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कौन हैं पेरियार और उनसे क्यों चिढ़ते हैं दक्षिणपंथी ?

आकांशा अवस्थी | Updated on: 7 March 2018, 12:17 IST

त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति तोड़ने के बाद ये उत्पात तमिलनाडु तक पहुंच गया. तमिलनाडु में पेरियार की मूर्ति को भी टारगेट किया गया. कुछ लोगों ने पेरियार की मूर्ति को हथौड़े से तोड़ने की कोशिश की. देश भर में विरोध की ये स्थिति खतरनाक है. पेरियार की मूर्ती तोड़ने के बाद बंगाल में श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मूर्ती को भी निशाना बनाया गया है.

कौन थे पेरियार 

इरोड वेंकट रामास्वामी नायकर का जन्म 17 सितम्बर 1879 में तमिलनाडु में ईरोड में हुआ. पिता वेंकतप्पा नायडु धनी व्यापारी थे. घर पर भजन तथा उपदेशों का सिलसिला चलता रहता था. हालांकि वो बचपन से ही उपदशों में कही बातों की प्रामाणिकता पर सवाल उठाते थे.

हिंदू महाकाव्यों तथा पुराणों की परस्पर विरोधी तथा बेतुकी बातों का माखौल उड़ाते थे. वो बाल विवाह, देवदासी प्रथा, विधवा पुनर्विवाह के खिलाफ होने के साथ स्त्रियों तथा दलितों के शोषण के पूरी तरह खिलाफ थे. उन्होंने हिंदू वर्ण व्यवस्था का बहिष्कार भी किया.उन्होंने हिंदू धर्मग्रंथों को जलाया भी.

दलितों के समर्थन में किया आंदोलन

कांग्रेस छोड़ने के बाद वो दलितों के समर्थन में आंदोलन चलाने लगे. पेरियार ने 1944 में अपनी जस्टिस पार्टी का नाम बदलकर द्रविड़ कड़गम कर दिया. इसी से डीएमके (द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) पार्टी का उदय हुआ. उन्होंने खुद को सत्ता की राजनीति से अलग रखा. जिंदगी भर दलितों और स्त्रियों की दशा सुधारने में लगे रहे.

अनिवार्य हिंदी का विरोध

1937 में जब सी. राजगोपालाचारी मद्रास प्रेसीडेंसी के मुख्यमंत्री बने तब उन्होंने स्कूलों में हिंदी भाषा की पढ़ाई अनिवार्य कर दी. तब पेरियार हिंदी विरोधी आंदोलन के अगुवा बनकर उभरे. उग्र आंदोलनों को हवा दी. 1938 में वो गिरफ्तार हुए.

उसी साल पेरियार ने हिंदी के विरोध में ‘तमिलनाडु तमिलों के लिए’ का नारा दिया. उनका मानना था कि हिंदी लागू होने के बाद तमिल संस्कृति नष्ट हो जाएगी. तमिल समुदाय उत्तर भारतीयों के अधीन हो जाएगा.

पेरियार की सच्ची रामायण

राम के बारे में पेरियार का मत है कि वाल्मीकि के राम विचार और कर्म से धूर्त थे. झूठ, कृतघ्नता, दिखावटीपन, चालाकी, कठोरता, लोलुपता, निर्दोष लोगों को सताना और कुसंगति जैसे अवगुण उनमें कूट-कूट कर भरे थे. पेरियार कहते हैं कि जब राम ऐसे ही थे और रावण भी ऐसा ही था तो फिर राम अच्छे और रावण बुरा कैसे हो गया.

रामास्वामी एक तमिल राष्ट्रवादी, राजनेता और सामाजिक कार्यकर्ता थे. इन्होंने 'आत्मसम्मान आन्दोलन' या 'द्रविड़ आन्दोलन' शुरू किया था. उन्होंने जस्टिस पार्टी का गठन किया जो बाद में ‘द्रविड़ कड़गम’ हो गई.

पेरियार ने प्रसिद्ध पेरियार आंदोलन चलाया था. यह आंदोलन नास्तिकता (या तर्कवाद) के प्रसार के लिए जाना जाता है. उन्होंने ब्राह्मणवाद और ब्राह्मणों पर करारा प्रहार किया और एक पृथक राष्ट्र ‘द्रविड़ नाडु’की मांग की थी.

उन्होंने सामाजिक कुप्रथाएं जैसे बाल विवाह, देवदासी प्रथा, विधवा पुनर्विवाह का विरोध और महिलाओं व दलितों के शोषण का खुलकर विरोध किया. उन्होंने जाति व्यवस्था का भी विरोध और बहिष्कार किया.

यूनेस्को ने अपने उद्धरण में उन्हें ‘नए युग का पैगम्बर, दक्षिण पूर्व एशिया का सुकरात, समाज सुधार आन्दोलन के पिता, अज्ञानता, अंधविश्वास और बेकार के रीति-रिवाज़ का दुश्मन’ कहा था.

1904 में पेरियार काशी की यात्रा के दौरान भूख लगने पर निःशुल्क भोज में गए. जहां उन्हें पता चला कि यह सिर्फ ब्राह्मणों के लिए था. उन्होंने फिर भी भोजन प्राप्त करने की कोशिश की लेकिन उन्हें धक्का मारकर अपमानित कर दिया गया जिसके कारण वे रुढ़िवादी हिन्दुत्व के विरोधी हो गए. इसके बाद उन्होंने किसी भी धर्म को नहीं स्वीकारा और आजीवन नास्तिक रहे.

केरल के कांग्रेस नेताओं के निवेदन पर पेरियार ने वैकोम आन्दोलन का नेतृत्व किया. यह आन्दोलन मन्दिरों की ओर जाने वाली सड़कों पर दलितों के चलने की मनाही को हटाने के लिए किया गया था. इस आन्दोलन में उनकी पत्नी और मित्रों ने भी उनका साथ दिया.

1916 में एक राजनैतिक संस्था 'साउथ इंडियन लिबरेशन एसोसिएशन' की स्थापना हुई थी. इसका मुख्य उद्देश्य था ब्राह्मण समुदाय के आर्थिक और राजनैतिक शक्ति का विरोध और गैर-ब्राह्मणों का सामाजिक उत्थान. यह संस्था बाद में ‘जस्टिस पार्टी’ बन गई. 1944 में पेरियार ने जस्टिस पार्टी का नाम बदलकर ‘द्रविड़ कड़गम’कर दिया.

इसकी विभिन्न शाखाओं और डीएमके जैसी द्रविड़ियन पार्टियों के सदस्यों ने खुले तौर पर नास्तिकता का प्रसार और उसे स्वीकार किया. हालांकि, समय बीतने के साथ ही इसके कुछ मानने वालों ने धर्म और धार्मिक रीतियों का पालन शुरू कर दिया, जिसके खिलाफ पेरियार ने जीवन भर संघर्ष किया था.

First published: 7 March 2018, 12:17 IST
 
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