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न्याय के मंदिर से लापता न्यायमूर्ति

सौरव दत्ता | Updated on: 10 August 2016, 12:24 IST
(कैच न्यूज)

न्याय हर भारतीय नागरिक का मूलभूत अधिकार है लेकिन हालिया आंकड़ों पर गौर करें तो पाएंगे कि देश के हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में न्यायधीशों की कमी के चलते लोगों को न्याय मिलना मुश्किल हो गया है.

ये आंकड़े चौंकाने वाले हैं. सुप्रीम कोर्ट में जजों की स्वीकृत संख्या 31 है लेकिन वर्तमान में यहां केवल 28 जज ही नियुक्त हैं.

न्यायिक नियुक्तियों को लेकर सरकार और न्यायपालिका के बीच जारी गतिरोध के चलते ये सारी नियुक्तियां अटकी हुई हैं.

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भारत की एक बड़ी अदालत इलाहबाद हाईकोर्ट (जजों की संख्या के लिहाज से) में 160 रिक्तियों के बदले पीठासीन जजों की संख्या मात्र 82 है, यानी आवश्यकता के आधे के करीब.

उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर पूर्वोत्तर की प्रत्येक अपीलीय अदालत में एक जज की आवश्यकता है. आंकड़ों से पता चलता है कि न्यायपालिका की हालत जीर्ण-शीर्ण है.

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सरकारी रिकाॅर्ड के अनुसार देश की सारी अदालतों में कमोबेश यही हाल है. जजों की नियुक्ति के अभाव में खाली पड़ी सीटों के चलते न्याय मिलने की प्रक्रिया बुरी तरह से प्रभावित होती है.

जजों की पर्याप्त संख्या न होने के कारण मामलों के निपटारे की दर भी प्रभावित होती है. आखिर, एक जज एक दिन में कितने मामलों की सुनवाई कर सकता है. इस प्रकार इन परिस्थितियों में कोई जज कैसे न्याय दे सकता है.

एक लीगल रिसर्च थिंक टैंक 'दक्ष इंडिया' द्वारा जून 2016 में किए गए एक अध्ययन के अनुसार, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जजों की रिक्तियों की संख्या ही न्याय मिलने में हो रही देरी का वास्तविक कारण है.

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इसलिए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 224-ए के अनुसार, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में अस्थाई तौर पर ऐसे न्यायाधीशों की नियुक्ति की जा सकती है, जो अनुबंध की आयु पार कर चुके हों.

इसी साल मई में देश के चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर जजों की नियुक्ति पर सरकार की ओर से बरती जा रही ढिलाई पर आंसू बहाते देखे गए. ठाकुर ने देश के हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति प्रक्रिया पर ही आपत्ति जताई.

उच्च न्यायालय में होने वाली स्थाई नियुक्तियों की पुष्टि से पहले गुप्तचर ब्यूरो से उसकी जांच करवाई जाए

उन्होंने पहली आपत्ति इस बात पर जताई कि जजों की नियुक्ति पर मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था के तहत जो निगरानी रखी जा रही है, वह बेहद चिंतनीय है.

सुप्रीम कोर्ट ने शीर्ष न्यायालयों में जजों की नियुक्ति के लिए एक प्रपत्र तैयार करने की अनुमति दे दी है लेकिन इस ‘सरकारी निगरानी’ की वजह से वह पीछे हट गई.

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सरकारी व कई अन्य संगठन दावे करते रहे हैं कि न्यायिक नियुक्तियों की इस समस्या से जनता को न्याय मिलने में देरी हो रही है. इसके अलावा सरकार ने एक और कड़ी निगरानी की व्यवस्था यह कर दी कि उच्च न्यायालय में होने वाली स्थाई नियुक्तियों की पुष्टि से पहले गुप्तचर ब्यूरो से उसकी जांच करवाई जाए.

क्या यही वास्तविक वजह है?

आखिरकार न्याय कोई आंकड़ों का खेल नहीं है. यह बहुत ही संवेदनशील मुद्दा है. देरी से मिला न्याय, न्याय नहीं है, लेकिन क्या जजों की संख्या बढाए जाने पर विचार किया जा सकता है?

सवाल का जवाब मिलना अभी बाकी है, जबकि लोग न्याय के लिए मारे-मारे फिर रहे हैं.

First published: 10 August 2016, 12:24 IST
 
सौरव दत्ता @SauravDatta29

Saurav Datta works in the fields of media law and criminal justice reform in Mumbai and Delhi.

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