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कौन हैं कापू और क्यों है कापुओं का आरक्षण आंदोलन?

चारू कार्तिकेय | Updated on: 2 February 2016, 18:56 IST
QUICK PILL
  • आंध्र-तेलंगाना में प्रभावशाली कापू समुदाय ने खुद को पिछड़ी जाति का दर्जा दिए जाने की मांग को लेकर आंदोलन करना शुरू कर दिया है. कृषि पेशे की गिरती आय से परेशान होकर कापू समुदाय खुद के लिए पिछड़ा दर्जे की मांग कर रहा है ताकि उसे सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण का लाभ मिल सके.
  • पिछले विधानसभा चुनाव में चंद्रबाबू नायडू ने कापुओं को पिछड़ी जाति का दर्जा दिए जाने की मांग की थी हालांकि मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने इस दिशा में कोई काम नहीं किया है.

31 जनवरी को आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी जिले में रत्नाचल एक्सप्रेस की चार बोगियों को फूंक डाला गया. कापू समुदाय का विरोध प्रदर्शन उग्र और हिंसक हुआ और उन्होंने ट्रेन की बोगियों को आग के हवाले कर दिया. कापू समुदाय के नेताओं ने राज्य में कापुओं को 'पिछड़ी जाति' का दर्जा देने के लिए विरोध प्रदर्शन किया था.

आंध्र प्रदेश में हुई इस घटना ने पिछले साल गुजरात में हुए पाटीदार आंदोलन की याद दिला दी. खबरों के मुताबिक करीब लाखों की संख्या में कापू आंदोलनकारी एक जगह जमा हुए और उन्होंने सड़क, राष्ट्रीय राजमार्ग और रेल यातायात को बाधित कर दिया. उन्होंने दो पुलिस थानों समेत कई गाड़ियों को आग लगा दी और पुलिसवालों की भी पिटाई कर डाली.

कापू समुदाय आंध्र प्रदेश में खुद को पिछड़ी जाति का दर्जा दिए जाने की मांग कर रहा है

मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू ने मीडिया को बताया कि घायल हुए एक पुलिसकर्मी की हालत बेहद खराब है. इसके अलावा ट्रेन के सात यात्री, मीडिया के लोग और रेलवे के पांच अधिकारियों के भी घायल होने की खबर है. विरोध प्रदर्शन कर रहे लोगों का कहना है कि उन्होंने पुलिस की तरफ से हुए लाठी चार्ज का जवाब दिया.

काकीनाडा के पूर्व सांसद मुद्रगदा पद्मनाभन ने विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया था. पद्मनाभन फिलहाल किसी पार्टी से जुड़े हुए नहीं हैं और कथित तौर पर उन्होंने भीड़ को आंदोलन करने और सड़क जाम करने के लिए उकसाया. उन्होंने भीड़ से यह भी कहा कि जब तक सरकार उनकी मांग मान नहीं लेती है तब तक उन्हें घर वापस नहीं जाना चाहिए.

हिंसा और तोड़फोड़ के बाद हुई चौतरफा आलोचना को देखते हुए पद्मनाभन ने सड़क और रेल यातायात को बाधित किए जाने का फैसला तो वापस ले लिया लेकिन उन्होंने एक फरवरी से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठने की घोषणा की है. उनका कहना है कि जब तक राज्य सरकार कापुओं को पिछड़ी जाति का दर्जा नहीं दे देती है तब तक वह भूख हड़ताल पर बैठे रहेंगे.

आंदोलन के बाद राज्य सरकार की परेशानियां बढ़ गई हैं. नायडू ने इसे पुलिस और खुफिया एजेंसियों की विफलता बताया है.

कौन हैं कापू

कापू आंध्र-तेलंगाना क्षेत्र की तीन बड़ी जातियों में से एक जाति समूह है. अन्य दो बड़ी जातियां कमास और रेड्डी हैं. हैदराबाद के राजनीतिक विश्लेषक शशि भूषण बताते हैं कि पारंपरिक हिंदू परंपरा के मुताबिक कापू क्षेत्रीय होते हैं लेकिन लगातार छोटी जातियों में शादी करने की वजह से इनका समाजिक स्तर गिरता चला गया. पारंपरिक तौर पर कापू समुदाय कृषि पेशे में शामिल रहे हैं.

क्यों कर रहे हैं आंदोलन

कापू समुदाय राज्य में पिछड़ी जाति का दर्जा चाहता है ताकि उन्हें सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण का लाभ मिल सके. 2014 के विधानसभा चुनावों में नायडू ने कापुओं को पिछड़ी जाति का दर्जा दिए जाने का वादा किया था लेकिन अभी तक उन्होंने इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया है.

क्या नायडू हैं जिम्मेदार

आंशिक तौर पर यह नायडू की असफलता है. यह राज्य के पिछड़ी जाति आयोग की जिम्मेदारी होती है कि वह समय-समय पर जातियों को इस सूची में शामिल किए जाने और हटाए जाने की सिफारिश करता है. पिछले आयोग का कार्यकाल सितंबर 2011 में खत्म हुआ है और नायडू सरकार ने नए आयोग का गठन 18 जनवरी को किया है.

