तर्ज पर वेटलैंड के संरक्षण की दिशा में कोई वैज्ञानिक तकनीकी का आयात करने जा रही है. इस सवाल के जवाब से वरुण गांधी संतुष्ट नहीं थे. तब पीछे से विपक्ष में बैठी उनकी बड़ी मां सोनिया गांधी ने वरुण के पक्ष मेें अवाज उठाई. हाथ हवा में लहरा कर उन्होंने प्रकाश जावड़ेकर से कहा "जवाब दो". सोनिया अंत तक जावड़ेकर के जवाब से संतुष्ट नही हुईं.

3- कुछ दिन पहले ही सुल्तानपुर संसदीय सीट से लोकसभा सांसद वरुण गांधी ने इलाहाबाद की यात्रा की है. इलाहाबाद गांधी-नेहरू परिवार का पैतृक नगर रहा है. यहां हुई तमाम सभाओं में स्थानीय भाजपा संगठन को दूर रखते हुए वरुण गांधी ने अपने समर्थकों की मदद से खुद ही तमाम आयोजन संचालित किए. मेजा में भाजपा जिलाध्यक्ष रामरक्षा द्विवेदी का पुतला भी वरुण समर्थकों ने फूंका. हर जगह वरुण गांधी को मुख्यमंत्री बनाने के नारे गूंजते रहे.

प्रशांत किशोर: न तो उत्तर प्रदेश, 'बिहार-गुजरात' है न ही कांग्रेस यहां 'जदयू-भाजपा' है

अब कहा जा रहा है कि उनके संपूर्ण इलाहाबाद प्रवास की रिपोर्ट केंद्रीय नेतृत्व को भेजी जा रही है. इसमें उनके भाषण, कार्यक्रम आदि कि वीडियो रिकॉर्डिंग, मीडिया रिपोर्ट आदि शामिल है. जिलाध्यक्ष रामरक्षा द्विवेदी का बयान आया है कि वरुण का कार्यक्रम पार्टी का नहीं था, इसलिए वे इसमें शामिल नहीं हुए. कहा जा रहा है कि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व उनके दौरों-कार्यक्रमों पर पैनी निगाह रख रहा है.

कार्यक्रम में मौजूद लोगों के मुताबिक वरुण गांधी ने अपने भाषणों में एक बार भी न तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम लिया, न ही उनकी नीतियों की तारीफ या जिक्र किया. हाल के दो सालों में किसी भाजपा नेता ने ऐसा नहीं किया है.

इन तीनों घटनाओं के आधार पर कुछ निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं. क्या वरुण गांधी और भाजपा के बीच रिश्तों में किसी तरह की तल्खी आ चुकी है? क्या वरुण स्वयं भाजपा से अलग जाने की सोच रहे हैं? क्या कांग्रेस उन्हें अपने साथ जोड़ने की सोच रही है? और अगर कांग्रेस उन्हें अपने साथ लाने की सोच रही है तो उसके पास वरुण को देने के लिए क्या है?

पहले बात वरुण-राहुल मिलन की संभावना और फायदों की

आज कांग्रेस पार्टी की जो हालत है उसमें वरुण गांधी जैसे तेज तर्रार व्यक्तित्व वाले नेता के लिए पाने को बहुत कुछ है. नेतृत्व के स्तर पर खोखलापन और चमत्कारिक नायकत्व का जो अभाव है कांग्रेस में, वरुण गांधी उस खाई को कम से कम उत्तर प्रदेश में काफी हद तक पाट सकते हैं.

उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर वरुण गांधी की कांग्रेस में एंट्री उसकी कई बीमारियों की अकेली औषधि बन सकती है. कुछ दिन पहले प्रशांत किशोर ने कांग्रेस के कायाकल्प का जो रोडमैप कांग्रेस नेतृत्व के सामने रखा था उसमें मुख्य रूप से गांधी परिवार का कोई सदस्य उन्हें उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में निर्णायक भूमिका में चाहिए.

आज कांग्रेस पार्टी की जो हालत है उसमें वरुण गांधी जैसे तेज तर्रार व्यक्तित्व वाले नेता के लिए पाने को बहुत कुछ है

पीके की योजनाओं में पार्टी का एक ब्राह्मण चेहरा सामने होना भी एक अनिवार्यता है क्योंकि 13% वोटबैंक एक समय में कांग्रेस की स्थायी पूंजी रहा है.

गांधी परिवार की प्रतिष्ठा और विरासत के मद्देनजर इस बात की संभावना कम ही है कि राहुल या प्रियंका में कोई उत्तर प्रदेश का चेहरा बनकर क्षेत्रीय राजनीति में उतरेगा. राहुल और सोनिया के लिए यह व्यक्तिगत अहं को ठेस पहुंचने का मसला भी हो सकता है. इसके विपरीत अगर हम वरुण के लिहाज से सोचे तो वह प्रशांत की सारी अनिवर्यताओं को पूरा कर सकते हैं. वे गांधी हैं, ब्राह्मण हैं और साथ में उनके साथ नायकत्व वाला आकर्षण भी जुड़ा हुआ है.

