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समलैंगिकता: ओरलैंडो के बहाने एक दकियानूस कानून की बात होनी चाहिए

मोनोबिना गुप्ता | Updated on: 15 June 2016, 8:24 IST
(गेट्टी)

अमेरिका के ऑरलैंडो स्थित एक समलैंगिक क्लब में हुई सामूहिक हत्या की भारत में काफी निंदा हुई. भारतीय पीएम नरेंद्र मोदी ने ट्वीटर पर मारे गए लोगों के प्रति संवेदना व्यक्त की. हालांकि खुद भारत में समलैंगिक यौन संबंध कानूनन अपराध माने जाते हैं. भारतीय राजनीतिक वर्ग इसे अपराध बनाने वाली दकियानूसी धारा 377 को रद्द करने से लगातार बचता रहा है. 

जब हम दूसरे देशों को वैचारिक सहिष्णुता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रवचन दे रहे होते हैं तो हम भूल जाते हैं कि खुद हमारे देश में अलग यौन रुझान रखने वालों के साथ भेदभाव होता है. इस रवैये को केवल पाखण्ड कहा जा सकता है.

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जब हम किसी को उसके यौन रुझान के कारण अपराधी मानते हैं तो फिर हमें खुद को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहने का क्या अधिकार है.

ऑरलैंडो में हुई सामूहिक हत्या से पता चलता है कि किसी तरह का रूढ़िवाद चाहे वो धार्मिक हो या यौनिक, हिंसा को बढ़ावा देता है. एक हद तक दोनों एक दूसरे के पूरक भी होते हैं.

संसद का जिम्मा

दिसंबर, 2013 में भारतीय सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को उलटते हुए समलैंगिक यौन संबंध को फिर से अपराध की श्रेणी में रख दिया. अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकों को 'देश की आबादी का नगण्य तबका' कहा था. 

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हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने 'धारा 377 की जरूरत और औचित्य" पर विचार करने का जिम्मा भारतीय संसद पर छोड़ दिया. लेकिन अभी तक किसी राजनीतिक दल ने इस कानून को हटाने की मंशा या इच्छाशक्ति नहीं दिखाई है.

थरूर का एकल प्रयास

कांग्रेसी सांसद शशि थरूर ने संसद के पिछले बज़ट सत्र में इस मुद्दे को उठाने की कोशिश की. थरूर ने समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से निकालने के लिए प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया था.

बीजेपी के सांसद निशिकांत दुबे ने इसका विरोध किया. जब इस बिल पर मतदान हुआ इसके विपक्ष में 71 वोट और पक्ष में 24 वोट पड़े थे. 

उसके बाद थरूर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस कानून में बदलाव के लिए चेंज डॉट ओआरजी पर एक याचिका शुरू की, जिसपर 40 हजार से ज्यादा लोगों ने हस्ताक्षर किया.

बीजेपी के विचार

सत्ताधारी बीजेपी अभी तक इस मुद्दे पर खुलकर अपना पक्ष रखने से बचती रही है. हालांकि पार्टी के कुछ नेता इसे 'अप्राकृतिक' बताते रहे हैं. मसलन, बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष और देश के वर्तमान गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने धारा 377 को बनाए रखने का समर्थन करते हुए इसे 'अप्राकृतिक' कहा था.

अंग्रेजी अख़बार इकोनॉमिक्स टाइम्स में इस साल मार्च में छपी एक खबर में बीजेपी के प्रवक्ता बिजय सोनकर शास्त्री ने कहा, "प्रकृति के खिलाफ जाना आदमी के लिए खतरनाक हो सकता है. ये (समलैंगिकता) एक अपराध है. इसे रोकना जरूरी है. इसीलिए हमें धारा 377 की जरूरत है." हालांकि शास्त्री ने इसे अपना 'निजी विचार' बताया. 

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बीजेपी के कुछ नेता समलैंगिकता के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट से इत्तेफाक नहीं रखते. मसलन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने उच्चतम अदालत के फैसले की आलोचना की थी.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने भी समलैंगिकता को गैर-आपराधिक घोषित किए जाने का समर्थन किया था. हालांकि संगठन ने इसके 'महिमामंडन' के प्रति भी आगाह किया था. जाहिर है खुद बीजेपी इस मुद्दे पर एकमत नहीं है.

सत्ताधारी बीजेपी ही की तरह इस मुद्दे पर देश के विपक्षी दलों की भी कोई ठोस राय नहीं है. न ही भारतीय संसद में इसपर अब कोई गंभीर बहस हुई है.

राजनीतिक पहल की जरूरत

इस मामले में आज भी भारत, सूडान, ईरान, सऊदी अरब, यमन, मॉरिशस, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, क़तर, और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों के साथ खड़ा नजर आता है जहां समलैंगिकता कानूनन अपराध है.

इसलिए अमेरिकी समाचार पत्र वाशिंगटन पोस्ट की उस टिप्पणी पर हैरानी नहीं होती जिसमें उसने लिखा है, "यहां तक कि जिस भारत में समलैंगिता अपराध है वहां के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ट्वीट करके घटना में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि दी है." 

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ब्रितानी अखबार द गॉर्डियन के स्तंभकार ओवेन जोन्स ने लिखा है, "ऑरलैंडो हमले का आंतकवाद और समलैंगिकों से नफरत, दोनों से संबंध है. आतंकवादी लिंक की वजह से हमें इसमें छिपे समलैंगिकों से नफरत के पक्ष को नहीं भूलना चाहिए."

जाहिर है ये मुफीद वक्त है कि भारत इस दिशा में आगे बढ़े और समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर निकालने के लिए राजनीतिक पहल  करे.

First published: 15 June 2016, 8:24 IST
 
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