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क्या सरकार ने वास्तव में पेट्रोल-डीजल के दाम बाजार के हवाले कर दिया है?

स्कंद विवेक धर | Updated on: 31 March 2016, 9:16 IST
QUICK PILL
  • क्या सरकार सचमुच नहीं करती कोई दखल? क्या तेल कंपनियां दाम तय करने के लिए पूरी तरह हैं स्वतंत्र?
  • ऐसा है तो दो साल में 9 बार उत्पाद शुल्क बढ़ने पर पेट्रोल और डीजल के दाम एक बार भी तत्काल क्यों नहीं बढ़े?
  • पेट्रोलियम पदार्थों पर उत्पाद शुल्क में सभी 9 वृद्घि पेट्रोल-डीजल की कीमतों की समीक्षा के समय ही क्यों हुईं?

"सरकार द्वारा पेट्रोल और डीजल की कीमतों को क्रमश: 26 जून 2010 और 19 अक्‍टूबर 2014 से बाजार निर्धारित बना दिया गया है. तब से सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियां पेट्रोल और डीजल के मूल्य निर्धारण के संबंध में उनके अंतरराष्ट्रीय मूल्यों तथा अन्य बाजार दशाओं के अनुरूप उपयुक्त निर्णय लेती हैं." बजट सत्र के दौरान एक सवाल के जवाब में केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने राज्यसभा में यह जानकारी दी.

जब से पेट्रोल और डीजल की कीमतों को बाजार के हवाले किया गया है, पेट्रोलियम पदार्थों की अनुचित कीमत को लेकर उठने वाले सभी सवालों के जवाब में सरकार सबसे पहले यही दुहाई देती है कि पेट्रोल-डीजल की कीमत निर्धारण में उसकी कोई भूमिका नहीं है. 

इनके दाम तेल कंपनियां तय करती हैं. लेकिन क्या सच्चाई यही है?

पेट्रोलियम मंत्रालय के आंकड़े इशारा करते हैं कि डीजल और पेट्रोल के दाम तय करने में आज भी केंद्र सरकार बड़ी भूमिका निभा रही है. हालांकि, अब यह भूमिका पर्दे के पीछे से निभाई जा रही है. 

अब कच्चे तेल के दाम बढ़ने पर उसका बोझ तो जनता पर डाला जाता है, लेकिन गिरावट का लाभ जनता को देने के बजाय सरकार उसका बड़ा हिस्सा खुद रख ले रही है

दूसरा, अंतर यह भी आया है कि जब सरकार पेट्रोल-डीजल के दाम तय करती थी, तब वह कच्चे तेल के दाम बढ़ने पर बोझ जनता पर डालती थी और कच्चे तेल की कीमत में गिरावट आने पर इसका लाभ भी जनता तक पहुंचाती थी, लेकिन अब कच्चे तेल के दाम बढ़ने पर उसका बोझ तो जनता पर डाला जाता है, लेकिन गिरावट का लाभ जनता को देने के बजाय सरकार उसका बड़ा हिस्सा खुद रख ले रही है.

19 अक्टूबर 2014 को जब डीजल की कीमतें बाजार के हवाले की गईं, तब से डीजल और पेट्रोल पर 9 बार उत्पाद शुल्क बढ़ाया जा चुका है. मजे की बात ये है कि उत्पाद शुल्क बढ़ाने से एक बार भी पेट्रोल-डीजल के दाम तत्काल नहीं बढ़े. 

कई बार ये भी कहा गया कि बढ़े हुए उत्पाद शुल्क की भरपाई तेल कंपनियां करेंगी. पर क्या किसी भी अप्रत्यक्ष कर के मामले में ऐसा होता है? जवाब है नहीं.

पेट्रोलियम मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, 'तेल कंपनियों को हर बार इसकी जानकारी दे दी जाती है कि सरकार पेट्रोल-डीजल पर उत्पाद शुल्क बढ़ाने जा रही है और कितना बढ़ाने जा रही है. इसके आधार पर तेल कंपनियां पेट्रोल-डीजल की कीमतों में कमी करते समय उसमें उतनी कटौती कर देती हैं.'

इस बात पुष्टि इस तथ्य से भी होती है कि 19 अक्टूबर 2014 के बाद से पेट्रोल-डीजल पर उत्पाद शुल्क में वृद्घि हमेशा तेल कीमतों की समीक्षा से एक-दो दिन आगे-पीछे हुई है. मालूम हो, पेट्रोल-डीजल के दाम बाजार के हवाले होने के बाद से तेल कंपनियां प्रायः प्रत्येक महीने की 1 और 15 तारीख को इनकी कीमतों की समीक्षा करती हैं.

केंद्र सरकार जिस राजकोषीय प्रबंध को लेकर बजट में अपनी पीठ थपथपा रही थी, वह असल में पेट्रोल-डीजल पर अतिरिक्त उत्पाद शुल्क लगाने की वजह से एकत्र हुआ पैसा है

कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह का कहना है कि जो राशि उपभोक्ताओं को देनी चाहिए थी, उस राशि को केन्द्र सरकार ने अपने पास रख लिया. यह शुद्ध रूप से इस देश के उपभोक्ताओं के साथ अन्याय है.

कब-कब बढ़ा उत्पाद शुल्क पेट्रोल (रु/ली.) डीजल (रु/ली.)