लिहाजा अगर कांग्रेस पार्टी उन्हें उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर पेश करती है तो यह राहुल और वरुण दोनों के लिए फायदे का सौदा हो सकता है. सालों से मरणासन्न अवस्था में पहुंच चुकी उत्तर प्रदेश कांग्रेस को जिलाने का अच्छा जरिया बन सकते हैं वरुण गांधी.

उत्तर प्रदेश: छोटे दलों को साधकर मोदी को साधेंगे नीतीश कुमार

अगर भाजपा में उनकी स्थिति के मद्देनजर विचार करें तो यह किसी तरह से उनके अहं का मसला भी नहीं है. फिलहाल जिस भाजपा में वरुण हैं वहां उन्हें कोई खास तवज्जो नहीं मिली है. जिस तरह से भाजपा का चाल-चेहरा पिछले दो सालों में बदला है उसे देखते हुए आने वाले समय में वरुण को कुछ मिलने की संभावना भी क्षीण ही है.

उत्तर प्रदेश की स्थिति किसी बड़े देश सरीखी है. इसकी राजनैतिक हैसियत ऐसी है जिसे नजरअंदाज कर पाना किसी भी केंद्रीय सरकार के लिए नामुमकिन होता है. लिहाजा वरुण गांधी के लिए भी उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री फायदे का सौदा है.

अब अड़चनें

संभावनाएं तो बहुत हैं पर अड़चनें कम नहीं हैं. सबसे बड़ी समस्या तो वरुण गांधी के घर में है. उनकी मां मेनका गांधी मौजूदा भाजपा सरकार में महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय की मंत्री हैं. लिहाजा वरुण गांधी की राजनैतिक प्रतिबद्धता में किसी भी तरह की हेरफेर का असर उनके राजनैतिक जीवन पर भी पड़ेगा.

खुद मेनका गांधी कितना वरुण को छूट देंगी यह भी बड़ा सवाल है क्योंकि मेनका और सोनिया गांधी के बीच अनबन की कहानियां दिल्ली की हाई सोसाइटी सर्कल में किंवदंति सरीखी हो चली हैं. कहा जाता है कि सोनिया से अनबन के चलते ही इंदिरा गांधी ने मेनका को अपने घर से बाहर निकाला था.

वरुण अगर कांग्रेस से जुड़ते हैं तो यह राजनैतिक सहजीवन का अच्छा उदाहरण बन सकता है

2004 के लोकसभा चुनाव से पहले जब वरुण गांधी भाजपा से जुड़े थे तब भी यह चर्चा जोरों पर थी कि राहुल गांधी ने उन्हें कांग्रेस ज्वाइन करने का खुला निमंत्रण दे रखा था, लेकिन मां मेनका गांधी के कारण उन्होंने भाजपा को तरजीह दी.

तब जो वरुण गांधी अपनी मां से इतर नहीं जा सके वो अब क्या इतना बड़ा फैसला ले सकेंगे. क्या सोनिया-मेनका के बीच रिश्ते अतीत की काली छाया से मुक्त होकर आगे बढ़ पाएंगे. ये सब सवाल भी मौजूद हैं.

पढ़ेंः क्या उत्तर प्रदेश में प्रशांत किशोर को मिलेगा प्रियंका गांधी का साथ?

एक सच यह भी है कि देवरान-जेठान के बीच रिश्ते को दोनों परिवारों के बच्चों ने कभी अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया. प्रियंका, राहुल और वरुण के बीच में आज भी अच्छे रिश्ते हैं, इनका आपस में मिलना-जुलना निरंतर होता रहता है.

वरुण अगर कांग्रेस से जुड़ते हैं तो यह राजनैतिक सहजीवन का अच्छा उदाहरण बन सकता है. वरुण उत्तर प्रदेश कांग्रेस के लिए जरूरी ऊर्वरक बन सकते हैं और कांग्रेस उन्हें उत्तर प्रदेश में वह सब दे सकती है जो भाजपा में उन्हें निकट भविष्य में हासिल होने से रहा.

ध्यान रहे, यह एक कल्पना है जिसका डिसक्लेमर शुरुआत में दिया जा चुका है.

First published: 4 May 2016, 22:47 IST
 
अतुल चौरसिया @beechbazar

एडिटर, कैच हिंदी, इससे पूर्व प्रतिष्ठित पत्रिका तहलका हिंदी के संपादक के तौर पर काम किया

पिछली कहानी
अगली कहानी