क्या कापुओं को मिलना चाहिए पिछड़ी जाति का दर्जा?

Kapu.

कापुओं को मिलने वाले पिछड़ी जाति के दर्जे को लेकर मतभेद है. राजनीतिक विश्लेषक मोहन गुरुस्वामी ने कहा कि वह पिछड़ी जाति के हैं लेकिन गरीब नहीं है. गुरुस्वामी भी इस क्षेत्र से संबंध रखते हैं और उन्होंने इस बात से इनकार किया कि कापू क्षत्रिय समुदाय से ताल्लुक रखते हैं क्योंकि दक्षिण के राज्यों में वर्ण व्यवस्था काम ही नहीं करती है जैसा कि उत्तर भारत के राज्यों में है.

अर्थशास्त्री आमिर उल्लाह खान बताते हैं कि कापू इस क्षेत्र में वर्चस्व रखने वाली जाति हैं और उनके पास जमीन पर बड़ा कब्जा है लेकिन अब उन्हें लगता है कि उनके पास कृषि से बहुत अधिक आमदनी की गुंजाइश नहीं है. खान ने कहा कि कापुओं का आंदोलन भी वैसा ही है जैसा कि गुजरात के पटेलों, हरियाणा के जाट, महराष्ट्र के मराठाओं और राजस्थान के गुर्जरों का है.

कृषि क्षेत्रों में आई गिरावट की वजह से इन समुदायों की आर्थिक समृद्धि में गिरावट आई है. बहुत अधिक शिक्षा नहीं होने की वजह से इस समुदाय के युवाओं को नौकरी मिलने में बेहद परेशानी हो रही है. इस वजह से उन्हें लगता है कि आरक्षण उनकी मदद कर पाएगा.

कृषि पेशे में आई गिरावट की वजह से कापुओं की आर्थिक हालत में गिरावट आ रही है

शशि भूषण बताते हैं कि तेलंगाना बनने के बाद कापुओं के मांग को मजबूती मिली है. वेल्लमा जाति को वहीं दर्जा प्राप्त है जो कापुओं को संयुक्त आंध्र में प्राप्त था. तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव वेलम्मा जाति से आते हैं. लेकिन वह रेड्डी और कमास के लिए खड़े नहीं हो सके और तेलंगाना का निर्माण किया गया. यह कापुओं के लिए प्रेरणा के स्रोत की तरह काम कर रहा है.

क्या है राजनीतिक दर्जा?

कापुओं के पास पद्मनाभन, पूर्व केंद्रीय मंत्री पल्लम राजू और पूर्व राज्य मंत्री वाट्टी वसंत कुमार (दोनों कांग्रेस में हैं) और वाईएसआर कांग्रेस में शामिल बोत्स सत्यनारायण और उम्मारेड्डी वेंकटेशन वारलु जैसे नेता हैं.

पल्लम राजू, वाट्टी वसंत कुमार और बोत्स सत्यनारायण कापुओं के आंदोलन को अपना समर्थन दे रहे हैं

हालांकि इनका राजनीतिक कद बहुत अधिक भारी नहीं है. कांग्रेस को मुख्य तौर पर रेड्डियों की पार्टी के तौर पर देखा जाता है जबकि टीडीपी को कमास और टीआरएस को वेल्लमा जाति की पार्टी के तौर पर देखा जाता है.  अभी तक राज्य को कोई भी मुख्यमंत्री कापू समुदाय से नहीं हुआ है.

2008 में तेलुगू फिल्म इंडस्ट्री के मेगास्टर चिरंजीवी ने अपनी प्रजा राज्यम पार्टी की घोषणा की थी. चिरंजीवी कापू समुदाय से आते हैं लेकिन चिरंजीवी को राजनीति में वह सफलता नहीं मिल पाई और उन्होंने 2011 में कांग्रेस के साथ विलय कर लिया.

क्या हार्दिक पटेल हैं पद्मनाभन?

हां और नहीं. 63 साल की उम्र में पद्मनाभन, हार्दिक पटेल के मुकाबले उम्रदराज हैं और उनका काफी लंबा राजनीतिक करियर भी रहा है. पद्मनाभन पूर्व विधायक और सांसद भी रह चुके हैं. हालांकि समुदाय की आवाज उठाने के मामले में उनकी तुलना पटेल से की जा सकती है.

1990 के आखिर में पद्मनाभन के दबाव की वजह से ही राज्य सरकार को ओबीसी के लिए 7.5 फीसदी आरक्षण देने के लिए मजबूर होना पड़ा और उस वक्त भी भूख हड़ताल का उन्होंने सहारा लिया था.

गुरुस्वामी बताते हैं कि उन्हें इस आंदोलन में कांग्रेस के शामिल होने से कोई आश्चर्य नहीं होगा क्योंकि पद्मनाभन पुराने कांग्रेसी रहे हैं. यह संयोग ही है कि कांग्रेसी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री राजू और पूर्व राज्य मंत्री वट्टी वसंत कुमार ने इस आंदोलन को अपना समर्थन देने की घोषणा की है. इसके अलावा वाईएसआर कांग्रेस के सत्यनारायण और वेंकटेश वारलू ने भी आंदोलन को अपना समर्थन दिया है.

First published: 2 February 2016, 18:56 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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