  • 11 नवंबर 2014 से पूर्व 09.48 03.56
  • 12 नवंबर 2014 11.02 05.11
  • 3 दिसंबर 2014 13.34 06.14
  • 2 जनवरी 2015 15.40 08.20
  • 17 जनवरी 2015 17.46 10.26
  • 7 नवंबर 2015 19.06 10.66
  • 17 दिसंबर 2015 19.36 11.83
  • 2 जनवरी 2016 19.73 13.83
  • 16 जनवरी 2016 20.48 15.83
  • 31 जनवरी 2016 21.48 17.33

गौर करने वाली बात ये भी है कि कच्चे के तेल के दाम गिरने के दौरान 9 बार उत्पाद शुल्क बढ़ाने वाली सरकार ने इन्हीं दो साल के दौरान कच्चे तेल के दाम बढ़ने की वजह से 9 बार पेट्रोल-पेट्रोल डीजल के दाम बढ़ते समय एक बार भी उत्पाद शुल्क में कटौती नहीं की.

माकपा महासचिव सीताराम येचुरी कहते हैं, "केंद्र सरकार जिस राजकोषीय प्रबंध को लेकर बजट में अपनी पीठ थपथपा रही थी, वह असल में पेट्रोल-डीजल पर अतिरिक्त उत्पाद शुल्क लगाने की वजह से एकत्र हुआ पैसा है. आम आदमी को उसका हिस्सा देने की बजाय सरकार उसे अपनी जेब में डाल रही है."

येचुरी की माने तो पहले पेट्रोल की लागत 20.52 रुपए प्रति लीटर है, जबकि टैक्स के बाद करीब 60 रुपए. टैक्स की वजह से कीमत में करीब 300 फीसदी का इजाफा? यही अंतर है. यह अंतर क्या उपभोक्ताओं को नहीं दिए जाने चाहिए थे?

इस तरह सरकार ने कुछ पैसे बचाए हैं. उसका दावा है कि इस पैसे को कृषि, सड़क और स्वास्थ्य पर निवेश किया है

आम बजट 2016-17 के वार्षिक वित्तीय विवरण को देखें तो येचुरी का आरोप कमोबेश सही है. विवरण के मुताबिक, केंद्र सरकार को वर्ष 2015-16 में अनुमान से 54,299.3 करोड़ रुपए अधिक उत्पाद शुल्क हासिल हुआ. 

यह अतिरिक्त आमदनी पेट्रोल व डीजल से सरकार को मिली. वर्तमान वित्त वर्ष की पहली दो तिमाही में सरकार पेट्रोलियम उत्पादों पर उत्पाद शुल्क से 70,494 करोड़ रुपए कमा चुकी है.

अर्थशास्त्री प्रोफेसर गौरव वल्लभ के मुताबिक, 'कच्चे तेल की कीमत सन् 2004 के स्तर पर आ गई है, लेकिन पेट्रोल-डीजल के दाम तब की तुलना में दाे गुने हैं. अप्रैल 2014 से मार्च 2016 के बीच पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क 126 फीसदी और डीजल पर 386 फीसदी बढ़ चुका है.'

प्रो. वल्लभ ने पेट्रोल-डीजल पर उत्पाद शुल्क बढ़ाकर राजकोषीय घाटे को कम करने की सरकार की नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार अपने राजस्व और खर्च को लेकर पेट्रोलियम उत्पाद शुल्क पर ज्यादा निर्भर हो रही है. 

आने वाले समय में जब अंतरराष्‍ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़ेंगे तब उसे उत्पाद शुल्क में कटौती करनी पड़ेगी, जिसका असर उसकी आय पर पड़ेगा और राजकोषीय संतुलन एक बार फिर गड़बड़ाएगा.

वर्ष 2015-16 में उत्पाद शुल्क संग्रह

  • बजट अनुमान 229054.04 करोड़ रुपए
  • वास्तविक संग्रह 283353.34 करोड़ रुपए

सरकार कुछ भी छुपा कर नहीं कर रहीः धर्मेंद्र प्रधान

पेट्रोल और डीजल की लागत में कमी से होने वाले फायदे को सरकारी खजाने में डालने की बात स्वीकार करते हुए केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान कहते हैं, सरकार कुछ भी छुपा कर नहीं कर रही है. 

उन्होंने कहा कि कच्चे तेल की कीमत में गिरावट से पेट्रोल-डीजल की लागत 50 फीसदी कम हुई है. हमने इसका 50 फीसदी उपभोक्ताओं को लौटाया और 50 फीसदी को सरकार की तिजोरी में रखकर उपयोगी निवेश किया.

बजट सत्र में दिए अपने जवाब में सरकार के कदम काे सही ठहराते हुए प्रधान ने कहा कि पेट्रोल की लागत में कमी का 51 फीसदी, जबकि डीजल की लागत में कमी का 59 फीसदी हमने केंद्र और राज्यों के कर के रुप में सरकारी खजाने में डाला है. इस तरह हमने कुछ पैसे बचाए हैं. इस पैसे को हमने कृषि, सड़क और स्वास्थ्य पर निवेश किया है. 

क्या एक कल्याणकारी राज्य में ऐसा करना अपराध है?

First published: 31 March 2016, 9:16 IST
 
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