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यूपी भाजपा अध्यक्ष: 'कमजोर' मनोज सिन्हा 'मजबूत' दावेदार

पाणिनि आनंद | Updated on: 11 February 2017, 6:44 IST
QUICK PILL
  • यूपी बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष की तलाश जारी है. प्रदेश में 2017 में चुनाव होने वाले हैं. ऐसे में पार्टी के लिए अंतिम नाम का चयन टेढ़ी खीर साबित हो रहा है.
  • बीजेपी के सूत्रों की मानें तो केंद्रीय रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा इस दौड़ में सबसे आगे हैं. नरेंद्र मोदी और अमित शाह से उनकी नजदीकी के अलावा भी उनके दौड़ में आगे निकलने के कई कारण हैं.

यूपी में 2017 में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. ऐसे में यूपी बीजेपी अध्यक्ष का पद पार्टी के लिए बहुत अहमियत रखता है. यूपी चुनाव का असर 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव पर भी पड़ सकता है इसलिए पार्टी प्रदेश की राजनीति में फूंक-फूंक कर कदम रख रही है.

बीजेपी का यूपी में रिकॉर्ड बहुत अच्छा नहीं रहा है. पार्टी के प्रदेश में 1989 में 57, 1991 के राम मंदिर की लहर में 221, बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद 1993 में 177, 1996 में 174, 2002 में 88, 2007 में 51 और 2012 में 47 विधायक जीते थे.

पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी ने प्रदेश की 80 संसदीय सीटों में से 73 सीटों पर जीत हासिल की थी. ऐसे में पार्टी विधानसभा चुनाव में भी अपना दमदार प्रदर्शन दोहराना चाहेगी.

यूपी बीजेपी के अध्यक्ष पद के लिए अंतिम 12 नामों का चयन हो चुका है. इनमें पार्टी के कुछ नए नेता भी हैं और कुछ केंद्रीय मंत्री भी.

इस लिस्ट में शामिल मंत्रियों में महेश शर्मा (गौतमबुद्ध नगर), रमाशंकर कथारिया (आगरा के दलित नेता), संतोष कुमार गंगवार (बरेली के कुर्मी) और रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा प्रमुख हैं.

सूत्र की मानें तो इन 12 नामों में से भी चार नाम चुन लिए गए हैं जिनमें से यूपी बीजेपी का अगला अध्यक्ष चुना जाएगा.

ये चार नाम हैं, दिनेश शर्मा (ब्राह्मण), धरमपाल सिंह (लोध), स्वंत्रत देव सिंह (कुर्मी) और मनोज सिन्हा (भूमिहार).

बीजेपी के सूत्रों की माने तो इनमें सबसे आगे हैं केंद्रीय रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा. हालांकि वर्तमान अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी भी एक और बार अध्यक्ष बनने के प्रति आशान्वित हैं.

चयन का आधार


बीजेपी के पास इस समय प्रदेश कोई ऐसा नेता नहीं है जिसका पूरे प्रदेश में जनाधार हो. अध्यक्ष के चयन के लिए इस समय सबसे बड़ी योग्यता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के प्रति वफादारी बन गई है.

पार्टी को यूपी में ऐसे प्रदेश अध्यक्ष की तलाश है जो दोनों की हर बात को मानता रहे. पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व नहीं चाहता कि देश के सबसे बड़े प्रदेश में कोई दूसरा कल्याण सिंह पैदा हो जो केंद्र को चुनौती देने लगे.

धरमपाल इसीलिए दौड़ से बाहर हो गए हैं. वो लोकप्रिय जननेता भले न हों लेकिन आरएसएस और सहयोगी संगठनों के अंदर उनकी पकड़ मजबूत है. लेकिन गृह मंत्री राजनाथ सिंह और बीजेपी के संगठन सचिव रामलाल उनके समर्थन में हैं. जाहिर है मोदी और शाह केंद्र से ऐसे किसी नेता को बढ़ावा नहीं देंगे जो दूसरे नेताओं का करीबी हो.

सिन्हा दौड़ में आगे कैसे निकले


सिन्हा पूर्वी उत्तर प्रदेश के हैं. वो भूमिहार जाति से आते हैं जिसकी यूपी में बहुत कम संख्या है. उनका कोई व्यापक जनाधार भी नहीं ऐसे में उनके भविष्य में बहुत ज्यादा ताकतवर होने की संभावना बहुत कम है.

धरमपाल भी लोध जाति से आते हैं. पार्टी में पहले ही दो बड़े लोध नेता कल्याण सिंह और उमा भारती हैं. ऐसे में धरमपाल का वो विरोध कर सकते हैं. ये बात सिन्हा के पक्ष में जाती है.

पार्टी को डर है कि सवर्ण वोट कांग्रेस की तरफ जा सकता है. ऐसे में सिन्हा को प्रदेश अध्यक्ष बनाने पर सवर्ण वोट छिटकेगा नहीं.

सिन्हा की आरएसएस में भी अच्छी पकड़ है. उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत अखिल भारतीय परिषद(एबीवीपी) से की थी.

पार्टी को पूर्वी उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी से कड़ी टक्कर मिल सकती है. इसलिए पूर्वी यूपी के नेता को प्रदेश अध्यक्ष बनाने से उसे मजबूती मिलेगी. साथ ही पार्टी अन्य पिछड़ा वर्ग और अनुसूचित वर्ग के वोटों को भी साथ रख सकेगी.

पार्टी के सूत्रों का यहां तक कहना है कि अगर सिन्हा यूपी बीजेपी के अध्यक्ष नहीं बनाए गए तो कैबिनेट में उनका दर्जा बढ़ाया जा सकता है.

First published: 10 February 2016, 3:29 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बीबीसी हिन्दी, आउटलुक, राज्य सभा टीवी, सहारा समय इत्यादि संस्थानों में एक दशक से अधिक समय तक काम कर चुके हैं.

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